जम्मू कश्मीर में पिछले कुछ महीनों से कुछ भी ठीक नहीं है। न आतंकवादी की मौत से उपजने वाला विरोध ठीक है, न सुरक्षाबलों की गोलियों से मरने वाले और न घायलों को देखकर कुछ ठीक कहा जा सकता है। घाटी में करीब एक महीने से कर्फ्यू लगा है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा उन लोगों को उठाना पड़ता है जो रोजाना कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं। कर्फ्यू का दंश ऐसे ही लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। जो लोग रोजाना कुछ रुपए का तेल, मिर्च और दूसरे मसाले खरीदकर रोजी-रोटी का किसी तरह से जुगाड़ करते हैं उनकी हालत का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। आप खुद को वहां रखकर देखेंगे तो समझ जाएंगे कि दिन किस तरह से चिंता में गुजरता होगा और रात में हर करवट अगले दिन कर्फ्यू खुलने की दुआ मांग रही होगी। (हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि आवश्यक खाद्य पदार्थ की आपूर्ति की गर्इ है।)
कश्मीर में ये हालात कई बार ऐसा रूप ले चुके हैं। लोगों के पथराव, विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षाबलों के प्रति नफरत और भारत को दूसरा देश समझने और समझाने की कोशिशों तब भी होती थी, अब भी होती है। हमने हमेशा कश्मीर की खूबसूरती देखी लेकिन वहां के लोगों का मन पढ़ने की कोई कोशिश नहीं की। कश्मीर का जब भी जिक्र आता है हम ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, बर्फ से ढकी वादियों और खूबसूरत नजारों को ही देखते हैं। या ज्यादा हुआ तो विरोध प्रदर्शनों, मरते आतंकवादियों और सीमापार से होती गोलीबारी की घटनाओं में ही हमें जम्मू कश्मीर याद रहता है। हालांकि जम्मू कश्मीर के आम आदमी को हम भुला देते हैं।
आज कश्मीर के जो हालात हैं वो कश्मीर कई बार झेल चुका है। 1947 से पहले और बाद में ऐसे हालात कई बार बने, सुधरे हैं। ये विद्रोह आज नहीं भड़का है। 1947 से पहले जब कश्मीर पर डोगरा राजवंश का कब्जा था तब भी कई बार विरोध प्रदर्शनों के दौर होते रहते थे। मुस्लिम बहुत जनसंख्या और हिन्दू शासक के कारण आम आदमी को ये लगता था कि उनका भला नहीं हो सकता है। एक हद तक ये बात सही भी थी। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद सरकारी नौकरियों में हिन्दुआें और सिक्खों का बोलबाला था।
1947 में जब राजे-रजवाड़े भारत और पाकिस्तान में मिल रहे थे उस वक्त जम्मू कश्मीर के राजा हरिसिंह ने कश्मीर को भारत आैर पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की काफी कोशिश की। इसका कारण ये माना जाता है कि उन्हें अंदेशा था कि शेख अब्दुल्ला, नेहरू के करीबी हैं इसलिए यदि भारत में वे अपने राज्य का विलय करते हैं तो वहां पर शेख अब्दुल्ला सर्वेसर्वा होंगे और उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी। वहीं पाकिस्तान के साथ मिलना उन्हें इसलिए मुनासिब नहीं लगा होगा क्योंकि पाकिस्तान कभी भी मुस्लिम बहुल जनता पर एक हिन्दू शासक को कतई स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि उनका स्वतंत्र राष्ट्र बनने की कोशिशों ने जम्मू कश्मीर की जनता के लिए कई तरह की मुसीबतें खड़ी कर दीं।
आजादी से पहले ही सवा छह फुट से ज्यादा लंबे शेख अब्दुल्ला इकलौते ऐसे नेता थे जिनकी बात को कश्मीर की जनता ने अपनी आवाज माना। सरकारी नौकरियों में हो रहे भेदभाव के भुगतभोगी शेख अब्दुल्ला डोगरा राजवंश के खिलाफ थे। राजवंश के खिलाफ हो रहे कई आंदोलन की अगुवाई शेख अब्दुल्ला ने की। यहां तक की 1946 में जब उन्होंने डोगरा राजवंश से कश्मीर छोड़ने की मांग की तो उन्हें राजद्रोह के आरोप में तीन साल की सजा सुनाई गई और जेल में डाल दिया गया। तकरीबन उसी वक्त जब ये साफ होने लगा था कि देा देश बनने जा रहे हैं उस वक्त हरिसिंह ने अपनी मंशा को स्पष्ट रूप से सबके सामने रख दिया। हरिसिंह ने कहा कि वे बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेंगे और खुद अपना फैसला लेंगे।
हरिसिंह के लिए उस वक्त जो उहापोह की स्थिति थी वो आज कश्मीर के लोगाें में नजर आती है आैर इसका सबसे बड़ा कारण है अविश्वास की खार्इ जो गहरी आैर गहरी होती जा रही है। आप आैर हम आसानी से ये समझ सकते हैं कि घायल होने वाला शख्स खुद के लिए कितने लोगाें की सहानुभूति हासिल करता होगा आैर नर्इ दिल्ली के लिए कितनी नफरत पैदा कर रहा होगा। कश्मीर घाटी में पिछले एक महीने का वक्त इस नफरत को बढ़ाने वाला ही साबित हुआ है। इसके लिए अकेले पाकिस्तान को दोषी ठहराना ठीक नहीं है। लोगाें के घटते विश्वास के लिए एक हद तक वहां के नेता भी जिम्मेदार हैं, जो विपक्ष में होने पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं आैर सत्ता में आने पर सबकुछ भूल जाते हैं। खास बात ये है कि जनता के नुमाइंदे जनता से मिलने से भी डर रहे हैं। कश्मीर को एेसे नेताआें की जरूरत नहीं है जो विपक्ष तक ही उनके साथ रहें, बल्कि कश्मीर को एेसे नुमाइंदाें की जरूरत है जो सत्ता में आने पर भी उन्हें भुला न दें।
- अभिषेक
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