बुधवार, 29 जून 2016

हम भी उनके हमराह हो चले हैं

आज हम भी उनके हमराह हो चले हैं
वो अपनी रजा छुपा और हम गम दबा चले हैं

उनकी भी खता क्या, कुसूर मेरा भी नहीं
दीवानों की किस्मत जो राजे दिल दफन कर चले हैं

दो शाखाओं की दूरी ने हमें मिलने न दिया
अब ये सूखे पत्ते जमीं पर मिलने चले हैं

उनके जाने से हो चला है वीरान सब कुछ
कुछ तो शर्म करो दोस्तो वो और होंगे जो मनचले हैं

खुदा की इबादत की जो हमने सच्चाई बयां की
इश्क को समझाया क्या कि काफिर हो चले हैं

- अभिषेक

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