शनिवार, 18 जून 2016

गुलबर्ग सोसायटी मामले में सजा का एेलान...पूरा हुआ राम का वनवास



भगवान राम जब 14 साल का वनवास भोगकर अयोध्या आए थे तो लोगाें की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। गुलबर्ग सोयायटी दंगा मामले में फैसला 14 साल बाद आया है। 14 साल बाद आया ये फैसला इंसाफ का वनवास खत्म होने का ऐलान है और अपनों को खो चुके लोगों के लिए मरहम की एक पट्टी भी।


गुलबर्ग सोसायटी दंगा केस मामले में शुक्रवार दोपहर को फैसला आ गया है। जब इस मामले में इंसाफ की राहत बरसी है मैं शाम के धुंधलके में एक और आंधी उठते महसूस कर रहा हूं। बालकनी से सामने का मैदान साफ नजर आ रहा है। मैदान में बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं और हर बात पर झगड़ रहे हैं। बच्चों का धर्म अलग- अलग है, लेकिन ये झगड़ा कोर्इ दंगा नहीं है। यह खेल है। जब ये घर जाएंगे तो इनके कांधों पर दोस्तों का हाथ होगा। हालांकि मेरी चिंता वर्तमान नहीं बल्कि भविष्य को लेकर है जब ये बड़े होंगे, समझदार होंगे। क्या तब भी वे ऐसे ही होंगे? मेरे जैसे लोगों की दुआओं का असर हो और ऊपर वाला करम करे तो शायद ये ऐसे ही हों, यारबाज और एक दूसरे से बेहद प्रेम करने वाले।


अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी दंगा केस मामले में 24 लोगों को सजा सुनाई गई है। इनमें से 11 लोगों को उम्रकैद, 12 को सात साल की जेल और एक दोषी को 10 साल की सजा सुनाई गई है। 69 लोगों की हत्या के मामले में विशेष अदालत ने 64 आरोपियों में से 24 को दोषी माना था। ये मामला 28 फरवरी 2002 का है, जब दंगाइयों ने कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी सहित 69 लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें से मरने वाले ज्यादातर लोगों ने जाफरी के घर पर इस उम्मीद से शरण ली थी कि जाफरी राज्य के जाने-माने नाम है और वे इस संकट की घड़ी में किसी भी तरह संकट से निपट सकते हैं।


इस मामले में बहुत से पीड़ितों के लिए ये फैसला ऐसे दौर में आया है जब वो दंगे की बात नहीं करते, उसे भुलाने की कोशिश करते हैं ताकि रो-रोकर सूख चुकी आंखाें में अब खून न उतर आए। हालांकि दंगे में अपना सबकुछ लुटा चुके लोगों के लिए सबकुछ भुला देना भी आसान नहीं है। वो व्यक्ति जिसके सामने उसके सबसे अजीज लोगों को मार दिया गया हो भला वह कैसे इसे भूल सकता है? इस दंगे का सबसे भयावह पक्ष ये है कि दंगाई चार घंटों तक लोगों को मारते रहे आैर गुलबर्ग सोसायटी के सामने पुलिस खड़ी देखती रही। जब आंखें ठहर गई, जुबां ने विरोध करना छोड़ दिया, सांसों ने धोखा दे दिया तब जाकर कहीं किसी ने सुध ली।


अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी ऐसे इलाके में नहीं है, जहां जिंदगी बचाने की जद्दोजहद चार घंटे ले ले और तब तक 69 जिंदगियां मौत का आगोश थाम ले। अस्पताल से लेकर देश के सैनिकों तक सबकुछ बहुत पास ही था। एहसान जाफरी ने उस वक्त जिससे मदद मिल सकती थी उस हर शख्स को फोन किया लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया। इस मामले में कोर्ट ने 11 लोगों को धारा 302 के तहत दोषी माना है। हालांकि आपराधिक षड़यंत्र की धारा 120बी को कोर्ट ने हटा दिया। ये लम्बे समय बाद आया फैसला है, एेसा लगता है जैसे राम ने वनवास के बाद अपना सबकुछ न सही, कुछ पा जरूर लिया है।


गुलबर्ग सोसायटी दंगा मामले ने देश के दो धर्मों के बीच खाई को और बढ़ाने का ही काम किया है। अविश्वास की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। मेरे घर के सामने खेल रहे बच्चों को देखकर ऐसा जरूर लगता है कि वे इस खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस खाई को और गहरा करने वाले भी इसी देश में मौजूद हैं। भले ही गुलबर्ग सोसायटी दंगा मामले में कोर्ट ने दोषियों को सजा सुना दी हो लेकिन ये भी उतना ही सच है कि बंदर-भालुओं को गले लगाकर और उनकी सेना बनाकर रावण को शिकस्त देने वाले भगवान राम के इस देश में हम हर इंसान को गले लगाने से भी परहेज करते हैं। ये स्थिति बदलनी चाहिए।



और आखिर में...
कोई भी दंगा एक साथ शुरू नहीं होता। उसकी शुरूआत लोगों के दिलों में होती है। दंगाई बनकर लोगों की जिंदगियां फूंकने से बेहतर है अपने दिलों में पैदा होती नफरत को फूंक दीजिए। मैं उन बच्चों को देखकर सोच रहा हूं कि काश उन्हें जमाने की हवा न लगे आैर वो बच्चे ही रहें।

- अभिषेक

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