कहानी
ताऊजी...
ताऊजी...
ताऊजी...
ये रामदयाल के छोटे भाई कृपाशंकर का छोटा बेटा मोहन था। जो लगातार अपने ताऊ को नमक का पानी पिलाने के लिए चिल्लाए जा रहा था। डाॅक्टर ने दो-चार दिन पहले ही रामदयाल को नमक का पानी पिलाने के लिए कहा था।
मोहन ने रामदयाल का सिर थोड़ा सा ऊँचा उठाया और फिर नमक मिले पानी के गिलास को रामदयाल के होठों से लगा दिया। थोड़ी ही देर बाद रामदयाल की चेतना लौट आई।
रामदयाल ने इधर-उधर देखा। उसकी आंखें फैल गर्इ। पिछले दो दिनों से वह एक सवाल लगातार दोहराए जा रहा था। उसने एक बार फिर वही सवाल दोहराया।
‘परमाणु बम गिरा क्या?‘
ये सवाल सुनते ही उसकी छोटी बेटी झुंझला उठी। उसी झुंझलाहट में उसने कहा, 'आपको क्या हो गया है, क्यों दो दिनों से एक ही रट लगा रखी है? कोई परमाणु बम नहीं गिरेगा आप पागल हो गए हो।'
‘अच्छा...‘ रामदयाल ने अपना सीना फुलाया। जैसे किसी बात का बोझ उतार रहा हो।
'रोटी बना ली क्या?' रामदयाल ने पूछा।
'हां, बना ली।' बेटी ने रूखा सा जवाब दिया।
'... तो खाओगे।' रामदयाल ने बेहद धीमे से पूछा।
'अब बनी है तो खाएंगे ही।' बेटी ने जवाब दिया।
'परमाणु बम भी बना है तो गिरेगा ही।' रामदयाल ने कहा और मुंह फेर लिया।
एक बार फिर रामदयाल की चेतना उसका साथ छोड़ रही है।
- अभिषेक
ताऊजी...
ताऊजी...
ताऊजी...
ये रामदयाल के छोटे भाई कृपाशंकर का छोटा बेटा मोहन था। जो लगातार अपने ताऊ को नमक का पानी पिलाने के लिए चिल्लाए जा रहा था। डाॅक्टर ने दो-चार दिन पहले ही रामदयाल को नमक का पानी पिलाने के लिए कहा था।
मोहन ने रामदयाल का सिर थोड़ा सा ऊँचा उठाया और फिर नमक मिले पानी के गिलास को रामदयाल के होठों से लगा दिया। थोड़ी ही देर बाद रामदयाल की चेतना लौट आई।
रामदयाल ने इधर-उधर देखा। उसकी आंखें फैल गर्इ। पिछले दो दिनों से वह एक सवाल लगातार दोहराए जा रहा था। उसने एक बार फिर वही सवाल दोहराया।
‘परमाणु बम गिरा क्या?‘
ये सवाल सुनते ही उसकी छोटी बेटी झुंझला उठी। उसी झुंझलाहट में उसने कहा, 'आपको क्या हो गया है, क्यों दो दिनों से एक ही रट लगा रखी है? कोई परमाणु बम नहीं गिरेगा आप पागल हो गए हो।'
‘अच्छा...‘ रामदयाल ने अपना सीना फुलाया। जैसे किसी बात का बोझ उतार रहा हो।
'रोटी बना ली क्या?' रामदयाल ने पूछा।
'हां, बना ली।' बेटी ने रूखा सा जवाब दिया।
'... तो खाओगे।' रामदयाल ने बेहद धीमे से पूछा।
'अब बनी है तो खाएंगे ही।' बेटी ने जवाब दिया।
'परमाणु बम भी बना है तो गिरेगा ही।' रामदयाल ने कहा और मुंह फेर लिया।
एक बार फिर रामदयाल की चेतना उसका साथ छोड़ रही है।
- अभिषेक
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