झुककर रोज
मैं अपने पांव देखता हूं
न पांव मिलते हैं,
न कहीं टोह मिलती है
हर रोज
मैं पहले से बड़ा हो जाता हूं
जैसे अभिमान के सामने लोग छोटे हो जाते हैं
कभी बर्फ से अपना तन ढकता हूं
कभी लताओं से श्रृंगार करता हूं
लेकिन फिर एक और दिन आता है
जब मैं स्वयं को टेढी सतह पर समतल पाता हूं
उस रोज मैं देखता हूं
लोग मुझसे प्रेम करने लगे हैं
उस रोज मैं देखता हूं
लोग मुझे दरख्त कहने लगे हैं।
- अभिषेक
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