सोमवार, 1 अगस्त 2016

इरोम शर्मिलाः नर्इ पारी में अनशन खत्म होगा, AFSPA का विरोध नहीं


इतिहास खुद को नहीं लिखता, इतिहास को लोग लिखते हैं और वो भी अपने कामों से। 9 अगस्त का सूरज जब क्षितिज की तन्हाइयों को छोड़कर निकलेगा तो उमंग और उत्साह से भरा होगा। सिर्फ इसलिए कि वो नया इतिहास बनते देखेगा, 16 सालों के संघर्ष के बाद वो संघर्ष के तरीकों को बदलते देखेगा, अनशन को राजनीति में बदलते देखेगा, वो एक आम महिला से संघर्ष की जीती जागती मिसाल बनने वाली उसे महिला केा देखेगा जो 16 सालों की अग्नि परीक्षा में कभी निस्तेज नहीं पड़ी, कभी उस अग्नि से डरी नहीं। इतिहास 9 अगस्त को इरोम शर्मिला को अनशन समाप्त करते देखेगा। 

इरोम ने अपने अनशन को समाप्त करने के लिए 9 अगस्त का दिन चुना है। इरोम ने ये दिन क्यों चुना है ये बेहतर ढंग से तो वही बता सकती हैं, लेकिन 9 अगस्त का दिन आजादी की लड़ाई का वो दिन है जब भारत ने अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए पूर्ण रूप से कह दिया था। 9 अगस्त 1942 का दिन भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत का दिन था। इरोम का 9 अगस्त को अनशन समाप्त करने का निर्णय किसी भी और दिनों की तरह ही है या फिर उनकी मंशा मणिपुर में एेसे ही आंदोलन को जिंदा करने की है। भारत छोड़ो आंदोलन में गांधीजी ने नारा दिया था कि करो या मरो। क्या इरोम अपने संघर्ष को इस स्तर तक ले जाने का इरादा रखती हैं। 16 साल के संघर्ष में उन्होंने संघर्ष की जिन बुलंदियों को छुआ है वो अद्वितीय है लेकिन क्या राजनीति में रहते हुए वो ऐसा कर पाएगी? 

इरोम का विरोध सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून 1958 यानी अफस्पा के खिलाफ है। 1 नवम्बर 2000 को सैन्यबलों ने जब मणिपुर में 10 लोगों को मार गिराया तो इसके बाद इरोम ने अपना सत्याग्रह शुरू किया। आज तक इरोम पुलिस गिरफ्त में एक अंडर ट्रायल कैदी है। इंफाल के जवाहरलाल नेहरू इंस्टीटयूट आॅफ मेडिकल साइंस में एक कमरा उनके लिए है, जहां उन्हें जबर्दस्ती नाक से खाना दिया जाता है। उन पर आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा चल रहा है। इन सारी चीजों के बावजूद वे आज भी संघर्ष कर रही हैं। 9 अगस्त को अनशन छोड़ने के निर्णय को लेकर लगता है कि जैसे भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त पूरे भारत से आवाज उठी थी कि अंग्रेजों भारत छोड़ो वैसी ही आवाज वे मणिपुर में अफस्पा के विरोध में उठाना चाहती हैं। उनकी नर्इ पारी में अनशन जरूर खत्म होगा, लेकिन अफस्पा का विरोध नहीं। 

1980 से अफस्पा का दंश झेल रहे मणिपुर के हितों की बात करने वाली इरोम ने अनशन छोड़ते हुए कहा है कि उन्हें सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। यहां ध्यान देने की बात ये है कि पिछले करीब 36 सालों में किसी एक दल की सरकार नहीं रहीं। सरकारें बदलती रहीं लेकिन उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। इरोम के अनशन को आम आदमी ने सम्मान जरूर दिया लेकिन सरकारों ने कोई सकारात्मक पहल की हो ऐसा नजर नहीं आता। 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनशन को विरोध का सबसे असरदार हथियार माना जाता है, लेकिन इरोम के अनशन को तवज्जो न मिलना इस बात का संकेत है कि सरकारें उन मामलों को ऐसे ही छोड़ देती हैं जिन पर मीडिया में एक समय के बाद हल्ला मचना कम हो जाता है। इरोम का मामला हर साल आने वाली एक बरसी की तरह था जब हर साल कुछ इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में छोटी सी एक खबर दिखाई पड़ जाती थी कि आज इरोम के अनशन को इतने साल हो गए हैं। इससे ज्यादा उनके लिए इरोम का कोई वजूद नहीं है। 16 सालों तक अनशन करने वाली इरोम की खबरें अजब-गजब जैसे सेक्शनों में नहीं लगी ये भी गनीमत ही है। 

इरोम अपनी नई पारी शुरू करने जा रही हैं। वो कहती हैं कि राजनीति में कदम रखूंगी, शादी करूंगी। ये साबित करता है कि संघर्ष में भी मोहब्बत छिपी होती है। अफस्पा के खिलाफ संघर्ष ये दर्शाता है कि उन्हें मणिपुर और मणिपुर के लोगों से कितनी मोहब्बत है तो व्यक्तिगत जिंदगी में भी एक शख्स से मोहब्बत का असर है कि वे तमाम तकलीफों के बावजूद शादी करने जा रही हैं। इरोम के 16 साल लम्बे संघर्ष के लिए सलाम और भविष्य के संघर्ष के लिए शुभकामनाएं। वो राजनीति में कदम रखने जा रही हैं तो एक दुआ भी है कि वो संघर्ष में तपकर निकले नेताओं की तरह न निकले जो अपने संघर्ष को बोते गए और हर साल फसल की तरह राजनीतिक मुनाफा काटते गए। 

- अभिषेक

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