मंगलवार, 16 अगस्त 2016

स्वतंत्रता दिवस पर PM-CM का भाषण नहीं ज्ञानी की खीर याद रही

मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। 


लीजिए 70 वां स्वतंत्रता दिवस भी बीत गया। हर बार की तरह। सच कहूं तो मुझे पिछले कई सालों से स्वतंत्रता दिवस को लेकर ज्यादा कुछ भी याद नहीं है। हमेशा लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण, शहीदों को श्रद्धांजलि, तिरंगे को सलामी जैसे दृश्य हमेशा नजर आते हैं। हर बार कई खबरें बनती हैं, लगती हैं। ये नजारे हर बार आम होते हैं। शायद यही कारण है कि हमें याद ही नहीं रहते। आम आदमी के लिए 15 अगस्त का दिन छुटटी का होता है। जैसे हमें अपने स्वतंत्रता दिवस से कोई मतलब ही नहीं है। करीब 70 सालों से जो होता आया है वो इस बार भी होगा, तो भला कौन भाव देगा लेकिन कुछ लोगों के लिए ये दिन होली-दिवाली, ईद-क्रिसमस से बढकर होता है। 

कई सालों से 15 अगस्त और 26 जनवरी की सुबह आॅफिस में ही बीतती रही है। स्वतंत्रता दिवस पर भी मैं इस बार आॅफिस में ही था। आॅफिस में ही स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम देखा। प्रधानमंत्री ने क्या कहा, आतंकवादियों ने गोलियां बरसाईं, महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र को कोसा जैसी खबरों में कब दोपहर का एक बज गया हमें पता ही नहीं चला। हम दो लोग आॅफिस से चाय पीने के लिए बाहर निकले। चाय की थड़ी पर कुछ देर तक यूं ही इधर-उधर की बातें की। जब वापस आॅफिस जा रहे थे तो एक ढाबे से अचानक आवाज आई भाईसाहब, खीर पी जाओ। जयपुर में पीटीआई की नई बन रही इमारत से सटकर एक व्यक्ति ढाबा चलाता है। ये उसी की आवाज थी। उसका नाम है ज्ञानी (सभी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं।) उन्होंने आग्रह किया तो चले गए। 

हमने पूछा काहे की खीर है। उसने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा बस ऐसे ही, स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है। अनायास ही मुंह से निकल गया ‘स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है‘। आज तक कई तरह के प्रसाद सुने थे लेकिन स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद पहली बार सुना। वो भी एक ऐसे शख्स से जो किसी दूसरे राज्य से रोजी-रोटी की तलाश में जयपुर आया है। वो स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा है। फिर भी हमने कहा,  ‘अरे यार, हमें तो जाकर खाना भी खाना है।‘
उसने जोर देते हुए कहा- अरे, थोड़ी सी पी जाओ। 

हमने उसका निमंत्रण स्वीकार करते हुए मजाक-मजाक में पूछा, झंडा नहीं फहराया। उसके साथ मौजूद लोगों  ने जवाब दिया। क्यों नहीं फहराया वो देखिए। एक छोटा सा था झंडा इमारत पर जहां पीटीआई लिखा है वहां था और दूसरा मुख्यद्वार पर लगाया गया था। थोड़ी देर तक यूं ही बातें की और फिर हम लौट आए। 

मैं रास्ते भर ज्ञानी के बारे में सोचता रहा। घर पहुंचा तो भी मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। जब सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ज्यादातर अपने घरों पर 15 अगस्त की छुटटी मना रहे थे एक शख्स देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा था। ज्ञानी को सलाम, वो ऐसा ज्ञान भारत के दूसरे अज्ञानियों को भी दे। 

- अभिषेक 

शनिवार, 13 अगस्त 2016

कश्मीरः एेसे हों नुमाइंदे जो सत्ता आने पर भी कश्मीर को याद रखें

जम्मू कश्मीर में पिछले कुछ महीनों से कुछ भी ठीक नहीं है। न आतंकवादी की मौत से उपजने वाला विरोध ठीक है, न सुरक्षाबलों की गोलियों से मरने वाले और न घायलों को देखकर कुछ ठीक कहा जा सकता है। घाटी में करीब एक महीने से कर्फ्यू लगा है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा उन लोगों को उठाना पड़ता है जो रोजाना कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं। कर्फ्यू का दंश ऐसे ही लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। जो लोग रोजाना कुछ रुपए का तेल, मिर्च और दूसरे मसाले खरीदकर रोजी-रोटी का किसी तरह से जुगाड़ करते हैं उनकी हालत का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। आप खुद को वहां रखकर देखेंगे तो समझ जाएंगे कि दिन किस तरह से चिंता में गुजरता होगा और रात में हर करवट अगले दिन कर्फ्यू खुलने की दुआ मांग रही होगी। (हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि आवश्यक खाद्य पदार्थ की आपूर्ति की गर्इ है।)

कश्मीर में ये हालात कई बार ऐसा रूप ले चुके हैं। लोगों के पथराव, विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षाबलों के प्रति नफरत और भारत को दूसरा देश समझने और समझाने की कोशिशों तब भी होती थी, अब भी होती है। हमने हमेशा कश्मीर की खूबसूरती देखी लेकिन वहां के लोगों का मन पढ़ने की कोई कोशिश नहीं की। कश्मीर का जब भी जिक्र आता है हम ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, बर्फ से ढकी वादियों और खूबसूरत नजारों को ही देखते हैं। या ज्यादा हुआ तो विरोध प्रदर्शनों, मरते आतंकवादियों और सीमापार से होती गोलीबारी की घटनाओं में ही हमें जम्मू कश्मीर याद रहता है। हालांकि जम्मू कश्मीर के आम आदमी को हम भुला देते हैं। 

आज कश्मीर के जो हालात हैं वो कश्मीर कई बार झेल चुका है। 1947 से पहले और बाद में ऐसे हालात कई बार बने, सुधरे हैं। ये विद्रोह आज नहीं भड़का है। 1947 से पहले जब कश्मीर पर डोगरा राजवंश का कब्जा था तब भी कई बार विरोध प्रदर्शनों के दौर होते रहते थे। मुस्लिम बहुत जनसंख्या और हिन्दू शासक के कारण आम आदमी को ये लगता था कि उनका भला नहीं हो सकता है। एक हद तक ये बात सही भी थी। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद सरकारी नौकरियों में हिन्दुआें और सिक्खों का बोलबाला था। 

1947 में जब राजे-रजवाड़े भारत और पाकिस्तान में मिल रहे थे उस वक्त जम्मू कश्मीर के राजा हरिसिंह ने कश्मीर को भारत आैर पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की काफी कोशिश की। इसका कारण ये माना जाता है कि उन्हें अंदेशा था कि शेख अब्दुल्ला, नेहरू के करीबी हैं इसलिए यदि भारत में वे अपने राज्य का विलय करते हैं तो वहां पर शेख अब्दुल्ला सर्वेसर्वा होंगे और उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी। वहीं पाकिस्तान के साथ मिलना उन्हें इसलिए मुनासिब नहीं लगा होगा क्योंकि पाकिस्तान कभी भी मुस्लिम बहुल जनता पर एक हिन्दू शासक को कतई स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि उनका स्वतंत्र राष्ट्र बनने की कोशिशों ने जम्मू कश्मीर की जनता के लिए कई तरह की मुसीबतें खड़ी कर दीं। 

आजादी से पहले ही सवा छह फुट से ज्यादा लंबे शेख अब्दुल्ला इकलौते ऐसे नेता थे जिनकी बात को कश्मीर की जनता ने अपनी आवाज माना। सरकारी नौकरियों में हो रहे भेदभाव के भुगतभोगी शेख अब्दुल्ला डोगरा राजवंश के खिलाफ थे। राजवंश के खिलाफ हो रहे कई आंदोलन की अगुवाई शेख अब्दुल्ला ने की। यहां तक की 1946 में जब उन्होंने डोगरा राजवंश से कश्मीर छोड़ने की मांग की तो उन्हें राजद्रोह के आरोप में तीन साल की सजा सुनाई गई और जेल में डाल दिया गया। तकरीबन उसी वक्त जब ये साफ होने लगा था कि देा देश बनने जा रहे हैं उस वक्त हरिसिंह ने अपनी मंशा को स्पष्ट रूप से सबके सामने रख दिया। हरिसिंह ने कहा कि वे बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेंगे और खुद अपना फैसला लेंगे। 

हरिसिंह के लिए उस वक्त जो उहापोह की स्थिति थी वो आज कश्मीर के लोगाें में नजर आती है आैर इसका सबसे बड़ा कारण है अविश्वास की खार्इ जो गहरी आैर गहरी होती जा रही है। आप आैर हम आसानी से ये समझ सकते हैं कि घायल होने वाला शख्स खुद के लिए कितने लोगाें की सहानुभूति हासिल करता होगा आैर नर्इ दिल्ली के लिए कितनी नफरत पैदा कर रहा होगा। कश्मीर घाटी में पिछले एक महीने का वक्त इस नफरत को बढ़ाने वाला ही साबित हुआ है। इसके लिए अकेले पाकिस्तान को दोषी ठहराना ठीक नहीं है। लोगाें के घटते विश्वास के लिए एक हद तक वहां के नेता भी जिम्मेदार हैं, जो विपक्ष में होने पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं आैर सत्ता में आने पर सबकुछ भूल जाते हैं। खास बात ये है कि जनता के नुमाइंदे जनता से मिलने से भी डर रहे हैं। कश्मीर को एेसे नेताआें की जरूरत नहीं है जो विपक्ष तक ही उनके साथ रहें, बल्कि कश्मीर को एेसे नुमाइंदाें की जरूरत है जो सत्ता में आने पर भी उन्हें भुला न दें। 

- अभिषेक

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

गोरक्षकों, किसी को पीटकर आप ज्यादा धार्मिक नहीं हाे जाएंगे


जयपुर की हिंगोनिया गौशाला में 500 से ज्यादा गायों ने दम तोड़ दिया है। इस खबर ने गायों को लेकर देश में एक नई बहस छेड़ दी है। गायों की तस्करी को लेकर हल्ला मचाने वाले लोग चुप हैं। ये चुप्पी इतनी घनी है कि कहीं कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नजर नहीं आया आैर न ही नजर आए वे गोभक्त जो अपनी दुकानदारी गाय की भरोसे चला रहे हैं। 

गायों की रक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों की पिटाई करने वाले गोरक्षक दल भी इस मामले में अभी तक कोई विरोध नहीं जता रहे हैं। पिछले दो सालों में गो रक्षक दलों की जैसे बाढ आ गई है। छोटे-छोटे गांवों और कस्बों में गोरक्षक दलों के लोग आपको मिल जाएंगे। गायों की रक्षा के लिए ऐसे लोग कितने सतर्क हैं, इसकी बानगी हिंगोनिया गोशाला में 500 से ज्यादा गायों की मौत के मामले से पता लगती है। जहां गायें भूख और दलदल में फंसकर चारे-पानी के अभाव में दम तोड़ देती हैं और कोई गोरक्षक उन्हें बचाने नहीं आता। 

इस मामले में मैंने एक गोरक्षक से जानना चाहा तो करीब आधे घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी। मैंने पूछा कि हमने सुना है कि गोरक्षक गायों की तस्करी रोकते हैं, गायों की रक्षा के लिए और ऐसे कौनसे काम हैं जिन्हें गौरक्षक करते हैं। इस सवाल के जवाब में उन्होंने सिर्फ एक काम और बताया। उन्होंने कहा कि उनका काम गायों की तस्करी को रोकना और घायल गायों को चिकित्सा मुहैया कराना है। मैंने हिंगोनिया गौशाला को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा था लेकिन उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी प्रतिक्रिया देने में देर नहीं की। इसका कारण मेरा मीडिया में होना और एक दिन पहले ही अन्य मीडिया संस्थान से उनके पास आए फोन काॅल के बाद शायद वे ये उम्मीद कर रहे थे कि मैं भी उनसे ऐसा ही कोई सवाल पूछने जा रहा हूं। 

मेरे द्वारा सवाल पूछने से पहले ही उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी सफाई देनी शुरू कर दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हिंगोनिया में गायों की मौत के मामले में गोरक्षक जिम्मेदार नहीं हैं, ये नगरनिगम की जिम्मेदारी है। नगरनिगम के भ्रष्ट अफसर गायों की सुध नहीं ले रहे हैं। उन्होंने गायों की तुलना मांओं और बहनों से की। उन्होंने बताया कि कैसे उन पर तीन बार गोलियां चलाई गई। कैसे उन पर ट्रक चढ़ाने का प्रयास हुआ। कैसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से गाय की हत्या करने वाले एक व्यक्ति को पकड़वाया और कैसे अब वह व्यक्ति सजा का इंतजार कर रहा है?

उनकी मीडिया के प्रति नाराजगी भी साफ नजर आई। उन्होंने कहा कि बुरा मत मानिएगा मीडिया लगातार कह रहा है कि हिंगोनिया में गाएं मर गई गोरक्षक दल क्या कर रहा है। ये जिम्मेदारी हमारी नहीं है। बात शुरू हुई तो नगरनिगम से थी लेकिन राज्य और केन्द्र सरकार से होती पिछली कांग्रेस और फिर प्रधानमंत्री के स्तर तक भी जा पहुंची। उन्होंने राज्य और केन्द्र सरकार की भी जमकर खबर ली और कहा कि गायों की रक्षा के लिए उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा सरकार आएगी तो कुछ अच्छा होगा, लेकिन हुआ उसका उलटा गायों के मांस का एक्सपोर्ट बढ़ गया। वहीं कांग्रेस के वक्त गाय के मांस का निर्यात कम था हालांकि उन्होंने कांग्रेस को एक विशेष धर्म की सरकार बताया और कहा कि वो आएंगे तो गाय के मांस के निर्यात में कमी आ जाएगी ऐसा सोचना ही गलत है। साथ ही पीएम की तारीफ में उन्होंने कई कसीदे पढ़े और उनसे सहानुभूति जताते हुए कहा कि एक अकेला आदमी सबकुछ कैसे कर सकता है? (ये बातचीत प्रधानमंत्री के गोरक्षा पर आए बयान से पहले की है। ) हालांकि इसके दो-तीन दिन बाद ही पीएम का गोरक्षा पर बयान आता है। इसके अगले दिन वो एक खबर के लिए मुझे फोन करते हैं और कहते हैं कि पीएम के विरोध में नारेबाजी होगी, पीएम मोदी हाय-हाय के नारे लगेंगे, किसी को भेज दीजिए। 

गायों के नाम पर हमारे देश में गोरक्षा के नारे हैं, तस्करी रोकने की बाते हैं, छोटे-मोटे प्रदर्शन हैं लेकिन नहीं है तो कोई गायों की सुध लेने वाला नहीं है। जिस राजस्थान की हिंगोनिया गौशाला में पिछले ढाई सालों में 27000 गायें दम तोड़ देती हैं, उनके लिए आवाज उठाने के लिए कोई आगे नहीं आता है। हालांकि प्रदेश से देश तक ये बात मीडिया के जरिए पहुंचती है तो जरूर थोड़ी हलचल होती है, लेकिन छुटभैया नेताओं के प्रदर्शन से कुछ बदलने वाला नहीं है।

मेरी गोरक्षकों से गुजारिश है कि गो तस्करों को पकड़कर पीटने की अपेक्षा अगर वे गायों के लिए कुछ करना ही चाहते हैं तो अपने घरों में गायों को पालें। यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो कम से कम गायों के लिए कुछ चारे पानी की ही व्यवस्था कर दें। किसी को मार पीटकर ही गायों की सेवा की जा सकती है ऐसा नहीं है। गायों के लिए चारे-पानी और इलाज की व्यवस्था कर देंगे तो भी किसी को पीटकर धार्मिक कहलाने की अपेक्षा कहीं ज्यादा धार्मिक नजर आएंगे। 

- अभिषेक

सोमवार, 1 अगस्त 2016

इरोम शर्मिलाः नर्इ पारी में अनशन खत्म होगा, AFSPA का विरोध नहीं


इतिहास खुद को नहीं लिखता, इतिहास को लोग लिखते हैं और वो भी अपने कामों से। 9 अगस्त का सूरज जब क्षितिज की तन्हाइयों को छोड़कर निकलेगा तो उमंग और उत्साह से भरा होगा। सिर्फ इसलिए कि वो नया इतिहास बनते देखेगा, 16 सालों के संघर्ष के बाद वो संघर्ष के तरीकों को बदलते देखेगा, अनशन को राजनीति में बदलते देखेगा, वो एक आम महिला से संघर्ष की जीती जागती मिसाल बनने वाली उसे महिला केा देखेगा जो 16 सालों की अग्नि परीक्षा में कभी निस्तेज नहीं पड़ी, कभी उस अग्नि से डरी नहीं। इतिहास 9 अगस्त को इरोम शर्मिला को अनशन समाप्त करते देखेगा। 

इरोम ने अपने अनशन को समाप्त करने के लिए 9 अगस्त का दिन चुना है। इरोम ने ये दिन क्यों चुना है ये बेहतर ढंग से तो वही बता सकती हैं, लेकिन 9 अगस्त का दिन आजादी की लड़ाई का वो दिन है जब भारत ने अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए पूर्ण रूप से कह दिया था। 9 अगस्त 1942 का दिन भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत का दिन था। इरोम का 9 अगस्त को अनशन समाप्त करने का निर्णय किसी भी और दिनों की तरह ही है या फिर उनकी मंशा मणिपुर में एेसे ही आंदोलन को जिंदा करने की है। भारत छोड़ो आंदोलन में गांधीजी ने नारा दिया था कि करो या मरो। क्या इरोम अपने संघर्ष को इस स्तर तक ले जाने का इरादा रखती हैं। 16 साल के संघर्ष में उन्होंने संघर्ष की जिन बुलंदियों को छुआ है वो अद्वितीय है लेकिन क्या राजनीति में रहते हुए वो ऐसा कर पाएगी? 

इरोम का विरोध सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून 1958 यानी अफस्पा के खिलाफ है। 1 नवम्बर 2000 को सैन्यबलों ने जब मणिपुर में 10 लोगों को मार गिराया तो इसके बाद इरोम ने अपना सत्याग्रह शुरू किया। आज तक इरोम पुलिस गिरफ्त में एक अंडर ट्रायल कैदी है। इंफाल के जवाहरलाल नेहरू इंस्टीटयूट आॅफ मेडिकल साइंस में एक कमरा उनके लिए है, जहां उन्हें जबर्दस्ती नाक से खाना दिया जाता है। उन पर आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा चल रहा है। इन सारी चीजों के बावजूद वे आज भी संघर्ष कर रही हैं। 9 अगस्त को अनशन छोड़ने के निर्णय को लेकर लगता है कि जैसे भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त पूरे भारत से आवाज उठी थी कि अंग्रेजों भारत छोड़ो वैसी ही आवाज वे मणिपुर में अफस्पा के विरोध में उठाना चाहती हैं। उनकी नर्इ पारी में अनशन जरूर खत्म होगा, लेकिन अफस्पा का विरोध नहीं। 

1980 से अफस्पा का दंश झेल रहे मणिपुर के हितों की बात करने वाली इरोम ने अनशन छोड़ते हुए कहा है कि उन्हें सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। यहां ध्यान देने की बात ये है कि पिछले करीब 36 सालों में किसी एक दल की सरकार नहीं रहीं। सरकारें बदलती रहीं लेकिन उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। इरोम के अनशन को आम आदमी ने सम्मान जरूर दिया लेकिन सरकारों ने कोई सकारात्मक पहल की हो ऐसा नजर नहीं आता। 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनशन को विरोध का सबसे असरदार हथियार माना जाता है, लेकिन इरोम के अनशन को तवज्जो न मिलना इस बात का संकेत है कि सरकारें उन मामलों को ऐसे ही छोड़ देती हैं जिन पर मीडिया में एक समय के बाद हल्ला मचना कम हो जाता है। इरोम का मामला हर साल आने वाली एक बरसी की तरह था जब हर साल कुछ इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में छोटी सी एक खबर दिखाई पड़ जाती थी कि आज इरोम के अनशन को इतने साल हो गए हैं। इससे ज्यादा उनके लिए इरोम का कोई वजूद नहीं है। 16 सालों तक अनशन करने वाली इरोम की खबरें अजब-गजब जैसे सेक्शनों में नहीं लगी ये भी गनीमत ही है। 

इरोम अपनी नई पारी शुरू करने जा रही हैं। वो कहती हैं कि राजनीति में कदम रखूंगी, शादी करूंगी। ये साबित करता है कि संघर्ष में भी मोहब्बत छिपी होती है। अफस्पा के खिलाफ संघर्ष ये दर्शाता है कि उन्हें मणिपुर और मणिपुर के लोगों से कितनी मोहब्बत है तो व्यक्तिगत जिंदगी में भी एक शख्स से मोहब्बत का असर है कि वे तमाम तकलीफों के बावजूद शादी करने जा रही हैं। इरोम के 16 साल लम्बे संघर्ष के लिए सलाम और भविष्य के संघर्ष के लिए शुभकामनाएं। वो राजनीति में कदम रखने जा रही हैं तो एक दुआ भी है कि वो संघर्ष में तपकर निकले नेताओं की तरह न निकले जो अपने संघर्ष को बोते गए और हर साल फसल की तरह राजनीतिक मुनाफा काटते गए। 

- अभिषेक