सूखे पत्ते क्यों जलाते हैं लोग
अपनी बात से मुकर जाते हैं लोग
हिम्मत के मायने यहां बहुत छोटे हैं
क्यों पीठ पीछे बात बनाते हैं लोग
इन किताबों को सिरहाने रख सो जाइए
आजकल चापलूसी में बीए कराते हैं लोग
खुली फिजां में घुटता है दम उनका
बंद कमरों में जिंदगी जिए जाते हैं लोग
चरागों से रोशन होती है दुनिया
और अंधेरे के लिए चराग बुझाते हैं लोग
यहां दुश्मनों के लिए बन गई हैं दीवारें
दोस्ती भी ऐसी कि मंदिर-मस्जिद गिराते हैं लोग
- अभिषेक
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