‘भगवान के घर देर है अंधेर नहीं‘, हमने अक्सर ये सुना है लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम के किसी भी सिरे को पकड़कर आप आगे बढ़ना शुरू कर दें आपको अंधेरा ही अंधेरा नजर आएगा। एक बड़े पेड़ के गिरने के बाद धरती इतनी जोर से भी नहीं हिलती की सारी इंसानियत गर्त में समा जाए, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों को मार देने की अंधी दौड़ इस कदर इंसानियत पर हावी हुई कि उस मंजर को सुनकर-पढ़कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।
देश के तत्कालीन गृह मंत्री को जूता मारकर (हालांकि जूता लगा नहीं था) चर्चा में आए पत्रकार जरनैल सिंह की किताब ‘कब कटेगी चौरासी-सिख कत्लेआम का सच‘ उन तीन दिनों के कत्लेआम को बयां करती हैं। 31 अक्टूबर 1984 से 2 अक्टूबर 1984 के उन तीन दिनों में कैसे दंगाई एक के बाद एक सिखों की लाशें बिछाते रहे? कैसे औरतें अपने पति, पिता और बच्चों को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखती आैर क्रंदन करती रहीं? कैसे दंगाई और पुलिस में कोई भेद ही नहीं रह गया था? कैसे घायल सिखों को आग के हवाले कर हत्याओं को भी क्रूरतम बना दिया गया? इन सारे सवालों के जवाब ये किताब देती है। जहां किताब को पढ़ते हुए आपको लगता है कि कैसे एक दंगा पूरी दुनिया केा आपसे बेगाना कर देता है, ऐसा लगता है कि दुनिया में अब आपका कोई नहीं है। जैसे पूरी दुनिया ने आपको मरने के लिए दंगाइयों के सामने छोड़ दिया है। हर दंगाई किसी का बेटा, भाई, पति होता है लेकिन दंगा करते वक्त एक हत्यारा ही रह हो जाता है।
पुलिस थी या दंगाई
जरनैल सिंह अपनी किताब में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं। वे बताते हैं कि आईएएस अधिकारी कुसुमलता मित्तल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एक पुलिस अधिकारी को 'जीवित शर्म' लिखा तो दूसरे को दिल्ली पुलिस के चेहरे पर 'बदनुमा दाग' करार दिया। ये वही पुलिस अधिकारी थे जिन्हें दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाया गया था लेकिन ये दंगाइयों के ही मददगार साबित हुए। इस किताब में पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह के हवाले से बताया गया है कि देश की राजधानी में इतना बड़ा दंगा पुलिस की मदद के संभव ही नहीं है। उनके अनुसार यदि पुलिस ने थोड़ा सा भी बल का इस्तेमाल किया होता तो दंगाई इतने बड़े कत्लेआम को अंजाम ही नहीं दे पाते। इस दंगे का सबसे घृणित पहलू ये है कि दंगाइयों से जब कोई घर या इलाका फतह नहीं हुआ तो उन्होंने पुलिस को बुलाया। लोगों को मारने, उनके घरों को लूटने में जब वे नाकामयाब होते तो पुलिस को गुहार लगाते और पुलिस कत्ल और लूट में हिस्सेदार बन जाती।
राजनेताओं पर सवाल
सिखों के कत्लेआम के बाद करीब 30 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन जिन बड़े नेताओं पर आरोप लगे वे आज भी अपना दामन बचाए चैन की बंसी बजा रहे हैं। ये उन सैंकड़ों विधवाओं के दर्द को और बढ़ा देता है जिन्होंने उस खूनी मंजर के बाद अपनी जिंदगी को यूं बुझते देखा है। कांग्रेस के बड़े नेताआें के खिलाफ इतने सुबूतों आैर गवाहों के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ पाती है। ये देश की न्याय व्यवस्था के साथ क्रूरतम खिलवाड़ सा लगता है।
अफवाहों को गर्म रखा गया
सोशल मीडिया के इस दौर में जब हमें कश्मीर की हालत देखकर इसके खतरे समझ में आ रहे हैं। हम उस दौर में उड़ने वाली अफवाहों से पैदा होने वाली नफरत को समझ सकते हैं। कानपुर में सिखों से लोगों की हमदर्दी न हो जाए इसलिए ऐसी अफवाहें फैलाई गई कि सिख फौजियों ने पास के गांवों के लोगों को गोली मार दी है। अफवाहों के ऐसे बाजार उस दौर में पूरे देश में सजे थे जिनका एक ही मकसद था सिखों के प्रति हमदर्दी और विश्वास को वातावरण न बन सके। आज के दौर में जब अफवाहें इतनी तेजी से हमारे दिलों में जहर भर देती हैं तो उस दौर का अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल नहीं है।
जरनैल सिंह चिदंबरम पर जूता फेंकने को अभूतपूर्व अन्याय के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध कहते हैं। हालांकि अपने इस कृत्य को वे गलत जरूर मानते हैं लेकिन मुद्दा सही उठाने की बात कहते हैं। उनकी किताब के शुरूआती कुछ पन्ने पलटने के बाद आप सिखों के साथ हुए उस अन्याय से रूबरू होते हैं, जिनमें दंगार्इ हाथ में वोटर लिस्ट लिए सिखों का कत्लेआम करने पर तुले थे। एक आम आदमी के लिए ये सोचना भी दिल दहला देने वाला है कि कैसे सिखों को सरियों आैर लाठियों से पीटा जाता आैर फिर उनके गले में टायर डालकर जिंदा जला दिया जाता। ये आम आदमी की प्रतिक्रिया हो ही नहीं सकती। ये सुनियोजित षड़यंत्र था जो आज भी हमारी न्याय प्रणाली को दूर से देखकर हंस रहा है।
इस मामले में बहुत कम लोगों को सजा हुर्इ है, वो भी एेसे लोगों को जिनके कंधे पर बंदूक रखकर चलार्इ गर्इ आैर फिर उनके रहनुमा बनने का दावा करने वालों ने किनारा कर लिया। तड़प-तड़प कर जान देता हर सिख जैसे आज भी अपने लिए न्याय की गुहार लगा रहा है, उनकी विधवाएं आैर बच्चे अपनों के लिए इंसाफ को पुकार रहे हैं आैर एेसा लगता है कि इंसानियत शर्म से मुंह छिपा रही है।
- अभिषेक
