दस सालों पहले देखा धुंधलका आज भी छाता होगा?
क्या बच्चे आज भी धूल से सने घर आते होंगे?
क्या गुस्से में पीला सूरज मुस्कुराते हुए लाल होता होगा?
मैं नहीं जानता।
शायद कहीं ऐसा भी होता होगा
लेकिन मेरे शहर में ऐसा नहीं होता
शाम को दफ्तर खबरों में डूबता है
धुंधलके, सूरज और बच्चों से बेखबर होकर
रात का अंधेरा जब रोशनी को खत्म कर देता है
तब मैं दबे पांव घर पहुंचता हूं
दबे पांव, चोरों की तरह
बच्चे जाग जाएंगे तो पूछेंगे
कल शाम का वादा तोड़ दिया
कल शाम का वादा फिर करेंगे
मैं क्या कहूं
मैं नही जानता।
हर रोज दफ्तर से बाहर झांकता हूं
जानने के लिए अब शाम कैसी होती है
क्या अब भी शाम को पक्षी चहचहाते हैं
क्या शाम को अब भी लौटकर घर आते हैं
मेरे जैसे दफ्तरखोरों के लिए ये प्रश्न ऐसे ही होते होंगे
अनिश्चय में झूलते, पुराने जमाने के खयालों पर आधारित
फिर भी उम्मीद है कि एक शाम मुझे नसीब होगी
डूबती रोशनी, चहचहाते पक्षी, लौटते बच्चे और मुस्कुराते सूरज की।
मैं जानता हूं, मैं जानता हूं, मैं जानता हूं।
- अभिषेक
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