मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

जोरबा द ग्रीक: यहां से जाता है सुकून का मार्ग

जीवन भर हम सुकून तलाशते हैं. कहीं थोड़ा सा सुकून मिले. मंदिर-मस्जिदों से लेकर पहाड़, नदियां, झरने तक हम घूम आते हैं. फिर भी सुकून पाने की चाह खत्‍म नहीं होती. सुकून इतना सस्‍ता नहीं है. हम इसके लिए जितना प्रयास करते हैं वो उतना ही कम होता जाता है. हमारी चेष्‍टा, चिंता बन जाती है. निकोस कजानजाकिस की किताब जोरबा द ग्रीक उस सुकून को पाने का मार्ग बताती है, जैसे जोरबा ने वो सुकून अपने लिए तलाश लिया था. 

किताबों में डूब रहने वाले एक लेखक और उसके साथ काम करने वाले अनपढ़ शख्‍स जोरबा की यह कहानी आपको दलदल भरी जमीन से निकालकर समतल जमीन पर ला देती है, जहां हम देर तक कुछ सोच ही नहीं पाते हैं. 

यह ओशो की सबसे पसंदीदा किताबों में से भी एक है, जिसमें ओशो ने बहुत सी चीजों को अपना लिया है और हम भूल गए हैं कि यह ओशो की नहीं बल्कि निकोस कजानजाकिस की देन है. ख़ासतौर पर काम को ही ध्‍यान बना लेने की थ्‍योरी जिस पर ओशो लंबे लंबे व्‍याख्‍यान दे चुके हैं, ऐसा लगता है कि वह यहीं से ली गई है. ओशो के जन्‍म से पहले ही निकोस कजानजाकिस इसे जी चुके थे. 

अमूमन ये माना जाता है कि बूढ़े होते लोगों में सबसे पहले उत्‍साह मरता है, लेकिन जोरबा द ग्रीक में बूढ़ा शख्‍स उत्‍साह से भरा है और युवा किताबी कीड़ा है. दोनों दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े नजर आते हैं, जिनका मिलना असंभव सा लगता है. हालांकि दोनों के बीच एक दूसरे के प्रति सम्‍मान बना रहता है. विपरीत होने का ये आकर्षण ही शायद दोनों को पास लाता है. 

आध्‍यात्मिक होना पाप-पुण्‍य और अच्‍छाई-बुराई के बीच नहीं है. यह उनके पार है. चैतन्‍य हो जाने वालों के पास ऐसे सवालों को खोजने का समय नहीं है. यह सारे सवाल ह्रदय की दुर्बलता का संकेत समझे जाते हैं. यही कारण है कि योगियों ने मन की स्थिरता पर जोर दिया है. यह उपन्‍यास भी मन की स्थिरता को पाने की यात्रा है. 

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