मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा।
लीजिए 70 वां स्वतंत्रता दिवस भी बीत गया। हर बार की तरह। सच कहूं तो मुझे पिछले कई सालों से स्वतंत्रता दिवस को लेकर ज्यादा कुछ भी याद नहीं है। हमेशा लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण, शहीदों को श्रद्धांजलि, तिरंगे को सलामी जैसे दृश्य हमेशा नजर आते हैं। हर बार कई खबरें बनती हैं, लगती हैं। ये नजारे हर बार आम होते हैं। शायद यही कारण है कि हमें याद ही नहीं रहते। आम आदमी के लिए 15 अगस्त का दिन छुटटी का होता है। जैसे हमें अपने स्वतंत्रता दिवस से कोई मतलब ही नहीं है। करीब 70 सालों से जो होता आया है वो इस बार भी होगा, तो भला कौन भाव देगा लेकिन कुछ लोगों के लिए ये दिन होली-दिवाली, ईद-क्रिसमस से बढकर होता है।
कई सालों से 15 अगस्त और 26 जनवरी की सुबह आॅफिस में ही बीतती रही है। स्वतंत्रता दिवस पर भी मैं इस बार आॅफिस में ही था। आॅफिस में ही स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम देखा। प्रधानमंत्री ने क्या कहा, आतंकवादियों ने गोलियां बरसाईं, महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र को कोसा जैसी खबरों में कब दोपहर का एक बज गया हमें पता ही नहीं चला। हम दो लोग आॅफिस से चाय पीने के लिए बाहर निकले। चाय की थड़ी पर कुछ देर तक यूं ही इधर-उधर की बातें की। जब वापस आॅफिस जा रहे थे तो एक ढाबे से अचानक आवाज आई भाईसाहब, खीर पी जाओ। जयपुर में पीटीआई की नई बन रही इमारत से सटकर एक व्यक्ति ढाबा चलाता है। ये उसी की आवाज थी। उसका नाम है ज्ञानी (सभी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं।) उन्होंने आग्रह किया तो चले गए।
हमने पूछा काहे की खीर है। उसने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा बस ऐसे ही, स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है। अनायास ही मुंह से निकल गया ‘स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है‘। आज तक कई तरह के प्रसाद सुने थे लेकिन स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद पहली बार सुना। वो भी एक ऐसे शख्स से जो किसी दूसरे राज्य से रोजी-रोटी की तलाश में जयपुर आया है। वो स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा है। फिर भी हमने कहा, ‘अरे यार, हमें तो जाकर खाना भी खाना है।‘
उसने जोर देते हुए कहा- अरे, थोड़ी सी पी जाओ।
हमने उसका निमंत्रण स्वीकार करते हुए मजाक-मजाक में पूछा, झंडा नहीं फहराया। उसके साथ मौजूद लोगों ने जवाब दिया। क्यों नहीं फहराया वो देखिए। एक छोटा सा था झंडा इमारत पर जहां पीटीआई लिखा है वहां था और दूसरा मुख्यद्वार पर लगाया गया था। थोड़ी देर तक यूं ही बातें की और फिर हम लौट आए।
मैं रास्ते भर ज्ञानी के बारे में सोचता रहा। घर पहुंचा तो भी मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। जब सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ज्यादातर अपने घरों पर 15 अगस्त की छुटटी मना रहे थे एक शख्स देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा था। ज्ञानी को सलाम, वो ऐसा ज्ञान भारत के दूसरे अज्ञानियों को भी दे।
- अभिषेक
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें