मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

गाय काटने पर इस मुगल बादशाह ने लगाई थी रोक, आदमियों की नहीं गायों की हुई थी गिनती


गाय को लेकर भारत में बवाल छिड़ा है। गाय लाने ले जाने वालों को हर वक्त ये डर सताता रहता है कि कब, कौन आकर पिटाई कर दे कहा नहीं जा सकता है। ऐसे में एक किस्सा 1857 का याद आता है। जी हां, ये वो वक्त था जब गाय को लेकर समाज आज ही की तरह काफी संवेदनशील था।

1857 में जब क्रांति शुरू हुई तो मेरठ और अन्य इलाकों से बहुत से सैनिक अंग्रेजों को मारते-काटते दिल्ली आ पहुंचे। जहां पर उन्होंने अंग्रेजों को मार भगाया। अंग्रेज भाग गए तो सैनिकों को थोड़ी फुर्सत मिली। उसी दौरान एक खबर ने हर किसी को चौंका दिया वो खबर थी कि टोंक से आए गाजी इस बात पर अड़ गए कि बकरीद के दिन जामा मस्जिद के सामने खुले में गाय काटेंगे। यदि कोई विरोध करेगा तो उसे भी मार देंगे। इसके साथ ही एक दूसरी खबर थी जिसमें हिन्दू सैनिकों ने पांच कसाइयों की हत्या की। हिन्दू सैनिकों ने उन पांच कसाइयों को गाय काटने के आरोप में मार गिराया था। ये खबर सुनकर के मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर बहुत दुखी हुए। बहादुरशाह की मां खुद एक हिन्दू थी। ऐसे में गाय के प्रति जफर का प्रेम समझा जा सकता है।

1857 का ये वो दौर था जब अंग्रेजों को दिल्ली से बाहर निकल दिया गया था। ऐसे में जफर की सबसे बडी चिंता ये थी कि अंग्रेजों को दिल्ली से भगाने के बाद गाय को लेकर हिन्दू और मुसलमानों में किसी तरह का विवाद परेशानी का सबब बन सकता है। ऐसे में उन्होंनें गाय को मारने और गाय का गोश्त खाने पर पाबंदी लगा दी थी। उस वक्त आदेश था कि यदि कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उसे सख्त सजा दी जाएगी और तोप से उड़ा दिया जाएगा। उस वक्त सिपाहियों ने काफी सख्ती दिखाई और ऐसा करने वाले कई लोगों को गिरफ्तार भी किया।

गाय को जिबह यानी काटने का अंदेशा देखकर उन्होंने गायों की संख्या गिनने का भी आदेश दिया था। अपने आदेश में उन्होंने दिल्ली के हर मुस्लिम परिवार में कितनी गाय है कि गणना कर छह घंटे में दरबार में रिपोर्ट देने के लिए कहा था। साथ ही कोतवाल को आदेश दिया गया था कि वो ऊंची आवाज में दिल्ली में ये घोषणा कर दे कि यहां पर गाय मारने पर पाबंदी है और जिसने इस आदेश पर अमल नहीं किया उसे सख्त से सख्त सजा दी जाएगी। विलियम डेलरिंपल की किताब आखिरी मुगल में इस बारे में बताया गया है। साथ ही कुछ अन्य किताबें भी 1857 की क्रांति के बारे में बात करती है तो जफर के इस फैसले के बारे में बताती हैं।

जफर का ये आदेश दिल्ली को अमन-चैन की ओर ले गया। उस साल बकरीद भी शांति से निकल गई और किसी तरह का फसाद नहीं हुआ। एक आम हिन्दुस्तानी इससे काफी खुश था लेकिन अंग्रेजों को इससे निराशा हुई। वे हिन्दू मुसलमानों के बीच खाई बढ़ता देखना चाहते थे लेकिन जफर के एक फैसले ने इसे रोक दिया। हालांकि बाद में अंग्रेजों ने इस क्रांति को दबाने के लिए एक बार हमला किया और फिर दिल्ली बहादुरशाह जफर की पकड़ से दूर हो गया। 

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