रविवार, 19 जून 2016

नाक

उठी हुई,
सपाट,
चपटी,
तोते जैसी
लहरदार,
फैली हुई
और भी न जाने कैसी-कैसी
होती है नाक।
लेकिन दबे-कुचलों के लिए
हमेशा एक जैसी
होती है नाक।

ये सवाल है नाक का,
तो सुन लीजिए
कुछ और प्रकार है नाक का,
हिटलर,
मुसोलिनी,
ओसामा बिन
अधूरी है नाक
हर चेहरे पर
बदरंग दिल से सजती है नाक।

आप जहां भी जाएंगे
बहुत सी नाक पाएंगे
जैसे कई दिनों से बंद हो तिजोरियों में
आज ही तराशी
और आज ही लगाई हो
जैसे बहुत मेहनत से चेहरे पर सजाई हो।

यहां हर आदमी नाक में नजर आता है
कर्मचारियों से मिलते वक्त,
वो हिटलर की नाक लगाता है
खूब रौब जमाता है
जब कभी गांव जाता है
संवाददाता की नाक हटाकर
संपादक की नाक में आता है
मगर किसी अधिकारी के सामने
वो बेनाक हुआ जाता है।

पूंजी कमाई तो क्या कमाई
जब तक तिजोरियों में नई नाक न जमाई
सारी तिजोरियां भरी हैं
जिनमें नाक ही नाक भरी हैं
किसी पर गुस्सा है
किसी पर गुमान है
हर बात दूसरों के लिए है
खुद का ईमान खराब है
फिर भी नाक का अभिमान है
हर आदमी के गहरे मन में
एक ही चीज भरी है
हर जगह
सड़ी हुई नाक सजी है।

- अभिषेक

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