जन्मतिथि 14 जून पर विशेष
गरीबी और आर्थिक विषमता हर युग में क्रांति का आधार रही है, फिर चाहे वह रक्तरंजित हो या मौन तख्तापलट। युग बदलने के साथ क्रांति के तौर-तरीकों में जरूर बदलाव आता है, लेकिन इसकी मूल भावना ‘शोषण और शोषक का विरोध‘ कभी नहीं बदलती है। सत्ता की तानाशाही और नवउपनिवेशवाद, ये दो प्रमुख कारण थे जिसके खिलाफ क्यूबा में क्रांति का सूत्रपात हुआ। सत्ता परिवर्तन करने वाली इस क्रांति ने दुनिया को वो शख्सियत दी जिसने नवउपनिवेशवाद और पूंजीवाद के शोषण से पूरी दुनिया को स्वतंत्र करने का बीड़ा उठाया। ये वीर गुरिल्ला था-अर्नेस्टो चे ग्वेरा।
14 जून 1928 को अर्जेंटीना के रोजारिया में जन्मे चे ने क्यूबा की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पूरी दुनिया में उनका चेहरा क्रांति का प्रतीक बन गया। एक गुरिल्ला योद्धा के साथ चे एक डाॅक्टर, लेखक, सामरिक सिद्धांतकार और कूटनीतिज्ञ भी थे। अपनी चिकित्सकीय शिक्षा के दौरान चे ने कई लैटिन अमेरिकी देशों की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने लोगों को भूख और गरीबी से दम तोड़ते देखा। ठंड में कपड़ों के अभाव में ठिठुरते और दवाइयों के अभाव में रोगों से लड़ते देखा। ऐसी परिस्थितियों ने चे को हिलाकर रख दिया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इस गरीबी और आर्थिक विषमता के मुख्य कारण एकाधिपत्य पूंजीवाद, नवउपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद थे और इनसे छुटाकारे का एकमात्र जरिया था-विश्वक्रांति। इसी दौरान ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति याकोबो आरबेंज गुजमान के सुधारों ने चे को प्रभावित किया और वे इनमें भाग लेने लगे। इसके बावजूद अमेरिकी मदद से उन्हें हटा दिया गया। इस वक्त तक चे के विचारों ने पुख्ता शक्ल अख्तियार कर ली थी। इसके कुछ वक्त बाद चे ने फिदेल कास्त्रो से मुलाकात की और क्यूबा की 26 जुलाई क्रांति में शामिल हो गए।
जान क्विंसी आदम ने उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में क्यूबा के बारे में कहा था कि यह द्वीप स्पेनिश शाखा से टूटा हुआ सेब है, जिसे देर सवेर अंकल साम की झोली में ही पड़ना है। अमेरिका ने झोली फैलाई जरूर लेकिन फीदेल कास्त्रो और चे ने उसे इसमें गिरने से रोक लिया। क्यूबा की क्रांति के दौरान चे क्रांतिकारियों की कमान में दूसरे स्थान पर पहुंच गए। दो साल चली इस क्रांति ने बतिस्ता की सत्ता को ध्वस्त कर ही दम लिया। इस दौरान चे गुरिल्ला योद्धा और नेता के रूप में उभरे। चे ने फीदेल कास्त्रो की सरकार में मंत्री पद ग्रहण किया और क्यूबा के समाजवाद के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया।
लक्ष्य विश्ववक्रांति का हो तो एक क्रांति या देश की स्वतंत्रता बहुत छोटी लगने लगती है। क्यूबा की क्रांति के बाद चे ने अपने लक्ष्यों को एक बार फिर साकार करने की कोशिश की। इस बार बोलिविया के किसानों और आम लोगों की दयनीय स्थिति ने चे को प्रभावित किया और वे उन्हें न्याय दिलाने के लिए निकल पड़े। फीदेल कास्त्रो को लिखे अपने पत्र में चे ने सभी पदों के साथ क्यूबा की नागरिकता तक छोड़ने की घोषणा की। ये अद्भुत निर्णय चे जैसा क्रांतिकारी ही ले सकता था। चिकित्सा जैसा सम्मानित और आर्थिक रूप से बेहतरीन पेशा ठुकराने वाले चे ने अन्याय और आर्थिक विषमता के खिलाफ युद्ध चुना। बोलिविया में किसानों की हालत बेहद दयनीय थी। उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जगाने के उद्देश्य से ही चे बोलिविया पहुंचे थे।
कहते हैं डरा हुआ व्यक्ति कभी-कभी बेहद खतरनाक हो उठता है। पूंजीवाद और नवउपनिवेशवाद के धुर विरोधी चे से अमेरिका भयभीत था। उस पर नजर रखी जा रही थी। अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआइए ने चे के कार्याें और उसके अभियानों की एक मोटी फाइल तैयार कर रखी थी। दुनिया में चे की बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन से वह अमेरिका को अपना सबसे बड़ा शत्रु नजर आ रहा था। बोलिविया की सरकार भी इस महान योद्धा के कारण आम लोगों की नजरों में गिरती जा रही थी। चे के खिलाफ सरकार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। फिर 8 अक्टूबर 1967 का दिन भी आया। दुश्मनों ने चे और उसके साथियों को घेर लिया। चे घायल होने पर भी तब तक लड़ते रहे, जब तक की उनकी बंदूक एम-1 की नली दुश्मन की गोली से नष्ट नहीं हो गई। उसके पास जो पिस्तौल थी, उसकी मैगजीन भी गायब थी। यही वे परिस्थितियां थीं, जिनके कारण चे को जीवित पकड़ा जा सका। चे को ला हिग्वेरा गांव ले जाया गया।
राष्ट्रपति और तमाम बड़े अधिकारियों ने विचार-विमर्श के बाद कर्नल आंद्रे सेलिच को ला हिग्वेरा भेजा। उन्होंने करीब 45 मिनट चे के साथ बिताए। इस दौरान चे से जो भी बातचीत हुई वह सेलिच के दस्तावेजों में दर्ज है। सेलिच ने चे से पूछा-तुम क्यूबा के हो या अर्जेंटीना के ?
‘मैं
क्यूबा का हूं, मैं अर्जेंटीना का हूं, मैं बोलिविया का हूं, मैं पेरू का
हूं, मैं इक्वेडोर का हूं जाने कहां-कहां का हूं, समझ रहे हो ना।‘ चे का यह
उत्तर हमें बहुत कुछ समझाता है। हम अपने गांव, जिले और राज्य के लिए मर
मिटने की बात करते हैं। देश के लिए मर मिटना और भी सम्मान की बात है, लेकिन
पूरी दुनिया के गरीब और असहाय लोगों के लिए बलिदान होने से महान और क्या
हो सकता है? इस बातचीत के बाद अमेरिकी सीआइए एजेंट की मौजूदगी में बोलिविया
के सैनिकों ने 9 अक्टूबर 1969 को चे की 39 वर्ष की उम्र में गोली मारकर
हत्या कर दी।
अमेरिका ने जिस चे ग्वेरा को मिटा दिया उसी की कंपनियां
चे की फोटो टीशर्ट, टोपी और अनेक उत्पादों पर छापकर मोटा मुनाफा कूट रही
हैं। चे के शरीर को भले ही अमेरिका ने मिट्टी में मिला दिया हो, लेकिन
उनके विचार और मानवता के लिए कुछ करने की अद्भुत प्रेरणा लोगों के
दिलो-दिमाग में आज भी पल्लवित हो रही है।
- अभिषेक