बुधवार, 7 दिसंबर 2016

नोटबंदीः जीरो लाइन पर खड़े हैं तो आपके लिए पानी ही पानी है, जहां आपको डूब मरना है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को अचानक 500 और 1000 रुपए के नोटों को चलता कर दिया। इधर मोदी का ऐलान हुआ और उधर देश भर में लोगों की कतारें लगनी शुरू हो गईं। ये कतारें सिर्फ एटीएम, बैंक या फिर पेट्रोल पंपों पर नहीं हैं। असल में जो लाइनें इन स्थानों पर लगी हैं, उनसे अलग तीन अदृश्य लाइनें हमेशा से मौजूद रही हैं। 

नोटबंदी के फैसले के बाद बहुत से लोग पीएम मोदी के निर्णय की प्रशंसा कर रहे हैं तो बहुत से लोग विरोध में हैं। अब जो थोड़े से लोग बच गए हैं वे न उधर हैं न इधर हैं। पहली दो लाइनों के लोगों की खूब सुनी जा रही है, लेकिन इस तीसरी दुनिया की न किसी को खबर है और न ही कोई इसकी परवाह कर रहा है। 

प्रशंसा और विरोध के बीच जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो ये है कि ज्यादातर लोग तर्क के बजाय सिर्फ अपनी बात मनवाना चाहते हैं। जो थोड़े से लोग तर्क कर रहे हैं, उनके पास अपने समर्थन में कई तर्क हैं लेकिन विरोधी के तर्कों को वो सुनना ही नहीं चाहते हैं। टीवी की बहसें राजनीतिक दलों की नूरा कुश्ती बन चुकी हैं जहां पक्ष को निर्णय की प्रशंसा करना जरूरी है तो विपक्ष को आलोचना का सहारा। 

अगर हम इन सारी बातों को किनारे रख भी दें तो जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो है इस देश का खेमों में बंट जाना। ऐसा लगता है जैसे विरोध और प्रशंसा दो ध्रुवों में बंट गए हों। एक उत्तरी ध्रुव है और दूसरा दक्षिणी ध्रुव है। आप यदि देखें तो पाएंगे कि इन ध्रुवों के बीच में जिंदा रहने के लिए कोई जगह नहीं है। आप लकीर के एक तरफ हैं या लकीर के दूसरी तरफ। यदि आप सोच रहे हैं कि मैं लकीर पर खड़ा होकर दोनों पक्षों को परखना चाहता हूं तो आप चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाएंगे। एक पक्ष के आपको अपनी ओर लाने की कोशिश में ऐसे ऐसे तर्क देंगे कि आप चकरा जांएंगे तो दूसरा भी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। 

रही बात उन लोगों की जो दोनों से जान छुड़ाकर अब भी जीरो लाइन पर खड़े हैं उन्हें पता नहीं कि उनका शिकार कौन करेगा। ऐसा लगता है कि आप की यदि कोई निश्चित विचारधारा नहीं है तो आप का कोई वजूद ही नहीं है। यदि आपने एक निर्णय की प्रशंसा की और दूसरे की आलोचना तो यकीन मानिए आप के हाथ से दोनों ध्रुव फिसल गए हैं। अब आपके लिए कोई जमीन नहीं बस पानी ही पानी है। जहां पर आपको जाकर डूब मरना है। 

- अभिषेक


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