सोमवार, 25 जुलाई 2016

आज भी वो इंसाफ मांग रहे हैं आैर इंसानियत मुंह छिपा रही है

‘भगवान के घर देर है अंधेर नहीं‘, हमने अक्सर ये सुना है लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम के किसी भी सिरे को पकड़कर आप आगे बढ़ना शुरू कर दें आपको अंधेरा ही अंधेरा नजर आएगा। एक बड़े पेड़ के गिरने के बाद धरती इतनी जोर से भी नहीं हिलती की सारी इंसानियत गर्त में समा जाए, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों को मार देने की अंधी दौड़ इस कदर इंसानियत पर हावी हुई कि उस मंजर को सुनकर-पढ़कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।

देश के तत्कालीन गृह मंत्री को जूता मारकर (हालांकि जूता लगा नहीं था) चर्चा में आए पत्रकार जरनैल सिंह की किताब ‘कब कटेगी चौरासी-सिख कत्लेआम का सच‘ उन तीन दिनों के कत्लेआम को बयां करती हैं। 31 अक्टूबर 1984 से 2 अक्टूबर 1984 के उन तीन दिनों में कैसे दंगाई एक के बाद एक सिखों की लाशें बिछाते रहे? कैसे औरतें अपने पति, पिता और बच्चों को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखती आैर क्रंदन करती रहीं? कैसे दंगाई और पुलिस में कोई भेद ही नहीं रह गया था? कैसे घायल सिखों को आग के हवाले कर हत्याओं को भी क्रूरतम बना दिया गया? इन सारे सवालों के जवाब ये किताब देती है। जहां किताब को पढ़ते हुए आपको लगता है कि कैसे एक दंगा पूरी दुनिया केा आपसे बेगाना कर देता है, ऐसा लगता है कि दुनिया में अब आपका कोई नहीं है। जैसे पूरी दुनिया ने आपको मरने के लिए दंगाइयों के सामने छोड़ दिया है। हर दंगाई किसी का बेटा, भाई, पति होता है लेकिन दंगा करते वक्त एक हत्यारा ही रह हो जाता है।

पुलिस थी या दंगाई 
जरनैल सिंह अपनी किताब में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं। वे बताते हैं कि आईएएस अधिकारी कुसुमलता मित्तल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एक पुलिस अधिकारी को 'जीवित शर्म' लिखा तो दूसरे को दिल्ली पुलिस के चेहरे पर 'बदनुमा दाग' करार दिया। ये वही पुलिस अधिकारी थे जिन्हें दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाया गया था लेकिन ये दंगाइयों के ही मददगार साबित हुए। इस किताब में पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह के हवाले से बताया गया है कि देश की राजधानी में इतना बड़ा दंगा पुलिस की मदद के संभव ही नहीं है। उनके अनुसार यदि पुलिस ने थोड़ा सा भी बल का इस्तेमाल किया होता तो दंगाई इतने बड़े कत्लेआम को अंजाम ही नहीं दे पाते। इस दंगे का सबसे घृणित पहलू ये है कि दंगाइयों से जब कोई घर या इलाका फतह नहीं हुआ तो उन्होंने पुलिस को बुलाया। लोगों को मारने, उनके घरों को लूटने में जब वे नाकामयाब होते तो पुलिस को गुहार लगाते और पुलिस कत्ल और लूट में हिस्सेदार बन जाती।

राजनेताओं पर सवाल 
सिखों के कत्लेआम के बाद करीब 30 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन जिन बड़े नेताओं पर आरोप लगे वे आज भी अपना दामन बचाए चैन की बंसी बजा रहे हैं। ये उन सैंकड़ों विधवाओं के दर्द को और बढ़ा देता है जिन्होंने उस खूनी मंजर के बाद अपनी जिंदगी को यूं बुझते देखा है। कांग्रेस के बड़े नेताआें के खिलाफ इतने सुबूतों आैर गवाहों के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ पाती है। ये देश की न्याय व्यवस्था के साथ क्रूरतम खिलवाड़ सा लगता है।

अफवाहों को गर्म रखा गया
सोशल मीडिया के इस दौर में जब हमें कश्मीर की हालत देखकर इसके खतरे समझ में आ रहे हैं। हम उस दौर में उड़ने वाली अफवाहों से पैदा होने वाली नफरत को समझ सकते हैं। कानपुर में सिखों से लोगों की हमदर्दी न हो जाए इसलिए ऐसी अफवाहें फैलाई गई कि सिख फौजियों ने पास के गांवों के लोगों को गोली मार दी है। अफवाहों के ऐसे बाजार उस दौर में पूरे देश में सजे थे जिनका एक ही मकसद था सिखों के प्रति हमदर्दी और विश्वास को वातावरण न बन सके। आज के दौर में जब अफवाहें इतनी तेजी से हमारे दिलों में जहर भर देती हैं तो उस दौर का अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल नहीं है।

जरनैल सिंह चिदंबरम पर जूता फेंकने को अभूतपूर्व अन्याय के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध कहते हैं। हालांकि अपने इस कृत्य को वे गलत जरूर मानते हैं लेकिन मुद्दा सही उठाने की बात कहते हैं। उनकी किताब के शुरूआती कुछ पन्ने पलटने के बाद आप सिखों के साथ हुए उस अन्याय से रूबरू होते हैं, जिनमें दंगार्इ हाथ में वोटर लिस्ट लिए सिखों का कत्लेआम करने पर तुले थे। एक आम आदमी के लिए ये सोचना भी दिल दहला देने वाला है कि कैसे सिखों को सरियों आैर लाठियों से पीटा जाता आैर फिर उनके गले में टायर डालकर जिंदा जला दिया जाता। ये आम आदमी की प्रतिक्रिया हो ही नहीं सकती। ये सुनियोजित षड़यंत्र था जो आज भी हमारी न्याय प्रणाली को दूर से देखकर हंस रहा है।

इस मामले में बहुत कम लोगों को सजा हुर्इ है, वो भी एेसे लोगों को जिनके कंधे पर बंदूक रखकर चलार्इ गर्इ आैर फिर उनके रहनुमा बनने का दावा करने वालों ने किनारा कर लिया। तड़प-तड़प कर जान देता हर सिख जैसे आज भी अपने लिए न्याय की गुहार लगा रहा है, उनकी विधवाएं आैर बच्चे अपनों के लिए इंसाफ को पुकार रहे हैं आैर एेसा लगता है कि इंसानियत शर्म से मुंह छिपा रही है।


- अभिषेक

बुधवार, 20 जुलाई 2016

'तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है'


हम अक्सर ये सुनते हुए बड़े हुए हैं कि फिल्में समाज का आईना है। हालांकि मैं पूरी तरह से इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। एक फिल्मकार अपनी फिल्म में क्या दिखाना चाहता है। ये उस पर निर्भर करता है। फिर वो फिल्म में समाज से जुड़ी समस्या दिखाए, अंतरिक्ष की कहानी दिखाए या कुछ असाधारण या फिर कोर्इ बकवास। हां, मैं ये जरूर मानता हूं कि कभी-कभी कोई फिल्मकार हमारे अंतर्मन को फिल्म की शक्ल में जरूर सामने रखता है। ये भी एक अपवाद की तरह ही होता है लेकिन जब होता है तो उस चीज को भुला देना असंभव होता है।

आजकल एक फिल्म के कुछ दृश्यों को भुला नहीं पा रहा हूं, मैं जितना उन दृश्यों को देखता हूं स्वयं को एक अलग ही दुनिया में पाता हूं। बहुत संभव है कि ये हाॅलीवुड फिल्म किसी क्लासिक फिल्म की श्रेणी में न सम्मिलित हो लेकिन ये मेरे दिल के जरूर करीब है। ये फिल्म है ‘द लास्ट समुराई‘। फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हें भूलना असंभव है। खासतौर पर जब आप जीवन और मृत्यु की बहस को किसी चर्चा में और लंबा खींचते रहे हैं। फिल्म के आखिरी कुछ दृश्य जो कर देते हैं वो दूसरी कुछ फिल्मों के बस की बात नहीं है।

फिल्म में दो मुख्य किरदार हैं। एक है कात्सोमोटो, जिसे बखूबी निभाया है केन वाटनबे ने और दूसरा किरदार नाथन एलग्रिन का है जिसे अभिनेता टाॅम क्रूज ने नर्इ ऊंचाइयां दी है। फिल्म के एक संवाद में टाॅम क्रूज से पूछा जाता है कि ये बताइए कि वो कैसे मरे थे? टाॅम क्रूज का जवाब होता है ‘ये सुनिए वो जिए कैसे थे?‘ हमेशा मरने वाले की मौत का कारण जानने में हमारी दिलचस्पी होती है, लेकिन मरने वाले ने अपनी जिंदगी कैसे जी? ये पूछना हम हमेशा भूल जाते हैं। शुरूआती दौर में जब मेरे पिता मुझे खबर लिखना सिखाते थे तो एक दिन मैंने एक बार ‘मृत्यु‘ को ‘मृत्यू‘ लिख दिया था। उस वक्त उन्होंने मुझे टोकते हुए कहा था कि मृत्यु बहुत छोटी बात है हर किसी को आनी है मात्रा छोटी आएगी। ‘द लास्ट समुराई‘ भी हमें यही सिखाती है। मृत्यु तो जिंदगी का एक हिस्सा है और हम हमेशा मृत्यु की बात करते हैं, जिंदगी को भूल जाते हैं।

फिल्म के एक दृश्य में समुराई अपनी तलवारों और दूसरे परंपरागत हथियारों से लैस होकर बंदूकधारी सैनिकों से टकरा जाते हैं। दिमाग वालों के लिए ये मूर्खता है और दिलवालों के लिए अपने आदर्शों के लिए बलिदान हो जाना। लड़ने वाले हर समुराई को पता होता है कि उन्हें मरना है, लेकिन जब आप सही हों तो अपनी बात के लिए लड़ना और मर जाना भी सम्मान है। एक-एक कर ढेर होते समुराई और उन पर गोली चलाते बंदूकधारी सैनिकों को देखकर ऐसा लगता है मानो गोलियां आपका हदय भेदकर निकल रही हों।

आखिर में जब सारे समुराई वीरगति को प्राप्त होते हैं या फिर घायल अवस्था में वीरगति का इंतजार करते हैं उस वक्त गोली चलाने वाले एक सैनिक का दिल पसीजता है और वो उन महान योद्धाओं को सम्मान देने के लिए घुटनों पर बैठकर अपने दुश्मनों के सामने नतमस्तक हो जाता है। धीरे-धीरे हर सैनिक को ये अहसास होता है कि जिन्हें वे ढेर कर चुके हैं असली योद्धा तो वे थे। हर सैनिक घुटने पर आता है और उन महान योद्धाओं के सम्मान में नतमस्तक हो जाता है। एक योद्धा के लिए उस मौत से बढ़कर और क्या हो सकता है जब दुश्मन उसे झुककर सम्मान दे। आदर्शों के लिए बलिदान हो जाने वालों के लिए हर किसी के मन में सम्मान होता है। कात्सोमोटो, नाथन से कहता है कि तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है। कात्सोमोटो को इज्जत की वो मौत नसीब होती है जिसका ख्वाब उसने हमेशा देखा था।

आखिर में जापान के राजा को अपनी गलती का अहसास होता है। परंपराआें आैर नवीनता के द्वंद्व के बीच उन्हें लगता है कि उन्हाेंने संगठित जापान का जो सपना देखा था वो अपनों की कीमत पर नहीं हो सकता। राजा कहते हैं कि हमारे पास चाहे कुछ भी हो लेकिन हमें ये भूलना नहीं चाहिए कि हम कौन हैं? हमें भी हमेशा ये याद रखना चाहिए।

- अभिषेक