सृष्टि को खोजना मनुष्य के बस में नहीं है। हालांकि ये कोशिश बदस्तूर जारी है। आदमी जैसे-जैसे एक के बाद एक खोज मुकम्मल करता है, नई-नई खोज उसके दिलो दिमाग पर दस्तक देने लगती है। कभी ईश्वर को खोजना, उसे पा लेना इंसान के लिए मुश्किल था। अब लगता है कि क्या धीरे-धीरे इंसान उसे खोजने की ओर बढ़ रहा है? खोज लेना और खोज को मुकम्मल कर देना दो अलग-अलग बात है। दोनों में जमीन और आसमान जितना फर्क है। बहुत संभव है कि ये फर्क कभी न मिटे, लेकिन एक यात्रा के दौरान मुझे ये फर्क जरूर मिटता लगा है।
हिन्दू धर्म में खासतौर पर आर्य संस्कृति में इन्द्र को एक प्रमुख देवता के रूप में स्थान दिया गया है। खासतौर पर देवलोक के प्रिंसिपल के तौर पर इन्द्र की उपस्थिति टीवी सीरियल्स में बदस्तूर नजर आती है। हम जब जमीन से आसमान की ओर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि इन बादलों के परे कोई जगह जरूर होगी जहां स्वर्ग होगा, जहां देव होंगे, जहां इन्द्र होंगे। हालांकि जब से आदमी ने बादलों का घेरा तोड़कर अपने वायुयानों को वहां पर दौड़ाना शुरू किया है तो ऐसा लगता ही नहीं है कि यहां पर कहीं इन्द्र होंगे।
इन्द्र और देवलोक की कल्पनाएं दुष्कर को देव मानने की परिपाटी को बयां करती हैं। हम जिस चीज को छू नहीं सकते, उसके बारे में पता लगाना जब हमें असंभव लगता है तो उसे हम अलौकिक मान लेते हैं और देव के रूप में स्थान देते हैं। बादलों के पार स्वर्ग के सिंहासन पर आरूढ इन्द्र भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ाते हैं। हालांकि जब आप स्वयं किसी वायुयान में बैठकर बादलों के पार स्वयं को पाते हैं तो आपको लगता है कि इन्द्र और देवलोक की जो कल्पनाएं टीवी सीरियल्स आपके मन में बैठाते हैं वो एक तरह से ठीक भी है। इन कल्पनाओं में आपको स्वयं के इन्द्र होने का अहसास होने लगता है।
देवलोक में इन्द्र और उसके साथ में बैठे सभासदों के कल्पनाओं के घोड़े की अगर आप वायुयान में बैठे लोगों के साथ तुलना करें तो आप पाएंगे कि आप खुद ही इन्द्र हैं। एक कदम और आगे बढ़ाएं तो फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में आपको अप्सराएं भी नजर आ जाएंगी। नाम अलग हो सकते हैं लेकिन रंभा, उर्वशी, मेनका की कल्पनाओं का बाजार साकार हो सकता है। कुल मिलाकर ये सब वैसा ही है जैसा की हमारी कल्पनाओं में बरसों से जिंदा है।
आखिर में
स्वयं के इन्द्र होने के विचार को कल्पना समझकर यूं ही उड़ा देना ठीक नहीं है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि देवता होना कोई अलौकिक घटना नहीं है। इस दुनिया में हर आदमी देवता है। बस जरूरत है नजरिया बदलने की। खासतौर पर तब जब हम छोटी-छोटी बातों से निराश हो जाते हैं। ये ऐसा ही है जैसे इन्द्र समय-समय पर राक्षसों से हारकर स्वर्ग के सिंहासन से दूर हो जाते हैं और फिर अपनी सारी शक्तियों को संगठित कर स्वर्ग का सिंहासन फिर से प्राप्त करते हैं।
हमें भी स्वयं पर विश्वास करना सीखना होगा। जब सबकुछ हमारे खिलाफ हो, जब बाजी हम हार जाएं तो ये मत समझिए कि ये आखिरी बाजी है। खुद को इन्द्र समझिए और जीतने के लिए प्रयास करते रहिए।
- अभिषेक
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