बुधवार, 29 जून 2016

हम भी उनके हमराह हो चले हैं

आज हम भी उनके हमराह हो चले हैं
वो अपनी रजा छुपा और हम गम दबा चले हैं

उनकी भी खता क्या, कुसूर मेरा भी नहीं
दीवानों की किस्मत जो राजे दिल दफन कर चले हैं

दो शाखाओं की दूरी ने हमें मिलने न दिया
अब ये सूखे पत्ते जमीं पर मिलने चले हैं

उनके जाने से हो चला है वीरान सब कुछ
कुछ तो शर्म करो दोस्तो वो और होंगे जो मनचले हैं

खुदा की इबादत की जो हमने सच्चाई बयां की
इश्क को समझाया क्या कि काफिर हो चले हैं

- अभिषेक

मंगलवार, 28 जून 2016

नींद कैसे आएगी ?

काम पर से घर लौट रहा हूं
और
बहुत चिंतित हूं
ना जाने किसने
रास्ते के सारे गडढे भर दिए हैं
अब न झटके लगेंगे
न थकान होगी
और
न कमर अटकेगी
मैं बहुत चिंतित हूं
आखिर
आज रात नींद कैसे आएगी?

- अभिषेक

रविवार, 26 जून 2016

सूखे पत्ते क्यों जलाते हैं लोग

सूखे पत्ते क्यों जलाते हैं लोग
अपनी बात से मुकर जाते हैं लोग

हिम्मत के मायने यहां बहुत छोटे हैं
क्यों पीठ पीछे बात बनाते हैं लोग

इन किताबों को सिरहाने रख सो जाइए
आजकल चापलूसी में बीए कराते हैं लोग

खुली फिजां में घुटता है दम उनका
बंद कमरों में जिंदगी जिए जाते हैं लोग

चरागों से रोशन होती है दुनिया
और अंधेरे के लिए चराग बुझाते हैं लोग

यहां दुश्मनों के लिए बन गई हैं दीवारें
दोस्ती भी ऐसी कि मंदिर-मस्जिद गिराते हैं लोग


- अभिषेक

मंगलवार, 21 जून 2016

मेहरबानी कीजिए और बुद्धू बक्से के ऐसे शोज को चलता कीजिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के अभियान में जुटे थे। उस वक्त उनका एक बयान काफी सुर्खियों में रहा था। मोदी ने उस वक्त कहा था कि भारत को पहले लोग सपेरों के देश के रूप में जानते थे। उस बयान को दो साल का वक्त गुजर चुका है। हम दो सालों में मंगल तक पहुंच चुके हैं, लेकिन हमारे बुद्धू बक्से की सुई सांप-सपेरों के देश में ही अटकी नजर आती है। इस दौर में जो बुद्धू बक्से में दिखाया जा रहा है उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि इस सुई के अटके दौरे को ठीक करना फिलहाल किसी मेकेनिक के लिए संभव नहीं है। तभी तो नाग-नागिन की बात करने वाले डेली सोप्स बुद्धू बक्से में जीवित है और हम उसे लगातार झेल रहे हैं।


डेली सोप्स की भारतीय दुनिया में जब से सास-बहू और लम्बे सीरियल्स का दौर आया है, लगता है कहानी खत्म हो गई है। एक सीरियल जिस कहानी के साथ शुरू होता है वह कहानी अगले कुछ दिनों में खत्म हो जाती है। फिर कहानी के घिसटने का सिलसिला ऐसा शुरू होता है कि थमने का नाम ही नहीं लेता है। एक आदमी कई बार मरता है, कई बार जिंदा हो जाता है। दर्शक आगे क्या के कारण सब कुछ जानते हुए भी सीरियल्स देखता रहता है। इन सीरियल्स की सबसे अनोखी बात ये है कि इसमें काम करने वाले बच्चे पर्दे के अंदर भले ही बच्चे रहते हैं, लेकिन बाहर वे जवान हो जाते हैं। हालांकि एक लड़की, बहू से मां और फिर मां से सास बन जाती है, लेकिन उसमें कोई बदलाव नहीं आता है।


नकली से लगते हैं गांव
एंटरटेनमेंट चैनल्स के कई सीरियल्स गांव और गरीब की कहानी दिखाते हैं, सोशल मुद्दे उठाते हैं, लेकिन सजे धजे गांववालों और हर वक्त मेकअप किए गांव के लोगों को देखना अजीब सा लगता है। घर इतने रंगीन नजर आते हैं कि मन करता है कि काश ऐसा घर हमारा भी हो। कई तरह के सामाजिक सरोकारों से जुड़ुे मुद्दों की दुहाई देने वाले सीरियल्स में सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे कब गौण हो गए पता हीं नहीं चलता है।

भूतिया सीरियल्स की है बाढ़
कल्पना कीजिए कि आपके घर में कोई व्यक्ति मक्खी बन जाए। दर्शकों को बेवकूफ बनाने के लिए सीरियल्स हमेशा कुछ ऐसा करते हैं कि देखने वाला अपना माथा पीट ले। ऐसा लगता है कि दुनिया की सारी समस्याएं, सारा दुख इन सीरियल्स के लोगों के सिर ही है। ऐसे में भूत प्रेत की कहानी कोढ़ में खाज ही लगती है। देखने वाले कैसे इसे झेल लेते हैं भगवान ही मालिक हैं।


इतनी खूबसूरत नागिन देखी है कहीं
एक टीवी चैनल पर इन दिनों नागिन और उसके बदले से जुड़ा एक सीरियल दिखाया जा रहा है। नागिन का प्यार दिखाने के लिए सीरियल में दो खूबसूरत युवतियों को चुना गया। चैनल ने सीरियल में प्यार का तड़का भी जमकर लगाया और इसे टीआरपी भी जबर्दस्त मिली। बावजूद इसके इक्कीसवीं सदी में नाग-नागिन और भूत प्रेत जैसी बातों पर यकीन करना मुश्किल होता है। साथ ही जिस तरह से इन सीरियल्स को खींचा जाता है ये परेशानी ही पैदा करते हैं।

धूप के साए में छांव भी मिली
टीवी पर एंटरटेनमेंट और सीरियल के नाम पर सब कुछ गड़बड़ है, ऐसा नहीं है। धूप के साए में छांव भी कहीं कहीं नजर आ ही जाती है। एक टीवी चैनल पर कुछ पाकिस्तानी सीरियल को जगह दी गई है। उम्दा कहानी और शानदार एक्टिंग देखनी हो तो ये सीरियल आपकी मुराद पूरी कर सकते हैं। साथ ही इनकी खास बात ये है कि ये कहानी को बहुत लंबा नहीं खींचते और घटनाक्रम इतनी तेजी से घटता है कि आपकी उत्सुकता बनी रहती है।


आखिर में सीरियल देखने वालों से माफी मांगने का दिल करता है क्योंकि वे जिस तरह से इन्हें झेल रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि आप सही हैं और मेरे जैसे ऐसे सीरियल्स के धुर विरोधी गलत। आपका भ्रम बना रहे और मेरा विरोध चलता रहे। मैं ये भी नहीं चाहता, लेकिन इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपको ऐसे सीरियल्स को लेकर विचार जरूर करना चाहिए।

रविवार, 19 जून 2016

नाक

उठी हुई,
सपाट,
चपटी,
तोते जैसी
लहरदार,
फैली हुई
और भी न जाने कैसी-कैसी
होती है नाक।
लेकिन दबे-कुचलों के लिए
हमेशा एक जैसी
होती है नाक।

ये सवाल है नाक का,
तो सुन लीजिए
कुछ और प्रकार है नाक का,
हिटलर,
मुसोलिनी,
ओसामा बिन
अधूरी है नाक
हर चेहरे पर
बदरंग दिल से सजती है नाक।

आप जहां भी जाएंगे
बहुत सी नाक पाएंगे
जैसे कई दिनों से बंद हो तिजोरियों में
आज ही तराशी
और आज ही लगाई हो
जैसे बहुत मेहनत से चेहरे पर सजाई हो।

यहां हर आदमी नाक में नजर आता है
कर्मचारियों से मिलते वक्त,
वो हिटलर की नाक लगाता है
खूब रौब जमाता है
जब कभी गांव जाता है
संवाददाता की नाक हटाकर
संपादक की नाक में आता है
मगर किसी अधिकारी के सामने
वो बेनाक हुआ जाता है।

पूंजी कमाई तो क्या कमाई
जब तक तिजोरियों में नई नाक न जमाई
सारी तिजोरियां भरी हैं
जिनमें नाक ही नाक भरी हैं
किसी पर गुस्सा है
किसी पर गुमान है
हर बात दूसरों के लिए है
खुद का ईमान खराब है
फिर भी नाक का अभिमान है
हर आदमी के गहरे मन में
एक ही चीज भरी है
हर जगह
सड़ी हुई नाक सजी है।

- अभिषेक

शनिवार, 18 जून 2016

गुलबर्ग सोसायटी मामले में सजा का एेलान...पूरा हुआ राम का वनवास



भगवान राम जब 14 साल का वनवास भोगकर अयोध्या आए थे तो लोगाें की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। गुलबर्ग सोयायटी दंगा मामले में फैसला 14 साल बाद आया है। 14 साल बाद आया ये फैसला इंसाफ का वनवास खत्म होने का ऐलान है और अपनों को खो चुके लोगों के लिए मरहम की एक पट्टी भी।


गुलबर्ग सोसायटी दंगा केस मामले में शुक्रवार दोपहर को फैसला आ गया है। जब इस मामले में इंसाफ की राहत बरसी है मैं शाम के धुंधलके में एक और आंधी उठते महसूस कर रहा हूं। बालकनी से सामने का मैदान साफ नजर आ रहा है। मैदान में बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं और हर बात पर झगड़ रहे हैं। बच्चों का धर्म अलग- अलग है, लेकिन ये झगड़ा कोर्इ दंगा नहीं है। यह खेल है। जब ये घर जाएंगे तो इनके कांधों पर दोस्तों का हाथ होगा। हालांकि मेरी चिंता वर्तमान नहीं बल्कि भविष्य को लेकर है जब ये बड़े होंगे, समझदार होंगे। क्या तब भी वे ऐसे ही होंगे? मेरे जैसे लोगों की दुआओं का असर हो और ऊपर वाला करम करे तो शायद ये ऐसे ही हों, यारबाज और एक दूसरे से बेहद प्रेम करने वाले।


अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी दंगा केस मामले में 24 लोगों को सजा सुनाई गई है। इनमें से 11 लोगों को उम्रकैद, 12 को सात साल की जेल और एक दोषी को 10 साल की सजा सुनाई गई है। 69 लोगों की हत्या के मामले में विशेष अदालत ने 64 आरोपियों में से 24 को दोषी माना था। ये मामला 28 फरवरी 2002 का है, जब दंगाइयों ने कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी सहित 69 लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें से मरने वाले ज्यादातर लोगों ने जाफरी के घर पर इस उम्मीद से शरण ली थी कि जाफरी राज्य के जाने-माने नाम है और वे इस संकट की घड़ी में किसी भी तरह संकट से निपट सकते हैं।


इस मामले में बहुत से पीड़ितों के लिए ये फैसला ऐसे दौर में आया है जब वो दंगे की बात नहीं करते, उसे भुलाने की कोशिश करते हैं ताकि रो-रोकर सूख चुकी आंखाें में अब खून न उतर आए। हालांकि दंगे में अपना सबकुछ लुटा चुके लोगों के लिए सबकुछ भुला देना भी आसान नहीं है। वो व्यक्ति जिसके सामने उसके सबसे अजीज लोगों को मार दिया गया हो भला वह कैसे इसे भूल सकता है? इस दंगे का सबसे भयावह पक्ष ये है कि दंगाई चार घंटों तक लोगों को मारते रहे आैर गुलबर्ग सोसायटी के सामने पुलिस खड़ी देखती रही। जब आंखें ठहर गई, जुबां ने विरोध करना छोड़ दिया, सांसों ने धोखा दे दिया तब जाकर कहीं किसी ने सुध ली।


अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी ऐसे इलाके में नहीं है, जहां जिंदगी बचाने की जद्दोजहद चार घंटे ले ले और तब तक 69 जिंदगियां मौत का आगोश थाम ले। अस्पताल से लेकर देश के सैनिकों तक सबकुछ बहुत पास ही था। एहसान जाफरी ने उस वक्त जिससे मदद मिल सकती थी उस हर शख्स को फोन किया लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया। इस मामले में कोर्ट ने 11 लोगों को धारा 302 के तहत दोषी माना है। हालांकि आपराधिक षड़यंत्र की धारा 120बी को कोर्ट ने हटा दिया। ये लम्बे समय बाद आया फैसला है, एेसा लगता है जैसे राम ने वनवास के बाद अपना सबकुछ न सही, कुछ पा जरूर लिया है।


गुलबर्ग सोसायटी दंगा मामले ने देश के दो धर्मों के बीच खाई को और बढ़ाने का ही काम किया है। अविश्वास की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। मेरे घर के सामने खेल रहे बच्चों को देखकर ऐसा जरूर लगता है कि वे इस खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस खाई को और गहरा करने वाले भी इसी देश में मौजूद हैं। भले ही गुलबर्ग सोसायटी दंगा मामले में कोर्ट ने दोषियों को सजा सुना दी हो लेकिन ये भी उतना ही सच है कि बंदर-भालुओं को गले लगाकर और उनकी सेना बनाकर रावण को शिकस्त देने वाले भगवान राम के इस देश में हम हर इंसान को गले लगाने से भी परहेज करते हैं। ये स्थिति बदलनी चाहिए।



और आखिर में...
कोई भी दंगा एक साथ शुरू नहीं होता। उसकी शुरूआत लोगों के दिलों में होती है। दंगाई बनकर लोगों की जिंदगियां फूंकने से बेहतर है अपने दिलों में पैदा होती नफरत को फूंक दीजिए। मैं उन बच्चों को देखकर सोच रहा हूं कि काश उन्हें जमाने की हवा न लगे आैर वो बच्चे ही रहें।

- अभिषेक

शुक्रवार, 17 जून 2016

विदेशियों की देन हैं हिन्दू आैर इंडिया जैसे नाम


कुछ सालों पहले तक गली मोहल्लों की दीवारों पर एक नारा अक्सर दिखाई देता था, मैं हर बार उसे पढ़ता। दीवारों पर लिखे उन शब्दों को देखकर अक्सर ये सवाल जरूर जेहन में उभरते थे कि हिन्दू, हिन्दुस्तान, हिन्दी जैसे शब्द कहां से आए। किसने ये शब्द खोजने की कोशिश की और कैसे ये नाम हर आम ओ खास की जुबान पर चढ़ते ही चले गए। अब आपको वो नारा भी बता देता हूं। वो नारा था- ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान जागे मेरा देश महान।‘

हिन्दू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई? 
एक जमाने में बहुत से लोगों के लिए हिन्दू शब्द किसी धर्म का नहीं बल्कि एक स्थान पर रहने वाले समूह के लिए प्रचलित शब्द था। हालांकि आज के दौर में हिन्दू शब्द को एक धर्म से जोड़कर देखा जाता है। हिन्दू शब्द की पैदाइश को बहुत से लोग मुसलमानों और इस्लाम की देन मानते हैं, लेकिन ये बात सही नहीं है। हिन्दू शब्द की उत्पत्ति इस्लाम के जन्म से भी कई सौ वर्षों पहले ही अस्तित्व में आ चुकी थी। हिन्दू शब्द इस्लाम की नहीं बल्कि ईरानियों की देन है।   

ईरान से आया 'हिन्दु'
ये माना जाता है कि ईरान के लोगों ने सबसे पहले ‘हिन्दु‘ शब्द का उच्चारण किया। इसके पीछे तर्क ये दिया जाता है कि ईरानवासी ‘स‘ शब्द का उच्चारण ‘ह‘ किया करते थे। इस प्रकार से ‘सिन्धु‘ से ‘हिन्दु‘ की उत्पत्ति मानी जाती है, जो कि समय के साथ हिन्दू हो गया और इसे एक धर्म के साथ जोड़ दिया गया। आगे चलकर इसी हिन्दु शब्द से हिन्दुस्तान भी बना।

यूनान से आया 'इंडिया'
ईरानवासियों के उच्चारण के कारण जहां इस देश को हिन्दुस्तान कहा गया। वहीं यूनानियों ने इस देश को एक और नाम दिया। हिन्दुस्तान को मिले एक नाम ‘इंडिया‘ को यूनानियों की देन माना जाता है। इस नाम के पीछे भी उच्चारण की गलती का ही हाथ है। माना जाता है कि यूनानी लोग ‘ह‘ के स्थान पर ‘अ‘ उच्चारित करते थे। यूनानियों ने ‘हिन्दु‘ को ‘इन्दु‘ कहा और आगे चलकर ये नाम ‘इंडिया‘ बन गया। कुछ समय तक भारत को कई लोगों ने ‘इंड‘ भी कहा। दुनिया के कई ख्यातनाम कवियों ने भारत को इसी नाम से संबोधित किया है। आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम ‘इंडिया‘ प्रचलित हुआ।

ह्वेनसांग का भी है नाम पर दावा
भारत के प्राचीन ग्रंथों में हिन्दुस्तान, हिन्दु, हिन्दू जैसे शब्दों का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता है। हालांकि आर्यावर्त या आर्यदेश जैसे संबोधन यहां पर आम थे। हालांकि ये नाम लोकप्रिय नहीं हो सके और समय के साथ भुला दिए गए। इन सबके बीच चीनी यात्री ह्वेनसांग ने हिन्दू शब्द की जो उत्पत्ति बताई है, उस पर भी बहस हो सकती है। ह्वेनसांग का कहना है कि हिन्दू शब्द चीनी शब्द 'इन्तु' से बना है। इसका अर्थ चन्द्रमा होता है। ह्वेनसांग ने ये भी लिखा है कि जैसे हजारों-लाखों सितारों के बीच में चन्द्रमा की प्रतिष्ठित होता है वैसी ही प्रतिष्ठा भारत की है।

दुनिया भर में कुछ ही ऐसे देश होंगे जिनके इतने नाम होंगे। हिन्दू, हिन्दुस्तान, भारत, इंडिया, आर्यावर्त, आर्यदेश जैसे नाम भारत की विविधता और हर अच्छे-बुरे को हृदय में स्थान देने की पवित्र भावना को दर्शाता है। ये नाम सिर्फ इतना चाहते हैं कि दुनिया में इन्हें कभी कोई बदनामी ना झेलना पड़ी।


- अभिषेक


बुधवार, 15 जून 2016

राजनीति तुम्हें 'डियर' कैसे कह दूं



डियर राजनीति,

हम सब यहां पर प्रसन्न हैं और भगवान से तुम्हारी प्रसन्नता की कामना करते हैं। ये कामना इसलिए कि तुम्हें हमेशा अप्रसन्न ही देखते हैं। परमपिता की असीम अनुकम्पा से ये पत्र तुम्हें लिखने का जो मुझे मौका मिला है, उसे मैं अपना अहोभाग्य समझता हूं। ईश्वर से कामना है कि एक बार के लिए ये बहुत ज्यादा है, अब ऐसा कोई पत्र लिखने का मुझे मौका न दें।

तो सुनो डियर राजनीति, तुम इतनी कितनी भोली हो समझ ही नहीं आता? मैं तुम्हें डियर राजनीति तो कह सकता हूं ना। तुम बहुत जल्दी बुरा मान जाती हो, लेकिन मुझे अपना हितैषी समझो और कुछ समझ लो। डियर का एक मतलब हिरण भी निकाला जा सकता है ना, लेकिन हिरण तुम्हें कोई कैसे कह सकता है। मैं माफी मांगता हूं। तुम तो ऐसी हो नहीं सकती हो ना। कैसे हिरण का काम कूदना, उछलना और फिर कभी कभी शिकार बन जाना होता है? इतने सालों से मैं तुम्हें जानता हूं। उछलना कूदना तुम्हें शोभा नहीं देता। ‘डियर राजनीति‘ ये आपकी शालीन छवि पर एक भददा सा दाग जैसा नजर आता है। उछलकूद करते हुए विवादों को जन्म देना तुम्हारा काम नहीं है। बस तुम्हारा काम है विवाद होते देखना। आखिर कैसे तुम डियर हो सकती हो। ना-ना 'डियर राजनीति' नहीं जमता।


‘हां, शिकार करने में आप अच्छी हैं इसके लिए साधुवाद।‘ मैं तो आपको ये भी नहीं कह सकता। सारे इल्जाम आपके पास आते भी हैं तो बच कर निकल जाते हैं तो मैं आपको ये भी नहीं कह सकता हूं और न ही इसके लिए आपको साधुवाद दे सकता हूं।

अब दूसरे अर्थ पर नजरें इनायत करूं तो यहां पर भी आपको निराशा ही हाथ लगेेगी। आपको कोई प्रिय कह दे, कैसे कह दे? आपकी हर बात विवादों से जन्म लेती हैं। आपकी हर बात पर लोगों को कोफ़्त होती है। तो डियर राजनीति जी आप किसी के लिए प्रिय कैसे हो सकती हैं। यूं तो डियर माॅम, डियर फादर जैसे कई संबोधन हैं। पर राजनीति के लिए डियर कौन कहता है।

शुरू में सोचा था कि डियर पर आपको कुछ ऐसा लिखूं कि आपको भी लगे कि डियर ठीक है, इसमें कुुछ गलत नहीं है। पर अब लगता है कि ये डियर दूसरों के लिए ही रहने दें। आप बिना डियर के ही अच्छी हैं।

इस डियर पत्र का जवाब जरूर दीजिएगा।


आपका

....................


(नोटः- इस पोस्ट को किसी भी राजनेता से जोड़कर देखना आपकी भूल है, लेकिन भूल किसी से भी हो सकती है।)



- अभिषेक

मंगलवार, 14 जून 2016

परमाणु बम गिरा क्या?

कहानी


ताऊजी...

ताऊजी...

ताऊजी...


ये रामदयाल के छोटे भाई कृपाशंकर का छोटा बेटा मोहन था। जो लगातार अपने ताऊ को नमक का पानी पिलाने के लिए चिल्लाए जा रहा था। डाॅक्टर ने दो-चार दिन पहले ही रामदयाल को नमक का पानी पिलाने के लिए कहा था।


मोहन ने रामदयाल का सिर थोड़ा सा ऊँचा उठाया और फिर नमक मिले पानी के गिलास को रामदयाल के होठों से लगा दिया। थोड़ी ही देर बाद रामदयाल की चेतना लौट आई।


रामदयाल ने इधर-उधर देखा। उसकी आंखें फैल गर्इ। पिछले दो दिनों से वह एक सवाल लगातार दोहराए जा रहा था। उसने एक बार फिर वही सवाल दोहराया।


‘परमाणु बम गिरा क्या?‘


ये सवाल सुनते ही उसकी छोटी बेटी झुंझला उठी। उसी झुंझलाहट में उसने कहा, 'आपको क्या हो गया है, क्यों दो दिनों से एक ही रट लगा रखी है? कोई परमाणु बम नहीं गिरेगा आप पागल हो गए हो।'


‘अच्छा...‘ रामदयाल ने अपना सीना फुलाया। जैसे किसी बात का बोझ उतार रहा हो।


'रोटी बना ली क्या?' रामदयाल ने पूछा।


'हां, बना ली।' बेटी ने रूखा सा जवाब दिया।


'... तो खाओगे।' रामदयाल ने बेहद धीमे से पूछा।


'अब बनी है तो खाएंगे ही।' बेटी ने जवाब दिया।


'परमाणु बम भी बना है तो गिरेगा ही।' रामदयाल ने कहा और मुंह फेर लिया।


एक बार फिर रामदयाल की चेतना उसका साथ छोड़ रही है।


- अभिषेक

सोमवार, 13 जून 2016

चे ग्वेराः हम तुम्हें कभी भुला नहीं पाएंगे

जन्मतिथि 14 जून पर विशेष




गरीबी और आर्थिक विषमता हर युग में क्रांति का आधार रही है, फिर चाहे वह रक्तरंजित हो या मौन तख्तापलट। युग बदलने के साथ क्रांति के तौर-तरीकों में जरूर बदलाव आता है, लेकिन इसकी मूल भावना ‘शोषण और शोषक का विरोध‘ कभी नहीं बदलती है। सत्ता की तानाशाही और नवउपनिवेशवाद, ये दो प्रमुख कारण थे जिसके खिलाफ क्यूबा में क्रांति का सूत्रपात हुआ। सत्ता परिवर्तन करने वाली इस क्रांति ने दुनिया को वो शख्सियत दी जिसने नवउपनिवेशवाद और पूंजीवाद के शोषण से पूरी दुनिया को स्वतंत्र करने का बीड़ा उठाया। ये वीर गुरिल्ला था-अर्नेस्टो चे ग्वेरा।

14 जून 1928 को अर्जेंटीना के रोजारिया में जन्मे चे ने क्यूबा की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पूरी दुनिया में उनका चेहरा क्रांति का प्रतीक बन गया। एक गुरिल्ला योद्धा के साथ चे एक डाॅक्टर, लेखक, सामरिक सिद्धांतकार और कूटनीतिज्ञ भी थे। अपनी चिकित्सकीय शिक्षा के दौरान चे ने कई लैटिन अमेरिकी देशों की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने लोगों को भूख और गरीबी से दम तोड़ते देखा। ठंड में कपड़ों के अभाव में ठिठुरते और दवाइयों के अभाव में रोगों से लड़ते देखा। ऐसी परिस्थितियों ने चे को हिलाकर रख दिया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इस गरीबी और आर्थिक विषमता के मुख्य कारण एकाधिपत्य पूंजीवाद, नवउपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद थे और इनसे छुटाकारे का एकमात्र जरिया था-विश्वक्रांति। इसी दौरान ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति याकोबो आरबेंज गुजमान के सुधारों ने चे को प्रभावित किया और वे इनमें भाग लेने लगे। इसके बावजूद अमेरिकी मदद से उन्हें हटा दिया गया। इस वक्त तक चे के विचारों ने पुख्ता शक्ल अख्तियार कर ली थी। इसके कुछ वक्त बाद चे ने फिदेल कास्त्रो से मुलाकात की और क्यूबा की 26 जुलाई क्रांति में शामिल हो गए।

जान क्विंसी आदम ने उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में क्यूबा के बारे में कहा था कि यह द्वीप स्पेनिश शाखा से टूटा हुआ सेब है, जिसे देर सवेर अंकल साम की झोली में ही पड़ना है। अमेरिका ने झोली फैलाई जरूर लेकिन फीदेल कास्त्रो और चे ने उसे इसमें गिरने से रोक लिया। क्यूबा की क्रांति के दौरान चे क्रांतिकारियों की कमान में दूसरे स्थान पर पहुंच गए। दो साल चली इस क्रांति ने बतिस्ता की सत्ता को ध्वस्त कर ही दम लिया। इस दौरान चे गुरिल्ला योद्धा और नेता के रूप में उभरे। चे ने फीदेल कास्त्रो की सरकार में मंत्री पद ग्रहण किया और क्यूबा के समाजवाद के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया।

लक्ष्य विश्ववक्रांति का हो तो एक क्रांति या देश की स्वतंत्रता बहुत छोटी लगने लगती है। क्यूबा की क्रांति के बाद चे ने अपने लक्ष्यों को एक बार फिर साकार करने की कोशिश की। इस बार बोलिविया के किसानों और आम लोगों की दयनीय स्थिति ने चे को प्रभावित किया और वे उन्हें न्याय दिलाने के लिए निकल पड़े। फीदेल कास्त्रो को लिखे अपने पत्र में चे ने सभी पदों के साथ क्यूबा की नागरिकता तक छोड़ने की घोषणा की। ये अद्भुत निर्णय चे जैसा क्रांतिकारी ही ले सकता था। चिकित्सा जैसा सम्मानित और आर्थिक रूप से बेहतरीन पेशा ठुकराने वाले चे ने अन्याय और आर्थिक विषमता के खिलाफ युद्ध चुना। बोलिविया में किसानों की हालत बेहद दयनीय थी। उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जगाने के उद्देश्य से ही चे बोलिविया पहुंचे थे।

कहते हैं डरा हुआ व्यक्ति कभी-कभी बेहद खतरनाक हो उठता है। पूंजीवाद और नवउपनिवेशवाद के धुर विरोधी चे से अमेरिका भयभीत था। उस पर नजर रखी जा रही थी। अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआइए ने चे के कार्याें और उसके अभियानों की एक मोटी फाइल तैयार कर रखी थी। दुनिया में चे की बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन से वह अमेरिका को अपना सबसे बड़ा शत्रु नजर आ रहा था। बोलिविया की सरकार भी इस महान योद्धा के कारण आम लोगों की नजरों में गिरती जा रही थी। चे के खिलाफ सरकार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। फिर 8 अक्टूबर 1967 का दिन भी आया। दुश्मनों ने चे और उसके साथियों को घेर लिया। चे घायल होने पर भी तब तक लड़ते रहे, जब तक की उनकी बंदूक एम-1 की नली दुश्मन की गोली से नष्ट नहीं हो गई। उसके पास जो पिस्तौल थी, उसकी मैगजीन भी गायब थी। यही वे परिस्थितियां थीं, जिनके कारण चे को जीवित पकड़ा जा सका। चे को ला हिग्वेरा गांव ले जाया गया।

राष्ट्रपति और तमाम बड़े अधिकारियों ने विचार-विमर्श के बाद कर्नल आंद्रे सेलिच को ला हिग्वेरा भेजा। उन्होंने करीब 45 मिनट चे के साथ बिताए। इस दौरान चे से जो भी बातचीत हुई वह सेलिच के दस्तावेजों में दर्ज है। सेलिच ने चे से पूछा-तुम क्यूबा के हो या अर्जेंटीना के ?

‘मैं क्यूबा का हूं, मैं अर्जेंटीना का हूं, मैं बोलिविया का हूं, मैं पेरू का हूं, मैं इक्वेडोर का हूं जाने कहां-कहां का हूं, समझ रहे हो ना।‘ चे का यह उत्तर हमें बहुत कुछ समझाता है। हम अपने गांव, जिले और राज्य के लिए मर मिटने की बात करते हैं। देश के लिए मर मिटना और भी सम्मान की बात है, लेकिन पूरी दुनिया के गरीब और असहाय लोगों के लिए बलिदान होने से महान और क्या हो सकता है? इस बातचीत के बाद अमेरिकी सीआइए एजेंट की मौजूदगी में बोलिविया के सैनिकों ने 9 अक्टूबर 1969 को चे की 39 वर्ष की उम्र में गोली मारकर हत्या कर दी।

अमेरिका ने जिस चे ग्वेरा को मिटा दिया उसी की कंपनियां चे की फोटो टीशर्ट, टोपी और अनेक उत्पादों पर छापकर मोटा मुनाफा कूट रही हैं। चे के शरीर को भले ही अमेरिका ने मिट्टी में मिला दिया हो,  लेकिन उनके विचार और मानवता के लिए कुछ करने की अद्भुत प्रेरणा लोगों के दिलो-दिमाग में आज भी पल्लवित हो रही है।

- अभिषेक

रविवार, 12 जून 2016

मतलब

मकान के टूटने का मतलब
आशियां के उजड़ने का मतलब
बुलबुल से पूछकर देखिए
हवा से झगड़ने का मतलब

कुछ आंसुओं का मतलब
दिल का टूटना नहीं होता
घड़ियों ने कब बताया है
वक्त के बदलने का मतलब

नाज है किस बात का
हाल देखा है बहार का
अब तुमको समझाऊं क्या,
उम्र के ढलने का मतलब

पंख टूटने का मतलब
आसमां का छूटना नहीं होता
खुद का मिट जाना है
उम्मीदों के मिटने का मतलब

किससे पूछूं इश्क का मतलब
मैं जानूं या फिर जाने वो
उसके जाने से समझ में आया
खुदा को ढूंढने का मतलब।

- अभिषेक

शाम


दस सालों पहले देखा धुंधलका आज भी छाता होगा?
क्या बच्चे आज भी धूल से सने घर आते होंगे?
क्या गुस्से में पीला सूरज मुस्कुराते हुए लाल होता होगा?
मैं नहीं जानता।

शायद कहीं ऐसा भी होता होगा
लेकिन मेरे शहर में ऐसा नहीं होता
शाम को दफ्तर खबरों में डूबता है
धुंधलके, सूरज और बच्चों से बेखबर होकर
रात का अंधेरा जब रोशनी को खत्म कर देता है
तब मैं दबे पांव घर पहुंचता हूं
दबे पांव, चोरों की तरह
बच्चे जाग जाएंगे तो पूछेंगे
कल शाम का वादा तोड़ दिया
कल शाम का वादा फिर करेंगे
मैं क्या कहूं
मैं नही जानता।

हर रोज दफ्तर से बाहर झांकता हूं
जानने के लिए अब शाम कैसी होती है
क्या अब भी शाम को पक्षी चहचहाते हैं
क्या शाम को अब भी लौटकर घर आते हैं
मेरे जैसे दफ्तरखोरों के लिए ये प्रश्न ऐसे ही होते होंगे
अनिश्चय में झूलते, पुराने जमाने के खयालों पर आधारित
फिर भी उम्मीद है कि एक शाम मुझे नसीब होगी
डूबती रोशनी, चहचहाते पक्षी, लौटते बच्चे और मुस्कुराते सूरज की।
मैं जानता हूं, मैं जानता हूं, मैं जानता हूं।

- अभिषेक

बेहतर क्या है?


बेहतर क्या है?
सुनहरे बालों वाली लड़की को घूरना
फिजिक्स की किताब में सर खपाना
बेहतर क्या है?
पिता के लिए बेटे का सिर खपाना
बेटे के लिए दिल लगाना
पड़ौसियों के लिए पहला बेहयाई
और दूसरे को नाटक बताना।
हर किसी के लिए बेहतर अलग अलग है
मां के लिए बेहतर है
अपने बेटे के लिए दुआ मांगना
उसे प्यार से खाना खिलाना
बाप की डांट,
पडौसियों की फटकार से बचाना
हर वक्त चिंता में घुले जाना
सबसे बेहतर क्या है?
मां से बेहतर इस सवाल का जवाब क्या है?

तुम सवाल बहुत करते हो?

यार तुम सवाल बहुत करते हो?
अपनी हर बात पर अकड़ते हो
उसने आंख फाड़कर देखा,
मुस्कुराया और बोला
तुम अंगूर की बेल की तरह लिपटते हो
जिधर मोड़ना चाहूं उधर ही निकल पड़ते हो
बहुत ही शालीनता से बात करते हो
और फिर भी पूछते हो
यार तुम सवाल बहुत करते हो?

- अभिषेक

नदियां


नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं
नुकीले पत्थरों का बोसा लेते हुए
उसे सहलाते,
उसकी कमतरी के अहसास को अपने में मिलाते हुए
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

भीषण गर्जना के साथ वह चूम लेती है
अपने हर बच्चे का मुख
उसे प्यार से भरने के लिए
और ले जाती है उसे
बुढ़ापे से बचपन की ओर
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

रंगहीन पानी में वह भरती है अपना रंग
ममत्व की पराकाष्ठा
और सख्त रौद्र रूप
फिर भी,
वह छोड़ती है
अपने पीछे अपने हर बच्चे को दुलारकर
हमेशा के लिए क्योंकि
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

मैदानों में कलकल करती,
पहाड़ों में संगीत सुनाती
और ले जाती है
साथ बहुत दूर तक
उन छोटे शिलाखंडों को, प्रस्तरों को
जिन्हें सीखना है अभी जीवन जीना
सभी के साथ समान व्यवहार करना
और हर मौसम में एक सा बने रहना
फिर भी नदी है
पानी कम है तो भी बहना है
पानी ज्यादा है तो भी बहना है
नदियां हैं, जिन्हें अपना रास्ता खुद बनाना है
बहते जाना है,
बहते जाना है।

- अभिषेक

देवदार


झुककर रोज
मैं अपने पांव देखता हूं
न पांव मिलते हैं,
न कहीं टोह मिलती है
हर रोज
मैं पहले से बड़ा हो जाता हूं
जैसे अभिमान के सामने लोग छोटे हो जाते हैं
कभी बर्फ से अपना तन ढकता हूं
कभी लताओं से श्रृंगार करता हूं
लेकिन फिर एक और दिन आता है
जब मैं स्वयं को टेढी सतह पर समतल पाता हूं
उस रोज मैं देखता हूं
लोग मुझसे प्रेम करने लगे हैं
उस रोज मैं देखता हूं
लोग मुझे दरख्त कहने लगे हैं।

- अभिषेक

इश्क का मिजाज अच्छा मगर...

इश्क का मिजाज अच्छा मगर
सबसे इश्क अच्छा नहीं
मुस्कुराते हुए चेहरे पर
ये गुबार अच्छा नहीं।

फूंक डालो ये गुस्सा
जिगर को फूंकने वालों
नाराजगी अच्छी है मगर
खुद पर सितम अच्छा नहीं।

तपिश आपकी बुझी नहीं
और मैं भी प्यासा हूं
पानी जरूरी है मगर
चुल्लू भर अच्छा नहीं।

फिर तेरी याद आई
और जगा दिया मुझको
तुम इतनी अच्छी हो मगर
कोई तुमसे अच्छा नहीं ।




- अभिषेक

बुधवार, 8 जून 2016

मैं गुमशुदाः कभी पूरी न होने वाली तलाश



पैट्रिक मोदियानो, पैट्रिक मोर्दियानो या फिर पाट्रिक मोडिआनो। साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले ये साहित्यकार अब तक इन तीन नामों से मुझ से मुखातिब हो चुके हैं। दुविधा है कि उन्हें किस नाम के साथ संबोधित करूं। मैं जानता हूं कि नाम बदलने से इनकी शख्सियत नहीं बदल जाएगी और न ही बदल जाएगा इनका उम्दा लेखन। बावजूद इसके संबोधन के लिए नाम की अहमियत आसानी से समझी जा सकती है। हिन्दी पाठकों के लिए हाल ही में उनकी एक किताब का अनुवाद आया है जिसमें उनका नाम पाट्रिक मोडिआनो लिखा है। मैं भी यही नाम चुन लेता हूं।


1978 में पाट्रिक मोडिआनो का छठा उपन्यास मिसिंग पर्सन आया। हिन्दी में इसका अनुवाद राजपाल एंड संन्ज ने मैं गुमशुदा के नाम से छापा है। किताब की खासियत ये है कि आपने इसके कुछ पन्ने पलट लिए तो फिर इस किताब को छोड़ देना आपके लिए असंभव होगा। पहले ही अध्याय में ये साफ हो जाता है कि आने वाले पन्ने एक व्यक्ति की तलाश हैं, लेकिन ये तलाश कब पूरी होगी और कैसे पूरी होगी ये कोई नहीं जानता। मोडिआनो के साहित्य की ये विशेषता है कि जैसे वे एक सवाल पाठक के सामने रखते हैं और उसी से कहते हैं कि वह इसका हल किताब में ढूंढना शुरू करे।


मैं गुमशुदा कहानी है एक डिटेक्टिव गी रोलां की। गी की जिंदगी के पिछले कुछ सालों को छोड़कर वह सब कुछ भूल चुका है। उसे याद नहीं है कि वो कौन है? कहां से आया है? ऐसी ही सवालों को खोजने की वो कोशिश करता है और फिर नई परतें खुलती हैं, लेकिन ये परतें गी की जिंदगी के रहस्यों को और उलझा देती हैं। किताब पढ़ते वक्त आपको कई बार लगता है कि आखिरी पृष्ठों को खोलकर देख लें कि आखिर गी की जिंदगी में हुआ क्या था। हालांकि धैर्यवान पाठक लगातार पृष्ठ दर पृष्ठ उलटते हैं और ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर गी रोलां का असली नाम क्या था? वह कहां से आया था? वो कौनसा हादसा था जिससे वो अपना अतीत भूल गया?

अतीत से हमेशा यादें ही जुड़ी होती हैं, लेकिन ये उपन्यास अतीत को अपनी यादों से बयां नहीं करता है। ये उपन्यास अतीत के प्रति आपके अंदर एक जिज्ञासा जगाता है उस आदमी के लिए जो अपना अतीत भूल चुका है। वह जानना चाहता है कि आखिर वह है कौन? ये सवाल हर कदम पर पूछा जाता है। पेरिस से शुरू होने वाली ये कहानी एक जलयात्रा पर खत्म होती है, लेकिन ये जलयात्रा भी सवालों का जवाब नहीं दे पाती है।


मोडिआनो ने उपन्यास को इस खूबी से रचा है कि ये आपको चौंकाता है, हर अध्याय में रहस्य को बनाए रखता है और तो और आखिरी पृष्ठ की आखिरी पंक्तियों तक आप खुद को बंधा हुआ महसूस करते हैं। आखिर में जब आप उपन्यास को पूरा पढ़ लेते हैं तो भी आपको अहसास होता है कि बहुत से प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं।

आखिरी के कुछ पृष्ठों में आपको नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास फेयरवेल टू आर्म्स  का सा भी अहसास होता है। हालांकि दोनों की कहानियों में जमीन आसमान का अंतर है। जहां फेयरवेल टू आर्म्स का अंत दुखद है वहीं मोडिआनो की ये किताब दो असमान ध्रुवों की ओर आपको खींचती है। जहां एक ओर खालीपन है तो कुछ सवालों के अनुत्तरित रह जाने का मलाल भी। जब कोई आपके जेहन पर हावी हो जाता है तो आप उसके लिए प्रार्थना करने लगते हैं। गी रोलां की बेबसी पर आप भावुक नहीं होते, न उसके प्रेम को महसूस करते हैं। बावजूद इसके एक सहानुभूति आपके भीतर जरूर घर लेती है।


दुनिया के नोबेल पुरस्कार विजेता क्या लिख रहे हैं, कैसे लिख रहे हैं, के लिए ये किताब पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। बस एक उम्दा किताब पढ़ना ही काफी है।


आखिर में उपन्यास की कुछ पंक्तियां जो गी की भावनाओं को बखूबी बयां करती हैंः-

‘अभी तक सब कुछ इतना गड्ड मड्ड है, ऐसा टुकड़े-टुकड़े में.......मेरी तलाश के दौरान, कुछ धज्जियां, कुछ कतरनें अचानक मेरे जेहन में आती रहती है.... लेकिन आखिरकार...शायद यही तो है जीवन।‘

- अभिषेक





मंगलवार, 7 जून 2016

हवाएं जब गर्म हों तो सुकून देंगे गालिब आैर आम


गर्म हवाओं के थपेड़े बढ़ते ही जा रहे हैं। लगता है जैसे मुहब्बत में हारा आशिक अपना गुस्सा लोगों पर निकालने का मनसूबा पूरा करने चला आया हो। एसी-कूलर में रहने वालों के लिए गर्मी में निकलना किसी सजा से कम नहीं है। फिर ऐसी सजा बहुत से लोगों को हर मोड़ पर मिल रही है। घर से निकले और लगा जैसे गर्म भट्टी में झोंक दिए जा रहे हों।


फिर भी जिंदगी जीनी है तो कोशिशें तो जारी रखनी ही होंगी। गर्मी का ये मौसम यूं तो आग लगाए है, लेकिन कुछ लोगों की दीवानगी इस मौसम को आम का मौसम भी कहती है। बात आम की चली है तो पहला नाम दुनिया के उस मुख्तलिफ शायर का है जिसने आम के लिए अपनी दीवानगी हिन्दुस्तान के शहंशाह के सामने भी कुछ यूं रखी कि शहंशाह आम को भी उनके घर आम की टोकरी पहुंचानी ही पड़ी।


अपनी नज्मों, गजलों और एक से बढ़कर एक शेरों के जरिए हिन्दुस्तान के अवाम को अपना दीवाना बनाने वाले ये शायर थे मिर्जा गालिब। गालिब का अंदाजे बयां जितना शेर कहने में जुदा था उतने ही वे मुख्तलिफ थे अपनी बात कहने में। जब एक शायर दूसरे शायर से बात करे तो शेर कहने का असर भी होता है और दाद भी खूब मिलती है। हिन्दुस्तान के आखिरी मुगल शहंशाह बहादुर शाह जफर को शायरों का शहंशाह कहा जाए तो इसमें कुछ गलत नहीं है। जनाब का अदब कुछ ऐसा था कि उनके जमाने में शायरों के लिए दिल्ली का दिल बहुत बड़ा था। कद्रदानों की कमी होती भी कैसे जब कद्रदानों में शहंशाह खुद दखल रखते हों।


तो लीजिए जनाब उस किस्से पर आते हैं जिसका जिक्र हमने कुछ पहले किया है। मिर्जा गालिब आम के इतने शौकीन थे कि लोगों से आम की फरमाइश करने से भी नहीं चूकते थे। एक बार जब वे दिल्ली के एक बागीचे हयात बख्श में शहंशाह बहादुरशाह जफर के साथ टहल रहे थे। अचानक गालिब एक जगह ठहर गए। बादशाह को बड़ा अजीब लगा। उन्होंने देखा कि गालिब एक आम के पेड़ के नीचे खड़े हैं और आमों को लगातार देखे जा रहे हैं।


बादशाह ने आश्चर्य से गालिब को देखा और पूछा कि इन आमों को आप ऐसे क्यों देख रहे हैं। गालिब को तो जैसे इसी सवाल का इंतजार था। उन्होंने कहा कि शहंशाह सुना है आम-आम पर लिखा होता है नाम खाने वाले का। मैं ढूंढ रहा हूं कि क्या किसी आम पर गालिब का भी नाम लिखा है। ये कहकर गालिब तो चुप हो गए लेकिन शहंशाह मुस्कुराए बिना न रह सके। अगले दिन शहंशाह ने उन्हीं आमों की टोकरी गालिब के घर पहुंचा दी।


एक बेहद खास आदमी का ये आम प्रेम कुछ अजीब सा लगता है, लेकिन उनकी आम के प्रति दीवानगी का ये पहला और आखिरी किस्सा नहीं था। उन्होंने 1857 की क्रांति के दौर में एक शिकायत भरा पत्र अपने एक अजीज को लिखा था, जिसमें उन्होंने लिखा कि इस क्रांति की बुरी बात ये है कि आम भी खाने को नसीब नहीं है। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई शायर होगा जिसने किसी फल का इस्तकबाल अपनी नज्म से बुलंद किया हो। ये करने वाले संभवतः गालिब इकलौते शायर हैं।


गालिब ने आम को जितनी तवज्जुह दी है वो हर किसी के बस की बात नहीं है। उन्होंने आम की तारीफ में एक गजल ही लिख डाली। आम की तारीफ का इससे बड़ी मिसाल कहीं आैर नहीं मिलती है अौर न ही मिलते हैं गालिब जैसे शायर। तो इन गर्म हवाआें में गालिब की नज्मों-गजलों, शेरों को गुनगुनाइए आैर आम का जमकर लुत्फ उठाइए।

अभिषेक