शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

सांप्रदायिक उन्‍माद के इस दौर में नाउम्‍मीदी से मामूली उम्‍मीद होना बेहतर

सांप्रदायिक दंगों का देश में लंबा इतिहास है. लोग कहते हैं कि इतिहास से सीखना चाहिए, लेकिन सीखता भला कौन है? सांप्रदायिक दंगों में मरने वालों के पक्ष के लोग दर्द में डूब जाते हैं और मारने वाले 'सांस्‍कृतिक गौरव' के नए अध्‍याय में अपना नाम दर्ज करा देते हैं. उस पर कमाल देखिए कि कहते सभी यही हैं कि दंगे में आम आदमी मरता है, लेकिन कोई ये नहीं कहता कि दंगे में लड़ने वाला भी आम आदमी ही होता है. बस लड़ाने वाले ख़ास होते हैं और जिनका कहीं नाम नहीं होता. 

पिछले कुछ सालों में धार्मिक उन्‍माद लगातार बढ़ा है. नेताओं के भड़काऊ बयान और सोशल मीडिया पर हर तरफ फैली नफरत इस जहर को बहुत तेजी से फैला रहे हैं. लोगों को बांटकर अपना फायदा कमाना नेताओं को हमेशा से ही पसंद रहा है. बढ़ती धार्मिक कट्टरता के इस दौर में आम आदमी खुद के लिए प्राथमिकताएं तय नहीं कर पाया है. बहुत से लोगों पर धार्मिक कट्टरता का गहरा असर है और उनकी प्राथमिकताएं धर्म पर आकर टिक गई हैं. भूख, बेरोजगारी जैसी बुनियादी समस्‍याओं से पार पाने की जगह उन्‍हें लगने लगा है कि पहला निशाना उनका धर्म है और दूसरा वो खुद. यही कारण है कि धर्म को लेकर भावनाएं अपने उफान पर हैं. आम आदमी के लिए धर्म से बड़ी अफीम और नेताओं के जहरीले नारों से ज्‍यादा खतरनाक कुछ नहीं है, लेकिन इन्‍हीं को लोग अपना पथ प्रदर्शक मान रहे हैं. 

मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं जो स्‍वयं को बेहतर तहजीब और संस्‍कारों वाला बताते हैं. उनके लिए बहुत सी ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में उनसे बात करना लगता है जैसे सूरज को दीया दिखाना है. कई बार ऐसे लोग भी धार्मिक उन्‍माद और कट्टरता से लबरेज नजर आते हैं. इसके साथ ही वो भ्रम भी हवा हो जाता है, जिसमें पढ़ा-लिखा होना आपकी सोच को बेहतर बनाता है. बड़ी बड़ी डिग्रियां सांप्रदायिक उन्‍माद के आगे घुटने टेक देती हैं. इसलिए जब आप अपने बच्‍चों को उच्‍च शिक्षा के संस्‍थानों में पढ़ने भेजें तो उन्‍हें कोर्स की किताबों, वॉटसएप और फेसबुक जैसे प्‍लेटफॉर्म्‍स के बजाय अन्‍य किताबें पढ़ना भी जरूर सिखाएं. 

धर्म आक्रामक नारों और दूसरे धर्म की निंदा का नाम बनकर रह गया है. इसीलिए ज्‍यादा धार्मिक आदमी से बचने की सलाह दी जाती है. धार्मिक भावनाएं कब कुलाचें मारती हुई शरीर से बाहर आ जाए और कब किसी दूसरे धर्म के शख्‍स को अपना शिकार बना ले कहा नहीं जा सकता है. धर्म का यह नशा जीवन के रंगों को बदरंग कर रहा है. इसमें सिर्फ आप या मैं शामिल नहीं हूं. हम सभी इसके लिए दोषी हैं. दुनिया को सिर्फ एक धर्म बेहतर नहीं बना सकता है. इसके लिए सभी धर्मों के बने रहने और कट्टरता को छोड़कर साथ आने की जरूरत है. हालांकि वाट्सएप जैसे विश्‍वविद्यालयों से अपनी सोच विकसित करने वालों से उम्‍मीद कम है. फिर भी नाउम्‍मीदी से कुछ उम्‍मीद होना बेहतर है. 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

जोरबा द ग्रीक: यहां से जाता है सुकून का मार्ग

जीवन भर हम सुकून तलाशते हैं. कहीं थोड़ा सा सुकून मिले. मंदिर-मस्जिदों से लेकर पहाड़, नदियां, झरने तक हम घूम आते हैं. फिर भी सुकून पाने की चाह खत्‍म नहीं होती. सुकून इतना सस्‍ता नहीं है. हम इसके लिए जितना प्रयास करते हैं वो उतना ही कम होता जाता है. हमारी चेष्‍टा, चिंता बन जाती है. निकोस कजानजाकिस की किताब जोरबा द ग्रीक उस सुकून को पाने का मार्ग बताती है, जैसे जोरबा ने वो सुकून अपने लिए तलाश लिया था. 

किताबों में डूब रहने वाले एक लेखक और उसके साथ काम करने वाले अनपढ़ शख्‍स जोरबा की यह कहानी आपको दलदल भरी जमीन से निकालकर समतल जमीन पर ला देती है, जहां हम देर तक कुछ सोच ही नहीं पाते हैं. 

यह ओशो की सबसे पसंदीदा किताबों में से भी एक है, जिसमें ओशो ने बहुत सी चीजों को अपना लिया है और हम भूल गए हैं कि यह ओशो की नहीं बल्कि निकोस कजानजाकिस की देन है. ख़ासतौर पर काम को ही ध्‍यान बना लेने की थ्‍योरी जिस पर ओशो लंबे लंबे व्‍याख्‍यान दे चुके हैं, ऐसा लगता है कि वह यहीं से ली गई है. ओशो के जन्‍म से पहले ही निकोस कजानजाकिस इसे जी चुके थे. 

अमूमन ये माना जाता है कि बूढ़े होते लोगों में सबसे पहले उत्‍साह मरता है, लेकिन जोरबा द ग्रीक में बूढ़ा शख्‍स उत्‍साह से भरा है और युवा किताबी कीड़ा है. दोनों दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े नजर आते हैं, जिनका मिलना असंभव सा लगता है. हालांकि दोनों के बीच एक दूसरे के प्रति सम्‍मान बना रहता है. विपरीत होने का ये आकर्षण ही शायद दोनों को पास लाता है. 

आध्‍यात्मिक होना पाप-पुण्‍य और अच्‍छाई-बुराई के बीच नहीं है. यह उनके पार है. चैतन्‍य हो जाने वालों के पास ऐसे सवालों को खोजने का समय नहीं है. यह सारे सवाल ह्रदय की दुर्बलता का संकेत समझे जाते हैं. यही कारण है कि योगियों ने मन की स्थिरता पर जोर दिया है. यह उपन्‍यास भी मन की स्थिरता को पाने की यात्रा है.