आज हम भी उनके हमराह हो चले हैं
वो अपनी रजा छुपा और हम गम दबा चले हैं
उनकी भी खता क्या, कुसूर मेरा भी नहीं
दीवानों की किस्मत जो राजे दिल दफन कर चले हैं
दो शाखाओं की दूरी ने हमें मिलने न दिया
अब ये सूखे पत्ते जमीं पर मिलने चले हैं
उनके जाने से हो चला है वीरान सब कुछ
कुछ तो शर्म करो दोस्तो वो और होंगे जो मनचले हैं
खुदा की इबादत की जो हमने सच्चाई बयां की
इश्क को समझाया क्या कि काफिर हो चले हैं
- अभिषेक
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