पैट्रिक मोदियानो, पैट्रिक मोर्दियानो या फिर पाट्रिक मोडिआनो। साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले ये साहित्यकार अब तक इन तीन नामों से मुझ से मुखातिब हो चुके हैं। दुविधा है कि उन्हें किस नाम के साथ संबोधित करूं। मैं जानता हूं कि नाम बदलने से इनकी शख्सियत नहीं बदल जाएगी और न ही बदल जाएगा इनका उम्दा लेखन। बावजूद इसके संबोधन के लिए नाम की अहमियत आसानी से समझी जा सकती है। हिन्दी पाठकों के लिए हाल ही में उनकी एक किताब का अनुवाद आया है जिसमें उनका नाम पाट्रिक मोडिआनो लिखा है। मैं भी यही नाम चुन लेता हूं।
1978 में पाट्रिक मोडिआनो का छठा उपन्यास मिसिंग पर्सन आया। हिन्दी में इसका अनुवाद राजपाल एंड संन्ज ने मैं गुमशुदा के नाम से छापा है। किताब की खासियत ये है कि आपने इसके कुछ पन्ने पलट लिए तो फिर इस किताब को छोड़ देना आपके लिए असंभव होगा। पहले ही अध्याय में ये साफ हो जाता है कि आने वाले पन्ने एक व्यक्ति की तलाश हैं, लेकिन ये तलाश कब पूरी होगी और कैसे पूरी होगी ये कोई नहीं जानता। मोडिआनो के साहित्य की ये विशेषता है कि जैसे वे एक सवाल पाठक के सामने रखते हैं और उसी से कहते हैं कि वह इसका हल किताब में ढूंढना शुरू करे।
मैं गुमशुदा कहानी है एक डिटेक्टिव गी रोलां की। गी की जिंदगी के पिछले कुछ सालों को छोड़कर वह सब कुछ भूल चुका है। उसे याद नहीं है कि वो कौन है? कहां से आया है? ऐसी ही सवालों को खोजने की वो कोशिश करता है और फिर नई परतें खुलती हैं, लेकिन ये परतें गी की जिंदगी के रहस्यों को और उलझा देती हैं। किताब पढ़ते वक्त आपको कई बार लगता है कि आखिरी पृष्ठों को खोलकर देख लें कि आखिर गी की जिंदगी में हुआ क्या था। हालांकि धैर्यवान पाठक लगातार पृष्ठ दर पृष्ठ उलटते हैं और ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर गी रोलां का असली नाम क्या था? वह कहां से आया था? वो कौनसा हादसा था जिससे वो अपना अतीत भूल गया?
अतीत से हमेशा यादें ही जुड़ी होती हैं, लेकिन ये उपन्यास अतीत को अपनी यादों से बयां नहीं करता है। ये उपन्यास अतीत के प्रति आपके अंदर एक जिज्ञासा जगाता है उस आदमी के लिए जो अपना अतीत भूल चुका है। वह जानना चाहता है कि आखिर वह है कौन? ये सवाल हर कदम पर पूछा जाता है। पेरिस से शुरू होने वाली ये कहानी एक जलयात्रा पर खत्म होती है, लेकिन ये जलयात्रा भी सवालों का जवाब नहीं दे पाती है।
मोडिआनो ने उपन्यास को इस खूबी से रचा है कि ये आपको चौंकाता है, हर अध्याय में रहस्य को बनाए रखता है और तो और आखिरी पृष्ठ की आखिरी पंक्तियों तक आप खुद को बंधा हुआ महसूस करते हैं। आखिर में जब आप उपन्यास को पूरा पढ़ लेते हैं तो भी आपको अहसास होता है कि बहुत से प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं।
आखिरी के कुछ पृष्ठों में आपको नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास फेयरवेल टू आर्म्स का सा भी अहसास होता है। हालांकि दोनों की कहानियों में जमीन आसमान का अंतर है। जहां फेयरवेल टू आर्म्स का अंत दुखद है वहीं मोडिआनो की ये किताब दो असमान ध्रुवों की ओर आपको खींचती है। जहां एक ओर खालीपन है तो कुछ सवालों के अनुत्तरित रह जाने का मलाल भी। जब कोई आपके जेहन पर हावी हो जाता है तो आप उसके लिए प्रार्थना करने लगते हैं। गी रोलां की बेबसी पर आप भावुक नहीं होते, न उसके प्रेम को महसूस करते हैं। बावजूद इसके एक सहानुभूति आपके भीतर जरूर घर लेती है।
दुनिया के नोबेल पुरस्कार विजेता क्या लिख रहे हैं, कैसे लिख रहे हैं, के लिए ये किताब पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। बस एक उम्दा किताब पढ़ना ही काफी है।
आखिर में उपन्यास की कुछ पंक्तियां जो गी की भावनाओं को बखूबी बयां करती हैंः-
‘अभी तक सब कुछ इतना गड्ड मड्ड है, ऐसा टुकड़े-टुकड़े में.......मेरी तलाश के दौरान, कुछ धज्जियां, कुछ कतरनें अचानक मेरे जेहन में आती रहती है.... लेकिन आखिरकार...शायद यही तो है जीवन।‘
- अभिषेक

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