शनिवार, 24 सितंबर 2016

कितना संवेदनहीन है आज का इंसान

सर्दियों के उन दिनों में जब आॅफिस का काम बोझ लगने लगता है तो लोग अक्सर चाय की चुस्कियों के लिए बाहर की थड़ियों पर अडडा जमा लेते हैं। ऐसे ही एक दिन चाय की चुस्कियों के साथ तीन बच्चियां उस पत्रकार के सामने आ खड़ी हुई। पत्रकार ने कुछ बिस्किट लिए और उन्हें थमा दिए। ये कहानी एक दिन शुरू हुई और उसके बाद ये किस्सा रोजाना का हिस्सा बन गया। तय समय पर वो तीनों आ जातीं और रोजाना बिस्किट का पैकेट लेकर चली जातीं। 

एक दिन अखबार पढ़ते-पढ़ते एक खबर पर नजर गई। खबर का मजमून कुछ यूं था कि एक आदमी ने कुछ बच्चियों की मदद की। खबर को आम आदमी ने हाथों हाथ लिया और उस आदमी की खूब वाहवाही हुई। खबर को लोगों ने पढा और भुला दिया। सिवाय उस पत्रकार के। अगले दिन उसने उन बच्चियों से उनके घरवालों के बारे में पूछा। माता-पिता, रोजी-रोटी जैसे कर्इ सवाल किए। तीनों को अपने घरवालों के बारे में पता नहीं था। पत्रकार ने उनकी मदद करने की ठानी। वह उन्हें अपने घर ले गया। पत्रकार की बीवी ने उन्हें नहलाया, अच्छे कपड़े पहनाए और अच्छा खाना खिलाया। काली फ्राॅक पर नीले-पीले सितारों का जमघट उन बच्चियों को खूब पसंद आया। बाद में जहां से वो पत्रकार उन्हें लेकर गया था उसी जगह पर छोड़ भी गया। 

पेट भरा था तो वो दिन किसी तरह से निकल गया। धीरे-धीरे दूसरा दिन गुजरा, तीसरा दिन भी। उन बच्चियों को कुछ नहीं मिला। अच्छे कपड़े देखकर लोगों ने भीख देना भी बंद कर दिया। कहते इतने अच्छे कपड़े और भिखारी हो ही नहीं सकती। कोई कहता किसी गिरोह से जुड़ी हैं। जितने मुंह खुलते गए उन बच्चियों के लिए उतनी ही बातें फैलती गई। पहले तो कोई दया से कुछ दे जाता था अब लोगों को नए कपड़ों से नफरत होने लगी। कपड़े भी ऐसे कि घिसने का नाम ही नहीं लेते थे। इसी बीच पत्रकार घूमने दूसरे शहर चला गया। बिस्किट का वो पैकेट भी अब बंद हो गया। 

फिर एक दिन अखबार में एक कोने में एक छोटी सी खबर छपी। तीन बहनों ने भूख के कारण दम तोड़ा। छोटी खबर पर बड़ी संपादकीय भी छपी। एक दिन टीवी का आधा घंटा ‘आखिर इस मौत के लिए जिम्मेदार कौन?‘ शीर्षक से आबाद रहा। फिर शांति, शांति, शांति.....। 

कहानी के आखिरी मोड पर पत्रकार भी लौट आया। उसे उन बच्चियों की मौत के बारे में पता चला। पुराने अडडे पर गमगीन पत्रकार ने दुख जताने के लिए सिगरेट सुलगाई। चाय का गिलास थामा। ठोडी को दूसरे हाथ की कलाई से थामा और सोचा कितना संवेदनहीन है आज का इंसान। वो वापस आॅफिस लौट आया। आज किसी दूसरे काम में मन नहीं लग रहा था तो सोचा अपना ब्लाॅग ही लिख लूं। कई दिनों से लिखा नहीं था। अब पत्रकार अपना ब्लाॅग लिख रहा है, ‘अब पछताते होत क्या जब...।' ब्लाॅग लिखकर उन्होंने पोस्ट किया और देखा अरे वाह एक घंटे में 500 लोगों ने पढ़ा है। क्या बात है? आज का दिन बन गया। 

- अभिषेक

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

शिकायत मत कीजिए, टिश्यू पेपर से असहिष्णुता पोंछ लीजिए

मैं बहुत ज्यादा सहिष्णु आदमी हूं। ये पंक्ति पढ़कर आपको जरूर लगा होगा कि मैं अपने मुंह मियां मिठठू बन रहा हूं, लेकिन सच बात कहने का मुझे अधिकार जरूर है। एक कदम और आगे बढाऊं तो मुझे लगता है कि देश के ज्यादातर लोग बेहद सहिष्णु हैं। आपको लगता होगा कि ऐसे दौर में जब लोग एक दूसरे को गरियाने का मौका नहीं छोड़ रहे हैं। मैं उलटी गंगा पहाड़ पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा हूं। फिर भी आप जितना मुंह बनाएं ये सही है कि आम आदमी इतना सहिष्णु है कि अपने अधिकारों को लेकर भी सहिष्णु रवैया अपना लेता है और मुंह की खाता है। आप ऐसे नहीं मानेंगे जानता था तो सुनिए एक वाकया सुना देता हूं। 

पिछले दिनों एक ढाबे पर खाना खाते वक्त आसपास लोगों का जमघट लगा था। बस उसी को देखकर यकीन हो गया कि हम कितने सहिष्णु हैं। दरअसल, आसपास के लोग खाने के लिए प्लेट का इंतजार कर रहे थे। इतने में एक आदमी तेजी से लोगों के सामने प्लेट रखकर चला जाता है। अचानक हलचल होती है, एक दूसरे की टेबल पर देखा जाता है। अपनी टेबल से उचक-उचककर लोग दूसरे की टेबल पर टिश्यू पेपर ढूंढते नजर आते हैं। मैं हैरानी से उन्हें देखता हूं आखिर ये हो क्या रहा है? 

थोड़ी ही देर में मेरी टेबल पर भी थाली आ जाती है। थाली देखकर मैं कहता हूं, अरे ये थाली कितनी चिकनी है। लगता है जैसे ढंग से साफ नहीं किया गया है। तभी मेरे सामने बैठा व्यक्ति कहता है हां ये टिश्यू ले लो। मैं देखता हूं कि वह भी अपनी उस चिकनाई लिए हुए थाली को टिश्यू से पोंछ रहा है। मैंने पूछा आपने इसके लिए कहा नहीं। उसने कहा, नहीं हो जाता है। इतना घी डालता है तो कहां से उतरेगी इतनी चिकनाई। मैं भी अपनी थाली टिश्यू से पोंछते हुए सोचता हूं इससे ज्यादा सहिष्णुता कहां दिखाई देगी। 

मैं करीब आधे घंटे तक वहां पर बैठा रहा। जो भी आया उसने थाली आने के बाद टिश्यू मांगा। अब आप समझ ही गए होंगे कि वहां पर बैठे हर आदमी के लिए टिश्यू की क्या अहमियत रही होगी? वहां आने वाला हर आदमी खुद पर सहिष्णुता की चाशनी जाने कहां से उडेलकर आया होगा। हम परंपरागत रूप से इसी तरह के सहिष्णु हैं। 

इस सहिष्णुता की कहानी को देख-सुनकर अमिताभ बच्चन की एक फिल्म का डायलाॅग याद आ गया जब अमिताभ अपनी गरजती आवाज में कहते हैं, 'हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहां से शुरू हो जाती है।' टिश्यू पेपर का वाकया देखकर लगता है कि एक आदमी ने टिश्यू मांगा और पूरा जमाना सहिष्णु हो गया। तो जनाब अब रोजाना असहिष्णुता को लेकर तंग करना बंद कीजिए और थोड़े सहिष्णु हो जाइए। हां, इस बार शिकायत की जगह टिश्यू मांगिएगा। आपके सबसे ज्यादा सहिष्णु होने का यही प्रमाण होगा। शायद इससे आपकी सारी असहिष्णुता पोंछ दी जाए।

- अभिषेक