सोमवार, 25 जुलाई 2016

आज भी वो इंसाफ मांग रहे हैं आैर इंसानियत मुंह छिपा रही है

‘भगवान के घर देर है अंधेर नहीं‘, हमने अक्सर ये सुना है लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम के किसी भी सिरे को पकड़कर आप आगे बढ़ना शुरू कर दें आपको अंधेरा ही अंधेरा नजर आएगा। एक बड़े पेड़ के गिरने के बाद धरती इतनी जोर से भी नहीं हिलती की सारी इंसानियत गर्त में समा जाए, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों को मार देने की अंधी दौड़ इस कदर इंसानियत पर हावी हुई कि उस मंजर को सुनकर-पढ़कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।

देश के तत्कालीन गृह मंत्री को जूता मारकर (हालांकि जूता लगा नहीं था) चर्चा में आए पत्रकार जरनैल सिंह की किताब ‘कब कटेगी चौरासी-सिख कत्लेआम का सच‘ उन तीन दिनों के कत्लेआम को बयां करती हैं। 31 अक्टूबर 1984 से 2 अक्टूबर 1984 के उन तीन दिनों में कैसे दंगाई एक के बाद एक सिखों की लाशें बिछाते रहे? कैसे औरतें अपने पति, पिता और बच्चों को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखती आैर क्रंदन करती रहीं? कैसे दंगाई और पुलिस में कोई भेद ही नहीं रह गया था? कैसे घायल सिखों को आग के हवाले कर हत्याओं को भी क्रूरतम बना दिया गया? इन सारे सवालों के जवाब ये किताब देती है। जहां किताब को पढ़ते हुए आपको लगता है कि कैसे एक दंगा पूरी दुनिया केा आपसे बेगाना कर देता है, ऐसा लगता है कि दुनिया में अब आपका कोई नहीं है। जैसे पूरी दुनिया ने आपको मरने के लिए दंगाइयों के सामने छोड़ दिया है। हर दंगाई किसी का बेटा, भाई, पति होता है लेकिन दंगा करते वक्त एक हत्यारा ही रह हो जाता है।

पुलिस थी या दंगाई 
जरनैल सिंह अपनी किताब में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं। वे बताते हैं कि आईएएस अधिकारी कुसुमलता मित्तल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एक पुलिस अधिकारी को 'जीवित शर्म' लिखा तो दूसरे को दिल्ली पुलिस के चेहरे पर 'बदनुमा दाग' करार दिया। ये वही पुलिस अधिकारी थे जिन्हें दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाया गया था लेकिन ये दंगाइयों के ही मददगार साबित हुए। इस किताब में पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह के हवाले से बताया गया है कि देश की राजधानी में इतना बड़ा दंगा पुलिस की मदद के संभव ही नहीं है। उनके अनुसार यदि पुलिस ने थोड़ा सा भी बल का इस्तेमाल किया होता तो दंगाई इतने बड़े कत्लेआम को अंजाम ही नहीं दे पाते। इस दंगे का सबसे घृणित पहलू ये है कि दंगाइयों से जब कोई घर या इलाका फतह नहीं हुआ तो उन्होंने पुलिस को बुलाया। लोगों को मारने, उनके घरों को लूटने में जब वे नाकामयाब होते तो पुलिस को गुहार लगाते और पुलिस कत्ल और लूट में हिस्सेदार बन जाती।

राजनेताओं पर सवाल 
सिखों के कत्लेआम के बाद करीब 30 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन जिन बड़े नेताओं पर आरोप लगे वे आज भी अपना दामन बचाए चैन की बंसी बजा रहे हैं। ये उन सैंकड़ों विधवाओं के दर्द को और बढ़ा देता है जिन्होंने उस खूनी मंजर के बाद अपनी जिंदगी को यूं बुझते देखा है। कांग्रेस के बड़े नेताआें के खिलाफ इतने सुबूतों आैर गवाहों के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ पाती है। ये देश की न्याय व्यवस्था के साथ क्रूरतम खिलवाड़ सा लगता है।

अफवाहों को गर्म रखा गया
सोशल मीडिया के इस दौर में जब हमें कश्मीर की हालत देखकर इसके खतरे समझ में आ रहे हैं। हम उस दौर में उड़ने वाली अफवाहों से पैदा होने वाली नफरत को समझ सकते हैं। कानपुर में सिखों से लोगों की हमदर्दी न हो जाए इसलिए ऐसी अफवाहें फैलाई गई कि सिख फौजियों ने पास के गांवों के लोगों को गोली मार दी है। अफवाहों के ऐसे बाजार उस दौर में पूरे देश में सजे थे जिनका एक ही मकसद था सिखों के प्रति हमदर्दी और विश्वास को वातावरण न बन सके। आज के दौर में जब अफवाहें इतनी तेजी से हमारे दिलों में जहर भर देती हैं तो उस दौर का अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल नहीं है।

जरनैल सिंह चिदंबरम पर जूता फेंकने को अभूतपूर्व अन्याय के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध कहते हैं। हालांकि अपने इस कृत्य को वे गलत जरूर मानते हैं लेकिन मुद्दा सही उठाने की बात कहते हैं। उनकी किताब के शुरूआती कुछ पन्ने पलटने के बाद आप सिखों के साथ हुए उस अन्याय से रूबरू होते हैं, जिनमें दंगार्इ हाथ में वोटर लिस्ट लिए सिखों का कत्लेआम करने पर तुले थे। एक आम आदमी के लिए ये सोचना भी दिल दहला देने वाला है कि कैसे सिखों को सरियों आैर लाठियों से पीटा जाता आैर फिर उनके गले में टायर डालकर जिंदा जला दिया जाता। ये आम आदमी की प्रतिक्रिया हो ही नहीं सकती। ये सुनियोजित षड़यंत्र था जो आज भी हमारी न्याय प्रणाली को दूर से देखकर हंस रहा है।

इस मामले में बहुत कम लोगों को सजा हुर्इ है, वो भी एेसे लोगों को जिनके कंधे पर बंदूक रखकर चलार्इ गर्इ आैर फिर उनके रहनुमा बनने का दावा करने वालों ने किनारा कर लिया। तड़प-तड़प कर जान देता हर सिख जैसे आज भी अपने लिए न्याय की गुहार लगा रहा है, उनकी विधवाएं आैर बच्चे अपनों के लिए इंसाफ को पुकार रहे हैं आैर एेसा लगता है कि इंसानियत शर्म से मुंह छिपा रही है।


- अभिषेक

बुधवार, 20 जुलाई 2016

'तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है'


हम अक्सर ये सुनते हुए बड़े हुए हैं कि फिल्में समाज का आईना है। हालांकि मैं पूरी तरह से इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। एक फिल्मकार अपनी फिल्म में क्या दिखाना चाहता है। ये उस पर निर्भर करता है। फिर वो फिल्म में समाज से जुड़ी समस्या दिखाए, अंतरिक्ष की कहानी दिखाए या कुछ असाधारण या फिर कोर्इ बकवास। हां, मैं ये जरूर मानता हूं कि कभी-कभी कोई फिल्मकार हमारे अंतर्मन को फिल्म की शक्ल में जरूर सामने रखता है। ये भी एक अपवाद की तरह ही होता है लेकिन जब होता है तो उस चीज को भुला देना असंभव होता है।

आजकल एक फिल्म के कुछ दृश्यों को भुला नहीं पा रहा हूं, मैं जितना उन दृश्यों को देखता हूं स्वयं को एक अलग ही दुनिया में पाता हूं। बहुत संभव है कि ये हाॅलीवुड फिल्म किसी क्लासिक फिल्म की श्रेणी में न सम्मिलित हो लेकिन ये मेरे दिल के जरूर करीब है। ये फिल्म है ‘द लास्ट समुराई‘। फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हें भूलना असंभव है। खासतौर पर जब आप जीवन और मृत्यु की बहस को किसी चर्चा में और लंबा खींचते रहे हैं। फिल्म के आखिरी कुछ दृश्य जो कर देते हैं वो दूसरी कुछ फिल्मों के बस की बात नहीं है।

फिल्म में दो मुख्य किरदार हैं। एक है कात्सोमोटो, जिसे बखूबी निभाया है केन वाटनबे ने और दूसरा किरदार नाथन एलग्रिन का है जिसे अभिनेता टाॅम क्रूज ने नर्इ ऊंचाइयां दी है। फिल्म के एक संवाद में टाॅम क्रूज से पूछा जाता है कि ये बताइए कि वो कैसे मरे थे? टाॅम क्रूज का जवाब होता है ‘ये सुनिए वो जिए कैसे थे?‘ हमेशा मरने वाले की मौत का कारण जानने में हमारी दिलचस्पी होती है, लेकिन मरने वाले ने अपनी जिंदगी कैसे जी? ये पूछना हम हमेशा भूल जाते हैं। शुरूआती दौर में जब मेरे पिता मुझे खबर लिखना सिखाते थे तो एक दिन मैंने एक बार ‘मृत्यु‘ को ‘मृत्यू‘ लिख दिया था। उस वक्त उन्होंने मुझे टोकते हुए कहा था कि मृत्यु बहुत छोटी बात है हर किसी को आनी है मात्रा छोटी आएगी। ‘द लास्ट समुराई‘ भी हमें यही सिखाती है। मृत्यु तो जिंदगी का एक हिस्सा है और हम हमेशा मृत्यु की बात करते हैं, जिंदगी को भूल जाते हैं।

फिल्म के एक दृश्य में समुराई अपनी तलवारों और दूसरे परंपरागत हथियारों से लैस होकर बंदूकधारी सैनिकों से टकरा जाते हैं। दिमाग वालों के लिए ये मूर्खता है और दिलवालों के लिए अपने आदर्शों के लिए बलिदान हो जाना। लड़ने वाले हर समुराई को पता होता है कि उन्हें मरना है, लेकिन जब आप सही हों तो अपनी बात के लिए लड़ना और मर जाना भी सम्मान है। एक-एक कर ढेर होते समुराई और उन पर गोली चलाते बंदूकधारी सैनिकों को देखकर ऐसा लगता है मानो गोलियां आपका हदय भेदकर निकल रही हों।

आखिर में जब सारे समुराई वीरगति को प्राप्त होते हैं या फिर घायल अवस्था में वीरगति का इंतजार करते हैं उस वक्त गोली चलाने वाले एक सैनिक का दिल पसीजता है और वो उन महान योद्धाओं को सम्मान देने के लिए घुटनों पर बैठकर अपने दुश्मनों के सामने नतमस्तक हो जाता है। धीरे-धीरे हर सैनिक को ये अहसास होता है कि जिन्हें वे ढेर कर चुके हैं असली योद्धा तो वे थे। हर सैनिक घुटने पर आता है और उन महान योद्धाओं के सम्मान में नतमस्तक हो जाता है। एक योद्धा के लिए उस मौत से बढ़कर और क्या हो सकता है जब दुश्मन उसे झुककर सम्मान दे। आदर्शों के लिए बलिदान हो जाने वालों के लिए हर किसी के मन में सम्मान होता है। कात्सोमोटो, नाथन से कहता है कि तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है। कात्सोमोटो को इज्जत की वो मौत नसीब होती है जिसका ख्वाब उसने हमेशा देखा था।

आखिर में जापान के राजा को अपनी गलती का अहसास होता है। परंपराआें आैर नवीनता के द्वंद्व के बीच उन्हें लगता है कि उन्हाेंने संगठित जापान का जो सपना देखा था वो अपनों की कीमत पर नहीं हो सकता। राजा कहते हैं कि हमारे पास चाहे कुछ भी हो लेकिन हमें ये भूलना नहीं चाहिए कि हम कौन हैं? हमें भी हमेशा ये याद रखना चाहिए।

- अभिषेक

शनिवार, 16 जुलाई 2016

मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा

आसमां का सीना चीर के निकलूंगा
दुनिया वालों तुम्हारा मुंह नोच के निकलूंगा
मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा
दुश्मनों की महफिल से सीना ठोक के निकलूंगा

हजार शिकायतें दोस्तो की हैं
हजारों तलातुम दुश्मनों ने खड़े किए
मगर सुनलो अ दुनियावालों
सीना ए कुहसार पर कदमताल करके निकलूंगा

इस हाले जार में जीने दो,
मुझे खुद्दार बनके जीने दो
मेरे गैज को न दो आवाज
किसी रोज बेदाद बनके निकलूंगा

दीवानों की दुनिया है
आसमां भी हम अपना बना लेंगे
रोक के देख अ दुश्मन मुझे
तूफाने हवादिस में साजे जीस्त बनके निकलूंगा

किसी उक्वा के लिए जीने वाले
मेरे हमदम कोई और होंगे
सुनलो अ नुक्ताचीनों
जमीं पर मुकद्दस शमशीर बनके निकलूंगा।

पहली ही इश्रत में तुमने
सारे अहसानों को बहा डाला
गौर से सुनलो अहरमन हूं,
जख्म के बाद तबस्सुम बनके निकलूंगा।

- अभिषेक


तलातुमः तूफान, सीना ए कुहसारः पर्वत की छाती पर, हाले जारः दरिद्र दशा, गैजः क्रोध, बेदादः अत्याचार, तूफाने हवादिसः दुर्घटनाओं के तूफान में, साजे जीस्तः जीवन संगीत, उक्वाः परलोक, शमशीरः तलवार, इश्रतः सुख भोग,अहरमनः शैतान, तबस्सुमः मुस्कुराहट।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

बदरा बरसना भूल गई

गलियों गलियों फिर फिर बदरा
उसका मुखड़ा देख गई
ये देखे या वो देखे
वो सारी दुनिया देख गई

आग उगलती इस दुनिया में
जलता हुआ नजारा है
झीनी सी चदरिया का आंचल ले
वो सूरज संग खेल गई

बातों की हसरत क्या पूरी हो
वो इक मौसम उसको देखे है
यादों में जीती यादों में ढलती
वो अश्कों से उसको सींच गई

इक दीवानी इक दीवाने संग
हाथ पकड़ यूं चलती थी
मैं देखूं या तू देखे
देख ये बदरा बीत गई

दीवाने का नाम न जाने
ऐसी उलझन पहली देखी
दो पल की इस यारी में
बदरा सारी भीग गई

काली-काली घटा उमड़ती
देख दीवाना डोल गया
भर-भर पानी कोई उलीचे
और बदरा बरसना भूल गई


- अभिषेक

रविवार, 10 जुलाई 2016

मोहब्बत, मौसम, मौसम विभाग...भरोसे के लायक कोई नहीं

हमारे देश में मोहब्बत से बड़ा कोई ट्रेंडिंग टाॅपिक नहीं है। हर छत पर मोहब्बत खड़ी है और सड़क से कोई इश्क उसे निहार रहा है। बस इंतजार उसके मुकम्मल होने का है। मोहब्बत का मुकम्मल हो जाना यहां कोई खेल नहीं है। लाखों पापड़ बेलिए और मोहब्बत की आस, आस ही रह जाए किसे पता? ऐसा ही कुछ हाल मौसम विभाग का भी लगता है। छत पर खड़े होकर बादलों का इंतजार करते रहिए या फिर मानसून आया कि नहीं पता करने के लिए अखबारों के पन्ने पलटते रहिए या न्यूज चैनल्स के लिए रिमोट को दबाते रहिए। फिर भी मौसम का मिजाज कब बदलेगा, कब मानसून आएगा, एेसे सवालों का जवाब मिलना मुश्किल है।

इस मामले में मोहब्बत और मौसम विभाग की राशि एक है, सिंह राशि। बात जब सिंह की हो तो कौन क्या कह दे? मोहब्बत हो जाए तो कौन है जो मोहब्बत करने वालों को रोक लें। मौसम विभाग वो जो मानसून की कभी भी भविष्यवाणी कर दें। हालिया दिनों में मौसम विभाग ने जयपुर के मानसून को लेकर तीन भविष्यवाणियां की है। तीनों की तीनों भविष्यवाणियां झूठी निकली। अब लोगों को इंतजार चौथी भविष्यवाणी का है। हालांकि लोगों के लिए ये चौथी भविष्यवाणी पत्थर की लकीन हो ऐसा नहीं है। कुछ लोगाें के लिए मौसम की भविष्यवाणी का अर्थ वही नहीं होता जो मौसम विभाग कहता है। उनके लिए मौसम की भविष्यवाणी का अर्थ उसके बिल्कुल विपरीत होता है। जैसे जयपुर में आज भारी बारिश की चेतावनी का अर्थ कुछ लोगों के लिए तेज गर्मी से होने वाली परेशानी है।

अब थोड़ी सी बात मोहब्बत की। मौसम और मौसम विभाग की ही तरह मोहब्बत पर भरोसा करना भी ठीक नहीं है। ब्रेकअप, पैचअप के इस दौर में मोहब्बत का असली मजा फीका सा लगता है। एक शाम प्यार परवान चढ़े, दूसरी शाम डेट घटे और तीसरी शाम होते-होते अमेरिकन सिस्टम टीटीएमएम पर चलें यानी तू तेरे और मैं मेरे। इसलिए मोहब्बत की सोहबत में आजकन न हीर आती है और न ही रांझा दीवाना हुआ फिरता दिखाई देता है। मोहब्बत में जब तक आदमी की इज्जत का जनाजा न निकले तब तक क्या मोहब्बत की।

खैर मोहब्बत तो यूं भी एक बगावत है जिसे रोकना न तो मोहब्बत करने वाले के बस की बात है और न ही इसका विरोध करने वालों के बस में। हां, ये मसला मौसम विभाग के साथ भी कुछ ऐसा ही है। बादलों की कहानी धरतीवासियों को बताने का जरिया मौसम विभाग अगर कुछ गलत कह दे तो उसे ऊपरी चक्कर समझकर भूल जाइए। ऊपरी चक्कर न आपको समझ आएगा और न ही ये चक्कर मौसम विभाग के पल्ले पड रहा है। मानसून के बारे में मौसम विभाग की गलतियों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। अब जब आपके पास पल्ला झाड़ने के लिए कुछ हो तो फिर शिकायत की भी गुजाइश कहां है। ये हाल मौसम विभाग का है। बस इसीलिए मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर ज्यादा गौर न करें और सबकुछ ऊपर वाले पर छोड़ दें। मोहब्बत में सारे जहां से पिटे आशिक की तरह।

- अभिषेक

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

जाआे पहले वो किताबों की आलमारी हटाओ

कदम जब जमने लगे
दूसरे जब आवाज समझने लगे
वो गिनती सुनाने लगे
मुस्कुराहट,
गुस्सा,
प्यार,
जिद,
हर रोज उस पर उतरने लगे
उस रोज खबरदार हो जाना
तुम उस रोज घर को सजाना
ध्यान रखना और
वो आलमारी हटा देना।

बच्चों के लिए खतरनाक है वो आलमारी
जहां रखी है किताबें ढेर सारी
पृष्ठों को एक दूसरे से उलझने दो
अंदर ही अंदर
एक अध्याय को खत्म
दूसरे को शुरू होने दो
तर्क को ताले में कैद करो
दिमाग को खर्च मत होने दो
क्योंकि अच्छी बातें
किसी और के लिए रहने दो।

जाआे उन्हें अय्यारी सिखाओ
मक्कारी सिखाओ
और पोटलियां बनाओ
ज्ञान की,
तर्क की,
हास्य की,
खुशी की,
और बहुत दूर ले जाओ
क्योंकि
इस जहां के लिए जरूरी है जो
अपने बच्चों को वही सिखाओ
जाओ पहले वो किताबों की आलमारी हटाओ।

- अभिषेक

शनिवार, 2 जुलाई 2016

आप में भी है एक 'इन्द्र', बस जरूरत है नजरिया बदलने की

सृष्टि को खोजना मनुष्य के बस में नहीं है। हालांकि ये कोशिश बदस्तूर जारी है। आदमी जैसे-जैसे एक के बाद एक खोज मुकम्मल करता है, नई-नई खोज उसके दिलो दिमाग पर दस्तक देने लगती है। कभी ईश्वर को खोजना, उसे पा लेना इंसान के लिए मुश्किल था। अब लगता है कि क्या धीरे-धीरे इंसान उसे खोजने की ओर बढ़ रहा है? खोज लेना और खोज को मुकम्मल कर देना दो अलग-अलग बात है। दोनों में जमीन और आसमान जितना फर्क है। बहुत संभव है कि ये फर्क कभी न मिटे, लेकिन एक यात्रा के दौरान मुझे ये फर्क जरूर मिटता लगा है।

हिन्दू धर्म में खासतौर पर आर्य संस्कृति में इन्द्र को एक प्रमुख देवता के रूप में स्थान दिया गया है। खासतौर पर देवलोक के प्रिंसिपल के तौर पर इन्द्र की उपस्थिति टीवी सीरियल्स में बदस्तूर नजर आती है। हम जब जमीन से आसमान की ओर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि इन बादलों के परे कोई जगह जरूर होगी जहां स्वर्ग होगा, जहां देव होंगे, जहां इन्द्र होंगे। हालांकि जब से आदमी ने बादलों का घेरा तोड़कर अपने वायुयानों को वहां पर दौड़ाना शुरू किया है तो ऐसा लगता ही नहीं है कि यहां पर कहीं इन्द्र होंगे।

इन्द्र और देवलोक की कल्पनाएं दुष्कर को देव मानने की परिपाटी को बयां करती हैं। हम जिस चीज को छू नहीं सकते, उसके बारे में पता लगाना जब हमें असंभव लगता है तो उसे हम अलौकिक मान लेते हैं और देव के रूप में स्थान देते हैं। बादलों के पार स्वर्ग के सिंहासन पर आरूढ इन्द्र भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ाते हैं। हालांकि जब आप स्वयं किसी वायुयान में बैठकर बादलों के पार स्वयं को पाते हैं तो आपको लगता है कि इन्द्र और देवलोक की जो कल्पनाएं टीवी सीरियल्स आपके मन में बैठाते हैं वो एक तरह से ठीक भी है। इन कल्पनाओं में आपको स्वयं के इन्द्र होने का अहसास होने लगता है।

देवलोक में इन्द्र और उसके साथ में बैठे सभासदों के कल्पनाओं के घोड़े की अगर आप वायुयान में बैठे लोगों के साथ तुलना करें तो आप पाएंगे कि आप खुद ही इन्द्र हैं। एक कदम और आगे बढ़ाएं तो फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में आपको अप्सराएं भी नजर आ जाएंगी। नाम अलग हो सकते हैं लेकिन रंभा, उर्वशी, मेनका की कल्पनाओं का बाजार साकार हो सकता है। कुल मिलाकर ये सब वैसा ही है जैसा की हमारी कल्पनाओं में बरसों से जिंदा है।

आखिर में
स्वयं के इन्द्र होने के विचार को कल्पना समझकर यूं ही उड़ा देना ठीक नहीं है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि देवता होना कोई अलौकिक घटना नहीं है। इस दुनिया में हर आदमी देवता है। बस जरूरत है नजरिया बदलने की। खासतौर पर तब जब हम छोटी-छोटी बातों से निराश हो जाते हैं। ये ऐसा ही है जैसे इन्द्र समय-समय पर राक्षसों से हारकर स्वर्ग के सिंहासन से दूर हो जाते हैं और फिर अपनी सारी शक्तियों को संगठित कर स्वर्ग का सिंहासन फिर से प्राप्त करते हैं।

हमें भी स्वयं पर विश्वास करना सीखना होगा। जब सबकुछ हमारे खिलाफ हो, जब बाजी हम हार जाएं तो ये मत समझिए कि ये आखिरी बाजी है। खुद को इन्द्र समझिए और जीतने के लिए प्रयास करते रहिए।

- अभिषेक