प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के अभियान में जुटे थे। उस वक्त उनका एक बयान काफी सुर्खियों में रहा था। मोदी ने उस वक्त कहा था कि भारत को पहले लोग सपेरों के देश के रूप में जानते थे। उस बयान को दो साल का वक्त गुजर चुका है। हम दो सालों में मंगल तक पहुंच चुके हैं, लेकिन हमारे बुद्धू बक्से की सुई सांप-सपेरों के देश में ही अटकी नजर आती है। इस दौर में जो बुद्धू बक्से में दिखाया जा रहा है उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि इस सुई के अटके दौरे को ठीक करना फिलहाल किसी मेकेनिक के लिए संभव नहीं है। तभी तो नाग-नागिन की बात करने वाले डेली सोप्स बुद्धू बक्से में जीवित है और हम उसे लगातार झेल रहे हैं।
डेली सोप्स की भारतीय दुनिया में जब से सास-बहू और लम्बे सीरियल्स का दौर आया है, लगता है कहानी खत्म हो गई है। एक सीरियल जिस कहानी के साथ शुरू होता है वह कहानी अगले कुछ दिनों में खत्म हो जाती है। फिर कहानी के घिसटने का सिलसिला ऐसा शुरू होता है कि थमने का नाम ही नहीं लेता है। एक आदमी कई बार मरता है, कई बार जिंदा हो जाता है। दर्शक आगे क्या के कारण सब कुछ जानते हुए भी सीरियल्स देखता रहता है। इन सीरियल्स की सबसे अनोखी बात ये है कि इसमें काम करने वाले बच्चे पर्दे के अंदर भले ही बच्चे रहते हैं, लेकिन बाहर वे जवान हो जाते हैं। हालांकि एक लड़की, बहू से मां और फिर मां से सास बन जाती है, लेकिन उसमें कोई बदलाव नहीं आता है।
नकली से लगते हैं गांव
एंटरटेनमेंट चैनल्स के कई सीरियल्स गांव और गरीब की कहानी दिखाते हैं, सोशल मुद्दे उठाते हैं, लेकिन सजे धजे गांववालों और हर वक्त मेकअप किए गांव के लोगों को देखना अजीब सा लगता है। घर इतने रंगीन नजर आते हैं कि मन करता है कि काश ऐसा घर हमारा भी हो। कई तरह के सामाजिक सरोकारों से जुड़ुे मुद्दों की दुहाई देने वाले सीरियल्स में सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे कब गौण हो गए पता हीं नहीं चलता है।
भूतिया सीरियल्स की है बाढ़
कल्पना कीजिए कि आपके घर में कोई व्यक्ति मक्खी बन जाए। दर्शकों को बेवकूफ बनाने के लिए सीरियल्स हमेशा कुछ ऐसा करते हैं कि देखने वाला अपना माथा पीट ले। ऐसा लगता है कि दुनिया की सारी समस्याएं, सारा दुख इन सीरियल्स के लोगों के सिर ही है। ऐसे में भूत प्रेत की कहानी कोढ़ में खाज ही लगती है। देखने वाले कैसे इसे झेल लेते हैं भगवान ही मालिक हैं।
इतनी खूबसूरत नागिन देखी है कहीं
एक टीवी चैनल पर इन दिनों नागिन और उसके बदले से जुड़ा एक सीरियल दिखाया जा रहा है। नागिन का प्यार दिखाने के लिए सीरियल में दो खूबसूरत युवतियों को चुना गया। चैनल ने सीरियल में प्यार का तड़का भी जमकर लगाया और इसे टीआरपी भी जबर्दस्त मिली। बावजूद इसके इक्कीसवीं सदी में नाग-नागिन और भूत प्रेत जैसी बातों पर यकीन करना मुश्किल होता है। साथ ही जिस तरह से इन सीरियल्स को खींचा जाता है ये परेशानी ही पैदा करते हैं।
धूप के साए में छांव भी मिली
टीवी पर एंटरटेनमेंट और सीरियल के नाम पर सब कुछ गड़बड़ है, ऐसा नहीं है। धूप के साए में छांव भी कहीं कहीं नजर आ ही जाती है। एक टीवी चैनल पर कुछ पाकिस्तानी सीरियल को जगह दी गई है। उम्दा कहानी और शानदार एक्टिंग देखनी हो तो ये सीरियल आपकी मुराद पूरी कर सकते हैं। साथ ही इनकी खास बात ये है कि ये कहानी को बहुत लंबा नहीं खींचते और घटनाक्रम इतनी तेजी से घटता है कि आपकी उत्सुकता बनी रहती है। आखिर में सीरियल देखने वालों से माफी मांगने का दिल करता है क्योंकि वे जिस तरह से इन्हें झेल रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि आप सही हैं और मेरे जैसे ऐसे सीरियल्स के धुर विरोधी गलत। आपका भ्रम बना रहे और मेरा विरोध चलता रहे। मैं ये भी नहीं चाहता, लेकिन इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपको ऐसे सीरियल्स को लेकर विचार जरूर करना चाहिए।
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