सर्दियों के उन दिनों में जब आॅफिस का काम बोझ लगने लगता है तो लोग अक्सर चाय की चुस्कियों के लिए बाहर की थड़ियों पर अडडा जमा लेते हैं। ऐसे ही एक दिन चाय की चुस्कियों के साथ तीन बच्चियां उस पत्रकार के सामने आ खड़ी हुई। पत्रकार ने कुछ बिस्किट लिए और उन्हें थमा दिए। ये कहानी एक दिन शुरू हुई और उसके बाद ये किस्सा रोजाना का हिस्सा बन गया। तय समय पर वो तीनों आ जातीं और रोजाना बिस्किट का पैकेट लेकर चली जातीं।
एक दिन अखबार पढ़ते-पढ़ते एक खबर पर नजर गई। खबर का मजमून कुछ यूं था कि एक आदमी ने कुछ बच्चियों की मदद की। खबर को आम आदमी ने हाथों हाथ लिया और उस आदमी की खूब वाहवाही हुई। खबर को लोगों ने पढा और भुला दिया। सिवाय उस पत्रकार के। अगले दिन उसने उन बच्चियों से उनके घरवालों के बारे में पूछा। माता-पिता, रोजी-रोटी जैसे कर्इ सवाल किए। तीनों को अपने घरवालों के बारे में पता नहीं था। पत्रकार ने उनकी मदद करने की ठानी। वह उन्हें अपने घर ले गया। पत्रकार की बीवी ने उन्हें नहलाया, अच्छे कपड़े पहनाए और अच्छा खाना खिलाया। काली फ्राॅक पर नीले-पीले सितारों का जमघट उन बच्चियों को खूब पसंद आया। बाद में जहां से वो पत्रकार उन्हें लेकर गया था उसी जगह पर छोड़ भी गया।
पेट भरा था तो वो दिन किसी तरह से निकल गया। धीरे-धीरे दूसरा दिन गुजरा, तीसरा दिन भी। उन बच्चियों को कुछ नहीं मिला। अच्छे कपड़े देखकर लोगों ने भीख देना भी बंद कर दिया। कहते इतने अच्छे कपड़े और भिखारी हो ही नहीं सकती। कोई कहता किसी गिरोह से जुड़ी हैं। जितने मुंह खुलते गए उन बच्चियों के लिए उतनी ही बातें फैलती गई। पहले तो कोई दया से कुछ दे जाता था अब लोगों को नए कपड़ों से नफरत होने लगी। कपड़े भी ऐसे कि घिसने का नाम ही नहीं लेते थे। इसी बीच पत्रकार घूमने दूसरे शहर चला गया। बिस्किट का वो पैकेट भी अब बंद हो गया।
फिर एक दिन अखबार में एक कोने में एक छोटी सी खबर छपी। तीन बहनों ने भूख के कारण दम तोड़ा। छोटी खबर पर बड़ी संपादकीय भी छपी। एक दिन टीवी का आधा घंटा ‘आखिर इस मौत के लिए जिम्मेदार कौन?‘ शीर्षक से आबाद रहा। फिर शांति, शांति, शांति.....।
कहानी के आखिरी मोड पर पत्रकार भी लौट आया। उसे उन बच्चियों की मौत के बारे में पता चला। पुराने अडडे पर गमगीन पत्रकार ने दुख जताने के लिए सिगरेट सुलगाई। चाय का गिलास थामा। ठोडी को दूसरे हाथ की कलाई से थामा और सोचा कितना संवेदनहीन है आज का इंसान। वो वापस आॅफिस लौट आया। आज किसी दूसरे काम में मन नहीं लग रहा था तो सोचा अपना ब्लाॅग ही लिख लूं। कई दिनों से लिखा नहीं था। अब पत्रकार अपना ब्लाॅग लिख रहा है, ‘अब पछताते होत क्या जब...।' ब्लाॅग लिखकर उन्होंने पोस्ट किया और देखा अरे वाह एक घंटे में 500 लोगों ने पढ़ा है। क्या बात है? आज का दिन बन गया।
- अभिषेक
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