जयपुर की हिंगोनिया गौशाला में 500 से ज्यादा गायों ने दम तोड़ दिया है। इस खबर ने गायों को लेकर देश में एक नई बहस छेड़ दी है। गायों की तस्करी को लेकर हल्ला मचाने वाले लोग चुप हैं। ये चुप्पी इतनी घनी है कि कहीं कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नजर नहीं आया आैर न ही नजर आए वे गोभक्त जो अपनी दुकानदारी गाय की भरोसे चला रहे हैं।
गायों की रक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों की पिटाई करने वाले गोरक्षक दल भी इस मामले में अभी तक कोई विरोध नहीं जता रहे हैं। पिछले दो सालों में गो रक्षक दलों की जैसे बाढ आ गई है। छोटे-छोटे गांवों और कस्बों में गोरक्षक दलों के लोग आपको मिल जाएंगे। गायों की रक्षा के लिए ऐसे लोग कितने सतर्क हैं, इसकी बानगी हिंगोनिया गोशाला में 500 से ज्यादा गायों की मौत के मामले से पता लगती है। जहां गायें भूख और दलदल में फंसकर चारे-पानी के अभाव में दम तोड़ देती हैं और कोई गोरक्षक उन्हें बचाने नहीं आता।
इस मामले में मैंने एक गोरक्षक से जानना चाहा तो करीब आधे घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी। मैंने पूछा कि हमने सुना है कि गोरक्षक गायों की तस्करी रोकते हैं, गायों की रक्षा के लिए और ऐसे कौनसे काम हैं जिन्हें गौरक्षक करते हैं। इस सवाल के जवाब में उन्होंने सिर्फ एक काम और बताया। उन्होंने कहा कि उनका काम गायों की तस्करी को रोकना और घायल गायों को चिकित्सा मुहैया कराना है। मैंने हिंगोनिया गौशाला को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा था लेकिन उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी प्रतिक्रिया देने में देर नहीं की। इसका कारण मेरा मीडिया में होना और एक दिन पहले ही अन्य मीडिया संस्थान से उनके पास आए फोन काॅल के बाद शायद वे ये उम्मीद कर रहे थे कि मैं भी उनसे ऐसा ही कोई सवाल पूछने जा रहा हूं।
मेरे द्वारा सवाल पूछने से पहले ही उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी सफाई देनी शुरू कर दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हिंगोनिया में गायों की मौत के मामले में गोरक्षक जिम्मेदार नहीं हैं, ये नगरनिगम की जिम्मेदारी है। नगरनिगम के भ्रष्ट अफसर गायों की सुध नहीं ले रहे हैं। उन्होंने गायों की तुलना मांओं और बहनों से की। उन्होंने बताया कि कैसे उन पर तीन बार गोलियां चलाई गई। कैसे उन पर ट्रक चढ़ाने का प्रयास हुआ। कैसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से गाय की हत्या करने वाले एक व्यक्ति को पकड़वाया और कैसे अब वह व्यक्ति सजा का इंतजार कर रहा है?
उनकी मीडिया के प्रति नाराजगी भी साफ नजर आई। उन्होंने कहा कि बुरा मत मानिएगा मीडिया लगातार कह रहा है कि हिंगोनिया में गाएं मर गई गोरक्षक दल क्या कर रहा है। ये जिम्मेदारी हमारी नहीं है। बात शुरू हुई तो नगरनिगम से थी लेकिन राज्य और केन्द्र सरकार से होती पिछली कांग्रेस और फिर प्रधानमंत्री के स्तर तक भी जा पहुंची। उन्होंने राज्य और केन्द्र सरकार की भी जमकर खबर ली और कहा कि गायों की रक्षा के लिए उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा सरकार आएगी तो कुछ अच्छा होगा, लेकिन हुआ उसका उलटा गायों के मांस का एक्सपोर्ट बढ़ गया। वहीं कांग्रेस के वक्त गाय के मांस का निर्यात कम था हालांकि उन्होंने कांग्रेस को एक विशेष धर्म की सरकार बताया और कहा कि वो आएंगे तो गाय के मांस के निर्यात में कमी आ जाएगी ऐसा सोचना ही गलत है। साथ ही पीएम की तारीफ में उन्होंने कई कसीदे पढ़े और उनसे सहानुभूति जताते हुए कहा कि एक अकेला आदमी सबकुछ कैसे कर सकता है? (ये बातचीत प्रधानमंत्री के गोरक्षा पर आए बयान से पहले की है। ) हालांकि इसके दो-तीन दिन बाद ही पीएम का गोरक्षा पर बयान आता है। इसके अगले दिन वो एक खबर के लिए मुझे फोन करते हैं और कहते हैं कि पीएम के विरोध में नारेबाजी होगी, पीएम मोदी हाय-हाय के नारे लगेंगे, किसी को भेज दीजिए।
गायों के नाम पर हमारे देश में गोरक्षा के नारे हैं, तस्करी रोकने की बाते हैं, छोटे-मोटे प्रदर्शन हैं लेकिन नहीं है तो कोई गायों की सुध लेने वाला नहीं है। जिस राजस्थान की हिंगोनिया गौशाला में पिछले ढाई सालों में 27000 गायें दम तोड़ देती हैं, उनके लिए आवाज उठाने के लिए कोई आगे नहीं आता है। हालांकि प्रदेश से देश तक ये बात मीडिया के जरिए पहुंचती है तो जरूर थोड़ी हलचल होती है, लेकिन छुटभैया नेताओं के प्रदर्शन से कुछ बदलने वाला नहीं है।
मेरी गोरक्षकों से गुजारिश है कि गो तस्करों को पकड़कर पीटने की अपेक्षा अगर वे गायों के लिए कुछ करना ही चाहते हैं तो अपने घरों में गायों को पालें। यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो कम से कम गायों के लिए कुछ चारे पानी की ही व्यवस्था कर दें। किसी को मार पीटकर ही गायों की सेवा की जा सकती है ऐसा नहीं है। गायों के लिए चारे-पानी और इलाज की व्यवस्था कर देंगे तो भी किसी को पीटकर धार्मिक कहलाने की अपेक्षा कहीं ज्यादा धार्मिक नजर आएंगे।
- अभिषेक

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