रविवार, 12 जून 2016

नदियां


नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं
नुकीले पत्थरों का बोसा लेते हुए
उसे सहलाते,
उसकी कमतरी के अहसास को अपने में मिलाते हुए
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

भीषण गर्जना के साथ वह चूम लेती है
अपने हर बच्चे का मुख
उसे प्यार से भरने के लिए
और ले जाती है उसे
बुढ़ापे से बचपन की ओर
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

रंगहीन पानी में वह भरती है अपना रंग
ममत्व की पराकाष्ठा
और सख्त रौद्र रूप
फिर भी,
वह छोड़ती है
अपने पीछे अपने हर बच्चे को दुलारकर
हमेशा के लिए क्योंकि
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

मैदानों में कलकल करती,
पहाड़ों में संगीत सुनाती
और ले जाती है
साथ बहुत दूर तक
उन छोटे शिलाखंडों को, प्रस्तरों को
जिन्हें सीखना है अभी जीवन जीना
सभी के साथ समान व्यवहार करना
और हर मौसम में एक सा बने रहना
फिर भी नदी है
पानी कम है तो भी बहना है
पानी ज्यादा है तो भी बहना है
नदियां हैं, जिन्हें अपना रास्ता खुद बनाना है
बहते जाना है,
बहते जाना है।

- अभिषेक

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