गर्म हवाओं के थपेड़े बढ़ते ही जा रहे हैं। लगता है जैसे मुहब्बत में हारा आशिक अपना गुस्सा लोगों पर निकालने का मनसूबा पूरा करने चला आया हो। एसी-कूलर में रहने वालों के लिए गर्मी में निकलना किसी सजा से कम नहीं है। फिर ऐसी सजा बहुत से लोगों को हर मोड़ पर मिल रही है। घर से निकले और लगा जैसे गर्म भट्टी में झोंक दिए जा रहे हों।
फिर भी जिंदगी जीनी है तो कोशिशें तो जारी रखनी ही होंगी। गर्मी का ये मौसम यूं तो आग लगाए है, लेकिन कुछ लोगों की दीवानगी इस मौसम को आम का मौसम भी कहती है। बात आम की चली है तो पहला नाम दुनिया के उस मुख्तलिफ शायर का है जिसने आम के लिए अपनी दीवानगी हिन्दुस्तान के शहंशाह के सामने भी कुछ यूं रखी कि शहंशाह आम को भी उनके घर आम की टोकरी पहुंचानी ही पड़ी।
अपनी नज्मों, गजलों और एक से बढ़कर एक शेरों के जरिए हिन्दुस्तान के अवाम को अपना दीवाना बनाने वाले ये शायर थे मिर्जा गालिब। गालिब का अंदाजे बयां जितना शेर कहने में जुदा था उतने ही वे मुख्तलिफ थे अपनी बात कहने में। जब एक शायर दूसरे शायर से बात करे तो शेर कहने का असर भी होता है और दाद भी खूब मिलती है। हिन्दुस्तान के आखिरी मुगल शहंशाह बहादुर शाह जफर को शायरों का शहंशाह कहा जाए तो इसमें कुछ गलत नहीं है। जनाब का अदब कुछ ऐसा था कि उनके जमाने में शायरों के लिए दिल्ली का दिल बहुत बड़ा था। कद्रदानों की कमी होती भी कैसे जब कद्रदानों में शहंशाह खुद दखल रखते हों।
तो लीजिए जनाब उस किस्से पर आते हैं जिसका जिक्र हमने कुछ पहले किया है। मिर्जा गालिब आम के इतने शौकीन थे कि लोगों से आम की फरमाइश करने से भी नहीं चूकते थे। एक बार जब वे दिल्ली के एक बागीचे हयात बख्श में शहंशाह बहादुरशाह जफर के साथ टहल रहे थे। अचानक गालिब एक जगह ठहर गए। बादशाह को बड़ा अजीब लगा। उन्होंने देखा कि गालिब एक आम के पेड़ के नीचे खड़े हैं और आमों को लगातार देखे जा रहे हैं।
बादशाह ने आश्चर्य से गालिब को देखा और पूछा कि इन आमों को आप ऐसे क्यों देख रहे हैं। गालिब को तो जैसे इसी सवाल का इंतजार था। उन्होंने कहा कि शहंशाह सुना है आम-आम पर लिखा होता है नाम खाने वाले का। मैं ढूंढ रहा हूं कि क्या किसी आम पर गालिब का भी नाम लिखा है। ये कहकर गालिब तो चुप हो गए लेकिन शहंशाह मुस्कुराए बिना न रह सके। अगले दिन शहंशाह ने उन्हीं आमों की टोकरी गालिब के घर पहुंचा दी।
एक बेहद खास आदमी का ये आम प्रेम कुछ अजीब सा लगता है, लेकिन उनकी आम के प्रति दीवानगी का ये पहला और आखिरी किस्सा नहीं था। उन्होंने 1857 की क्रांति के दौर में एक शिकायत भरा पत्र अपने एक अजीज को लिखा था, जिसमें उन्होंने लिखा कि इस क्रांति की बुरी बात ये है कि आम भी खाने को नसीब नहीं है। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई शायर होगा जिसने किसी फल का इस्तकबाल अपनी नज्म से बुलंद किया हो। ये करने वाले संभवतः गालिब इकलौते शायर हैं।
गालिब ने आम को जितनी तवज्जुह दी है वो हर किसी के बस की बात नहीं है। उन्होंने आम की तारीफ में एक गजल ही लिख डाली। आम की तारीफ का इससे बड़ी मिसाल कहीं आैर नहीं मिलती है अौर न ही मिलते हैं गालिब जैसे शायर। तो इन गर्म हवाआें में गालिब की नज्मों-गजलों, शेरों को गुनगुनाइए आैर आम का जमकर लुत्फ उठाइए।
अभिषेक
Aam aur galib ka pyar bahut he sundar.
जवाब देंहटाएंAam aur galib ka pyar bahut he sundar.
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