सोमवार, 30 जनवरी 2023

उदासी

मैं उस ऑफिस के आखिरी कोने पर बैठता हूं, इतने आखिर में की कभी कभी मेरी भी नजर खुद पर नहीं पड़ती. धूप मुझसे कुछ दूर होती है और मैं उसके बेहद पास, लेकिन जब नजदीकियां ज्‍यादा हो तो बहुत सी चीजें आपकी आंखों से दूर होती हैं. कई बार मैं खो जाता हूं, इतना जितना की कोई आदमी खो सकता है किसी मेले में, किसी शहर में और कभी कभी अपने आप में. कुछ वक्‍त बाद मुझे होश आता है कि हां, कुछ तो है. मेरे जैसा या कि मैं ही. मैं अपने खोने का गम नहीं मनाता और चुपचाप वही करने लगता हूं जो मैं सालों से कर रहा हूं, जो मैं सालों से नहीं करना चाहता. 

कभी कभी लोग मुझसे बात करते हैं और कभी कभी मैं भी. मेरे लिए यह काम सबसे दुश्‍कर होता है. मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं होता, शायद इसलिए क्‍योंकि मैं एक उदासी ओढ़े हूं और अपने ही खोल में रहना चाहता हूं. कभी कभी लगता है कि मैं अस्‍थायी हूं और यह उदासी ही स्‍थायी है. मैं और उदासी जब एकाकार हो जाते हैं, अपने होने का मुझे तभी अहसास होता है. मैं हूं, मैं हूं... यह घनीभूत होती उदासी का परिणाम लगता है. सबसे अच्‍छे काम...  चाहे फिर वो भावुकता में हुए या फिर असीम दुख में, उन सभी की शुरुआत इसी उदासी से हुई है. इसलिए जब भी उदासी हावी होने की कोशिश करती है तो लगता है मैं बेहतर इंसान बनने की ओर जा रहा हूं. कोशिश करता हूं कि यह उदासी कुछ दिन बनी रहे और उम्‍मीद करता हूं कि मेरे इंसान बनने की प्रक्रिया कुछ और तेज हो. 


शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

सांप्रदायिक उन्‍माद के इस दौर में नाउम्‍मीदी से मामूली उम्‍मीद होना बेहतर

सांप्रदायिक दंगों का देश में लंबा इतिहास है. लोग कहते हैं कि इतिहास से सीखना चाहिए, लेकिन सीखता भला कौन है? सांप्रदायिक दंगों में मरने वालों के पक्ष के लोग दर्द में डूब जाते हैं और मारने वाले 'सांस्‍कृतिक गौरव' के नए अध्‍याय में अपना नाम दर्ज करा देते हैं. उस पर कमाल देखिए कि कहते सभी यही हैं कि दंगे में आम आदमी मरता है, लेकिन कोई ये नहीं कहता कि दंगे में लड़ने वाला भी आम आदमी ही होता है. बस लड़ाने वाले ख़ास होते हैं और जिनका कहीं नाम नहीं होता. 

पिछले कुछ सालों में धार्मिक उन्‍माद लगातार बढ़ा है. नेताओं के भड़काऊ बयान और सोशल मीडिया पर हर तरफ फैली नफरत इस जहर को बहुत तेजी से फैला रहे हैं. लोगों को बांटकर अपना फायदा कमाना नेताओं को हमेशा से ही पसंद रहा है. बढ़ती धार्मिक कट्टरता के इस दौर में आम आदमी खुद के लिए प्राथमिकताएं तय नहीं कर पाया है. बहुत से लोगों पर धार्मिक कट्टरता का गहरा असर है और उनकी प्राथमिकताएं धर्म पर आकर टिक गई हैं. भूख, बेरोजगारी जैसी बुनियादी समस्‍याओं से पार पाने की जगह उन्‍हें लगने लगा है कि पहला निशाना उनका धर्म है और दूसरा वो खुद. यही कारण है कि धर्म को लेकर भावनाएं अपने उफान पर हैं. आम आदमी के लिए धर्म से बड़ी अफीम और नेताओं के जहरीले नारों से ज्‍यादा खतरनाक कुछ नहीं है, लेकिन इन्‍हीं को लोग अपना पथ प्रदर्शक मान रहे हैं. 

मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं जो स्‍वयं को बेहतर तहजीब और संस्‍कारों वाला बताते हैं. उनके लिए बहुत सी ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में उनसे बात करना लगता है जैसे सूरज को दीया दिखाना है. कई बार ऐसे लोग भी धार्मिक उन्‍माद और कट्टरता से लबरेज नजर आते हैं. इसके साथ ही वो भ्रम भी हवा हो जाता है, जिसमें पढ़ा-लिखा होना आपकी सोच को बेहतर बनाता है. बड़ी बड़ी डिग्रियां सांप्रदायिक उन्‍माद के आगे घुटने टेक देती हैं. इसलिए जब आप अपने बच्‍चों को उच्‍च शिक्षा के संस्‍थानों में पढ़ने भेजें तो उन्‍हें कोर्स की किताबों, वॉटसएप और फेसबुक जैसे प्‍लेटफॉर्म्‍स के बजाय अन्‍य किताबें पढ़ना भी जरूर सिखाएं. 

धर्म आक्रामक नारों और दूसरे धर्म की निंदा का नाम बनकर रह गया है. इसीलिए ज्‍यादा धार्मिक आदमी से बचने की सलाह दी जाती है. धार्मिक भावनाएं कब कुलाचें मारती हुई शरीर से बाहर आ जाए और कब किसी दूसरे धर्म के शख्‍स को अपना शिकार बना ले कहा नहीं जा सकता है. धर्म का यह नशा जीवन के रंगों को बदरंग कर रहा है. इसमें सिर्फ आप या मैं शामिल नहीं हूं. हम सभी इसके लिए दोषी हैं. दुनिया को सिर्फ एक धर्म बेहतर नहीं बना सकता है. इसके लिए सभी धर्मों के बने रहने और कट्टरता को छोड़कर साथ आने की जरूरत है. हालांकि वाट्सएप जैसे विश्‍वविद्यालयों से अपनी सोच विकसित करने वालों से उम्‍मीद कम है. फिर भी नाउम्‍मीदी से कुछ उम्‍मीद होना बेहतर है. 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

जोरबा द ग्रीक: यहां से जाता है सुकून का मार्ग

जीवन भर हम सुकून तलाशते हैं. कहीं थोड़ा सा सुकून मिले. मंदिर-मस्जिदों से लेकर पहाड़, नदियां, झरने तक हम घूम आते हैं. फिर भी सुकून पाने की चाह खत्‍म नहीं होती. सुकून इतना सस्‍ता नहीं है. हम इसके लिए जितना प्रयास करते हैं वो उतना ही कम होता जाता है. हमारी चेष्‍टा, चिंता बन जाती है. निकोस कजानजाकिस की किताब जोरबा द ग्रीक उस सुकून को पाने का मार्ग बताती है, जैसे जोरबा ने वो सुकून अपने लिए तलाश लिया था. 

किताबों में डूब रहने वाले एक लेखक और उसके साथ काम करने वाले अनपढ़ शख्‍स जोरबा की यह कहानी आपको दलदल भरी जमीन से निकालकर समतल जमीन पर ला देती है, जहां हम देर तक कुछ सोच ही नहीं पाते हैं. 

यह ओशो की सबसे पसंदीदा किताबों में से भी एक है, जिसमें ओशो ने बहुत सी चीजों को अपना लिया है और हम भूल गए हैं कि यह ओशो की नहीं बल्कि निकोस कजानजाकिस की देन है. ख़ासतौर पर काम को ही ध्‍यान बना लेने की थ्‍योरी जिस पर ओशो लंबे लंबे व्‍याख्‍यान दे चुके हैं, ऐसा लगता है कि वह यहीं से ली गई है. ओशो के जन्‍म से पहले ही निकोस कजानजाकिस इसे जी चुके थे. 

अमूमन ये माना जाता है कि बूढ़े होते लोगों में सबसे पहले उत्‍साह मरता है, लेकिन जोरबा द ग्रीक में बूढ़ा शख्‍स उत्‍साह से भरा है और युवा किताबी कीड़ा है. दोनों दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े नजर आते हैं, जिनका मिलना असंभव सा लगता है. हालांकि दोनों के बीच एक दूसरे के प्रति सम्‍मान बना रहता है. विपरीत होने का ये आकर्षण ही शायद दोनों को पास लाता है. 

आध्‍यात्मिक होना पाप-पुण्‍य और अच्‍छाई-बुराई के बीच नहीं है. यह उनके पार है. चैतन्‍य हो जाने वालों के पास ऐसे सवालों को खोजने का समय नहीं है. यह सारे सवाल ह्रदय की दुर्बलता का संकेत समझे जाते हैं. यही कारण है कि योगियों ने मन की स्थिरता पर जोर दिया है. यह उपन्‍यास भी मन की स्थिरता को पाने की यात्रा है. 

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

गाय काटने पर इस मुगल बादशाह ने लगाई थी रोक, आदमियों की नहीं गायों की हुई थी गिनती


गाय को लेकर भारत में बवाल छिड़ा है। गाय लाने ले जाने वालों को हर वक्त ये डर सताता रहता है कि कब, कौन आकर पिटाई कर दे कहा नहीं जा सकता है। ऐसे में एक किस्सा 1857 का याद आता है। जी हां, ये वो वक्त था जब गाय को लेकर समाज आज ही की तरह काफी संवेदनशील था।

1857 में जब क्रांति शुरू हुई तो मेरठ और अन्य इलाकों से बहुत से सैनिक अंग्रेजों को मारते-काटते दिल्ली आ पहुंचे। जहां पर उन्होंने अंग्रेजों को मार भगाया। अंग्रेज भाग गए तो सैनिकों को थोड़ी फुर्सत मिली। उसी दौरान एक खबर ने हर किसी को चौंका दिया वो खबर थी कि टोंक से आए गाजी इस बात पर अड़ गए कि बकरीद के दिन जामा मस्जिद के सामने खुले में गाय काटेंगे। यदि कोई विरोध करेगा तो उसे भी मार देंगे। इसके साथ ही एक दूसरी खबर थी जिसमें हिन्दू सैनिकों ने पांच कसाइयों की हत्या की। हिन्दू सैनिकों ने उन पांच कसाइयों को गाय काटने के आरोप में मार गिराया था। ये खबर सुनकर के मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर बहुत दुखी हुए। बहादुरशाह की मां खुद एक हिन्दू थी। ऐसे में गाय के प्रति जफर का प्रेम समझा जा सकता है।

1857 का ये वो दौर था जब अंग्रेजों को दिल्ली से बाहर निकल दिया गया था। ऐसे में जफर की सबसे बडी चिंता ये थी कि अंग्रेजों को दिल्ली से भगाने के बाद गाय को लेकर हिन्दू और मुसलमानों में किसी तरह का विवाद परेशानी का सबब बन सकता है। ऐसे में उन्होंनें गाय को मारने और गाय का गोश्त खाने पर पाबंदी लगा दी थी। उस वक्त आदेश था कि यदि कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उसे सख्त सजा दी जाएगी और तोप से उड़ा दिया जाएगा। उस वक्त सिपाहियों ने काफी सख्ती दिखाई और ऐसा करने वाले कई लोगों को गिरफ्तार भी किया।

गाय को जिबह यानी काटने का अंदेशा देखकर उन्होंने गायों की संख्या गिनने का भी आदेश दिया था। अपने आदेश में उन्होंने दिल्ली के हर मुस्लिम परिवार में कितनी गाय है कि गणना कर छह घंटे में दरबार में रिपोर्ट देने के लिए कहा था। साथ ही कोतवाल को आदेश दिया गया था कि वो ऊंची आवाज में दिल्ली में ये घोषणा कर दे कि यहां पर गाय मारने पर पाबंदी है और जिसने इस आदेश पर अमल नहीं किया उसे सख्त से सख्त सजा दी जाएगी। विलियम डेलरिंपल की किताब आखिरी मुगल में इस बारे में बताया गया है। साथ ही कुछ अन्य किताबें भी 1857 की क्रांति के बारे में बात करती है तो जफर के इस फैसले के बारे में बताती हैं।

जफर का ये आदेश दिल्ली को अमन-चैन की ओर ले गया। उस साल बकरीद भी शांति से निकल गई और किसी तरह का फसाद नहीं हुआ। एक आम हिन्दुस्तानी इससे काफी खुश था लेकिन अंग्रेजों को इससे निराशा हुई। वे हिन्दू मुसलमानों के बीच खाई बढ़ता देखना चाहते थे लेकिन जफर के एक फैसले ने इसे रोक दिया। हालांकि बाद में अंग्रेजों ने इस क्रांति को दबाने के लिए एक बार हमला किया और फिर दिल्ली बहादुरशाह जफर की पकड़ से दूर हो गया। 

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

नोटबंदीः जीरो लाइन पर खड़े हैं तो आपके लिए पानी ही पानी है, जहां आपको डूब मरना है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को अचानक 500 और 1000 रुपए के नोटों को चलता कर दिया। इधर मोदी का ऐलान हुआ और उधर देश भर में लोगों की कतारें लगनी शुरू हो गईं। ये कतारें सिर्फ एटीएम, बैंक या फिर पेट्रोल पंपों पर नहीं हैं। असल में जो लाइनें इन स्थानों पर लगी हैं, उनसे अलग तीन अदृश्य लाइनें हमेशा से मौजूद रही हैं। 

नोटबंदी के फैसले के बाद बहुत से लोग पीएम मोदी के निर्णय की प्रशंसा कर रहे हैं तो बहुत से लोग विरोध में हैं। अब जो थोड़े से लोग बच गए हैं वे न उधर हैं न इधर हैं। पहली दो लाइनों के लोगों की खूब सुनी जा रही है, लेकिन इस तीसरी दुनिया की न किसी को खबर है और न ही कोई इसकी परवाह कर रहा है। 

प्रशंसा और विरोध के बीच जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो ये है कि ज्यादातर लोग तर्क के बजाय सिर्फ अपनी बात मनवाना चाहते हैं। जो थोड़े से लोग तर्क कर रहे हैं, उनके पास अपने समर्थन में कई तर्क हैं लेकिन विरोधी के तर्कों को वो सुनना ही नहीं चाहते हैं। टीवी की बहसें राजनीतिक दलों की नूरा कुश्ती बन चुकी हैं जहां पक्ष को निर्णय की प्रशंसा करना जरूरी है तो विपक्ष को आलोचना का सहारा। 

अगर हम इन सारी बातों को किनारे रख भी दें तो जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो है इस देश का खेमों में बंट जाना। ऐसा लगता है जैसे विरोध और प्रशंसा दो ध्रुवों में बंट गए हों। एक उत्तरी ध्रुव है और दूसरा दक्षिणी ध्रुव है। आप यदि देखें तो पाएंगे कि इन ध्रुवों के बीच में जिंदा रहने के लिए कोई जगह नहीं है। आप लकीर के एक तरफ हैं या लकीर के दूसरी तरफ। यदि आप सोच रहे हैं कि मैं लकीर पर खड़ा होकर दोनों पक्षों को परखना चाहता हूं तो आप चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाएंगे। एक पक्ष के आपको अपनी ओर लाने की कोशिश में ऐसे ऐसे तर्क देंगे कि आप चकरा जांएंगे तो दूसरा भी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। 

रही बात उन लोगों की जो दोनों से जान छुड़ाकर अब भी जीरो लाइन पर खड़े हैं उन्हें पता नहीं कि उनका शिकार कौन करेगा। ऐसा लगता है कि आप की यदि कोई निश्चित विचारधारा नहीं है तो आप का कोई वजूद ही नहीं है। यदि आपने एक निर्णय की प्रशंसा की और दूसरे की आलोचना तो यकीन मानिए आप के हाथ से दोनों ध्रुव फिसल गए हैं। अब आपके लिए कोई जमीन नहीं बस पानी ही पानी है। जहां पर आपको जाकर डूब मरना है। 

- अभिषेक


शनिवार, 24 सितंबर 2016

कितना संवेदनहीन है आज का इंसान

सर्दियों के उन दिनों में जब आॅफिस का काम बोझ लगने लगता है तो लोग अक्सर चाय की चुस्कियों के लिए बाहर की थड़ियों पर अडडा जमा लेते हैं। ऐसे ही एक दिन चाय की चुस्कियों के साथ तीन बच्चियां उस पत्रकार के सामने आ खड़ी हुई। पत्रकार ने कुछ बिस्किट लिए और उन्हें थमा दिए। ये कहानी एक दिन शुरू हुई और उसके बाद ये किस्सा रोजाना का हिस्सा बन गया। तय समय पर वो तीनों आ जातीं और रोजाना बिस्किट का पैकेट लेकर चली जातीं। 

एक दिन अखबार पढ़ते-पढ़ते एक खबर पर नजर गई। खबर का मजमून कुछ यूं था कि एक आदमी ने कुछ बच्चियों की मदद की। खबर को आम आदमी ने हाथों हाथ लिया और उस आदमी की खूब वाहवाही हुई। खबर को लोगों ने पढा और भुला दिया। सिवाय उस पत्रकार के। अगले दिन उसने उन बच्चियों से उनके घरवालों के बारे में पूछा। माता-पिता, रोजी-रोटी जैसे कर्इ सवाल किए। तीनों को अपने घरवालों के बारे में पता नहीं था। पत्रकार ने उनकी मदद करने की ठानी। वह उन्हें अपने घर ले गया। पत्रकार की बीवी ने उन्हें नहलाया, अच्छे कपड़े पहनाए और अच्छा खाना खिलाया। काली फ्राॅक पर नीले-पीले सितारों का जमघट उन बच्चियों को खूब पसंद आया। बाद में जहां से वो पत्रकार उन्हें लेकर गया था उसी जगह पर छोड़ भी गया। 

पेट भरा था तो वो दिन किसी तरह से निकल गया। धीरे-धीरे दूसरा दिन गुजरा, तीसरा दिन भी। उन बच्चियों को कुछ नहीं मिला। अच्छे कपड़े देखकर लोगों ने भीख देना भी बंद कर दिया। कहते इतने अच्छे कपड़े और भिखारी हो ही नहीं सकती। कोई कहता किसी गिरोह से जुड़ी हैं। जितने मुंह खुलते गए उन बच्चियों के लिए उतनी ही बातें फैलती गई। पहले तो कोई दया से कुछ दे जाता था अब लोगों को नए कपड़ों से नफरत होने लगी। कपड़े भी ऐसे कि घिसने का नाम ही नहीं लेते थे। इसी बीच पत्रकार घूमने दूसरे शहर चला गया। बिस्किट का वो पैकेट भी अब बंद हो गया। 

फिर एक दिन अखबार में एक कोने में एक छोटी सी खबर छपी। तीन बहनों ने भूख के कारण दम तोड़ा। छोटी खबर पर बड़ी संपादकीय भी छपी। एक दिन टीवी का आधा घंटा ‘आखिर इस मौत के लिए जिम्मेदार कौन?‘ शीर्षक से आबाद रहा। फिर शांति, शांति, शांति.....। 

कहानी के आखिरी मोड पर पत्रकार भी लौट आया। उसे उन बच्चियों की मौत के बारे में पता चला। पुराने अडडे पर गमगीन पत्रकार ने दुख जताने के लिए सिगरेट सुलगाई। चाय का गिलास थामा। ठोडी को दूसरे हाथ की कलाई से थामा और सोचा कितना संवेदनहीन है आज का इंसान। वो वापस आॅफिस लौट आया। आज किसी दूसरे काम में मन नहीं लग रहा था तो सोचा अपना ब्लाॅग ही लिख लूं। कई दिनों से लिखा नहीं था। अब पत्रकार अपना ब्लाॅग लिख रहा है, ‘अब पछताते होत क्या जब...।' ब्लाॅग लिखकर उन्होंने पोस्ट किया और देखा अरे वाह एक घंटे में 500 लोगों ने पढ़ा है। क्या बात है? आज का दिन बन गया। 

- अभिषेक

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

शिकायत मत कीजिए, टिश्यू पेपर से असहिष्णुता पोंछ लीजिए

मैं बहुत ज्यादा सहिष्णु आदमी हूं। ये पंक्ति पढ़कर आपको जरूर लगा होगा कि मैं अपने मुंह मियां मिठठू बन रहा हूं, लेकिन सच बात कहने का मुझे अधिकार जरूर है। एक कदम और आगे बढाऊं तो मुझे लगता है कि देश के ज्यादातर लोग बेहद सहिष्णु हैं। आपको लगता होगा कि ऐसे दौर में जब लोग एक दूसरे को गरियाने का मौका नहीं छोड़ रहे हैं। मैं उलटी गंगा पहाड़ पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा हूं। फिर भी आप जितना मुंह बनाएं ये सही है कि आम आदमी इतना सहिष्णु है कि अपने अधिकारों को लेकर भी सहिष्णु रवैया अपना लेता है और मुंह की खाता है। आप ऐसे नहीं मानेंगे जानता था तो सुनिए एक वाकया सुना देता हूं। 

पिछले दिनों एक ढाबे पर खाना खाते वक्त आसपास लोगों का जमघट लगा था। बस उसी को देखकर यकीन हो गया कि हम कितने सहिष्णु हैं। दरअसल, आसपास के लोग खाने के लिए प्लेट का इंतजार कर रहे थे। इतने में एक आदमी तेजी से लोगों के सामने प्लेट रखकर चला जाता है। अचानक हलचल होती है, एक दूसरे की टेबल पर देखा जाता है। अपनी टेबल से उचक-उचककर लोग दूसरे की टेबल पर टिश्यू पेपर ढूंढते नजर आते हैं। मैं हैरानी से उन्हें देखता हूं आखिर ये हो क्या रहा है? 

थोड़ी ही देर में मेरी टेबल पर भी थाली आ जाती है। थाली देखकर मैं कहता हूं, अरे ये थाली कितनी चिकनी है। लगता है जैसे ढंग से साफ नहीं किया गया है। तभी मेरे सामने बैठा व्यक्ति कहता है हां ये टिश्यू ले लो। मैं देखता हूं कि वह भी अपनी उस चिकनाई लिए हुए थाली को टिश्यू से पोंछ रहा है। मैंने पूछा आपने इसके लिए कहा नहीं। उसने कहा, नहीं हो जाता है। इतना घी डालता है तो कहां से उतरेगी इतनी चिकनाई। मैं भी अपनी थाली टिश्यू से पोंछते हुए सोचता हूं इससे ज्यादा सहिष्णुता कहां दिखाई देगी। 

मैं करीब आधे घंटे तक वहां पर बैठा रहा। जो भी आया उसने थाली आने के बाद टिश्यू मांगा। अब आप समझ ही गए होंगे कि वहां पर बैठे हर आदमी के लिए टिश्यू की क्या अहमियत रही होगी? वहां आने वाला हर आदमी खुद पर सहिष्णुता की चाशनी जाने कहां से उडेलकर आया होगा। हम परंपरागत रूप से इसी तरह के सहिष्णु हैं। 

इस सहिष्णुता की कहानी को देख-सुनकर अमिताभ बच्चन की एक फिल्म का डायलाॅग याद आ गया जब अमिताभ अपनी गरजती आवाज में कहते हैं, 'हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहां से शुरू हो जाती है।' टिश्यू पेपर का वाकया देखकर लगता है कि एक आदमी ने टिश्यू मांगा और पूरा जमाना सहिष्णु हो गया। तो जनाब अब रोजाना असहिष्णुता को लेकर तंग करना बंद कीजिए और थोड़े सहिष्णु हो जाइए। हां, इस बार शिकायत की जगह टिश्यू मांगिएगा। आपके सबसे ज्यादा सहिष्णु होने का यही प्रमाण होगा। शायद इससे आपकी सारी असहिष्णुता पोंछ दी जाए।

- अभिषेक

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

स्वतंत्रता दिवस पर PM-CM का भाषण नहीं ज्ञानी की खीर याद रही

मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। 


लीजिए 70 वां स्वतंत्रता दिवस भी बीत गया। हर बार की तरह। सच कहूं तो मुझे पिछले कई सालों से स्वतंत्रता दिवस को लेकर ज्यादा कुछ भी याद नहीं है। हमेशा लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण, शहीदों को श्रद्धांजलि, तिरंगे को सलामी जैसे दृश्य हमेशा नजर आते हैं। हर बार कई खबरें बनती हैं, लगती हैं। ये नजारे हर बार आम होते हैं। शायद यही कारण है कि हमें याद ही नहीं रहते। आम आदमी के लिए 15 अगस्त का दिन छुटटी का होता है। जैसे हमें अपने स्वतंत्रता दिवस से कोई मतलब ही नहीं है। करीब 70 सालों से जो होता आया है वो इस बार भी होगा, तो भला कौन भाव देगा लेकिन कुछ लोगों के लिए ये दिन होली-दिवाली, ईद-क्रिसमस से बढकर होता है। 

कई सालों से 15 अगस्त और 26 जनवरी की सुबह आॅफिस में ही बीतती रही है। स्वतंत्रता दिवस पर भी मैं इस बार आॅफिस में ही था। आॅफिस में ही स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम देखा। प्रधानमंत्री ने क्या कहा, आतंकवादियों ने गोलियां बरसाईं, महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र को कोसा जैसी खबरों में कब दोपहर का एक बज गया हमें पता ही नहीं चला। हम दो लोग आॅफिस से चाय पीने के लिए बाहर निकले। चाय की थड़ी पर कुछ देर तक यूं ही इधर-उधर की बातें की। जब वापस आॅफिस जा रहे थे तो एक ढाबे से अचानक आवाज आई भाईसाहब, खीर पी जाओ। जयपुर में पीटीआई की नई बन रही इमारत से सटकर एक व्यक्ति ढाबा चलाता है। ये उसी की आवाज थी। उसका नाम है ज्ञानी (सभी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं।) उन्होंने आग्रह किया तो चले गए। 

हमने पूछा काहे की खीर है। उसने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा बस ऐसे ही, स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है। अनायास ही मुंह से निकल गया ‘स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है‘। आज तक कई तरह के प्रसाद सुने थे लेकिन स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद पहली बार सुना। वो भी एक ऐसे शख्स से जो किसी दूसरे राज्य से रोजी-रोटी की तलाश में जयपुर आया है। वो स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा है। फिर भी हमने कहा,  ‘अरे यार, हमें तो जाकर खाना भी खाना है।‘
उसने जोर देते हुए कहा- अरे, थोड़ी सी पी जाओ। 

हमने उसका निमंत्रण स्वीकार करते हुए मजाक-मजाक में पूछा, झंडा नहीं फहराया। उसके साथ मौजूद लोगों  ने जवाब दिया। क्यों नहीं फहराया वो देखिए। एक छोटा सा था झंडा इमारत पर जहां पीटीआई लिखा है वहां था और दूसरा मुख्यद्वार पर लगाया गया था। थोड़ी देर तक यूं ही बातें की और फिर हम लौट आए। 

मैं रास्ते भर ज्ञानी के बारे में सोचता रहा। घर पहुंचा तो भी मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। जब सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ज्यादातर अपने घरों पर 15 अगस्त की छुटटी मना रहे थे एक शख्स देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा था। ज्ञानी को सलाम, वो ऐसा ज्ञान भारत के दूसरे अज्ञानियों को भी दे। 

- अभिषेक 

शनिवार, 13 अगस्त 2016

कश्मीरः एेसे हों नुमाइंदे जो सत्ता आने पर भी कश्मीर को याद रखें

जम्मू कश्मीर में पिछले कुछ महीनों से कुछ भी ठीक नहीं है। न आतंकवादी की मौत से उपजने वाला विरोध ठीक है, न सुरक्षाबलों की गोलियों से मरने वाले और न घायलों को देखकर कुछ ठीक कहा जा सकता है। घाटी में करीब एक महीने से कर्फ्यू लगा है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा उन लोगों को उठाना पड़ता है जो रोजाना कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं। कर्फ्यू का दंश ऐसे ही लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। जो लोग रोजाना कुछ रुपए का तेल, मिर्च और दूसरे मसाले खरीदकर रोजी-रोटी का किसी तरह से जुगाड़ करते हैं उनकी हालत का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। आप खुद को वहां रखकर देखेंगे तो समझ जाएंगे कि दिन किस तरह से चिंता में गुजरता होगा और रात में हर करवट अगले दिन कर्फ्यू खुलने की दुआ मांग रही होगी। (हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि आवश्यक खाद्य पदार्थ की आपूर्ति की गर्इ है।)

कश्मीर में ये हालात कई बार ऐसा रूप ले चुके हैं। लोगों के पथराव, विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षाबलों के प्रति नफरत और भारत को दूसरा देश समझने और समझाने की कोशिशों तब भी होती थी, अब भी होती है। हमने हमेशा कश्मीर की खूबसूरती देखी लेकिन वहां के लोगों का मन पढ़ने की कोई कोशिश नहीं की। कश्मीर का जब भी जिक्र आता है हम ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, बर्फ से ढकी वादियों और खूबसूरत नजारों को ही देखते हैं। या ज्यादा हुआ तो विरोध प्रदर्शनों, मरते आतंकवादियों और सीमापार से होती गोलीबारी की घटनाओं में ही हमें जम्मू कश्मीर याद रहता है। हालांकि जम्मू कश्मीर के आम आदमी को हम भुला देते हैं। 

आज कश्मीर के जो हालात हैं वो कश्मीर कई बार झेल चुका है। 1947 से पहले और बाद में ऐसे हालात कई बार बने, सुधरे हैं। ये विद्रोह आज नहीं भड़का है। 1947 से पहले जब कश्मीर पर डोगरा राजवंश का कब्जा था तब भी कई बार विरोध प्रदर्शनों के दौर होते रहते थे। मुस्लिम बहुत जनसंख्या और हिन्दू शासक के कारण आम आदमी को ये लगता था कि उनका भला नहीं हो सकता है। एक हद तक ये बात सही भी थी। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद सरकारी नौकरियों में हिन्दुआें और सिक्खों का बोलबाला था। 

1947 में जब राजे-रजवाड़े भारत और पाकिस्तान में मिल रहे थे उस वक्त जम्मू कश्मीर के राजा हरिसिंह ने कश्मीर को भारत आैर पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की काफी कोशिश की। इसका कारण ये माना जाता है कि उन्हें अंदेशा था कि शेख अब्दुल्ला, नेहरू के करीबी हैं इसलिए यदि भारत में वे अपने राज्य का विलय करते हैं तो वहां पर शेख अब्दुल्ला सर्वेसर्वा होंगे और उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी। वहीं पाकिस्तान के साथ मिलना उन्हें इसलिए मुनासिब नहीं लगा होगा क्योंकि पाकिस्तान कभी भी मुस्लिम बहुल जनता पर एक हिन्दू शासक को कतई स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि उनका स्वतंत्र राष्ट्र बनने की कोशिशों ने जम्मू कश्मीर की जनता के लिए कई तरह की मुसीबतें खड़ी कर दीं। 

आजादी से पहले ही सवा छह फुट से ज्यादा लंबे शेख अब्दुल्ला इकलौते ऐसे नेता थे जिनकी बात को कश्मीर की जनता ने अपनी आवाज माना। सरकारी नौकरियों में हो रहे भेदभाव के भुगतभोगी शेख अब्दुल्ला डोगरा राजवंश के खिलाफ थे। राजवंश के खिलाफ हो रहे कई आंदोलन की अगुवाई शेख अब्दुल्ला ने की। यहां तक की 1946 में जब उन्होंने डोगरा राजवंश से कश्मीर छोड़ने की मांग की तो उन्हें राजद्रोह के आरोप में तीन साल की सजा सुनाई गई और जेल में डाल दिया गया। तकरीबन उसी वक्त जब ये साफ होने लगा था कि देा देश बनने जा रहे हैं उस वक्त हरिसिंह ने अपनी मंशा को स्पष्ट रूप से सबके सामने रख दिया। हरिसिंह ने कहा कि वे बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेंगे और खुद अपना फैसला लेंगे। 

हरिसिंह के लिए उस वक्त जो उहापोह की स्थिति थी वो आज कश्मीर के लोगाें में नजर आती है आैर इसका सबसे बड़ा कारण है अविश्वास की खार्इ जो गहरी आैर गहरी होती जा रही है। आप आैर हम आसानी से ये समझ सकते हैं कि घायल होने वाला शख्स खुद के लिए कितने लोगाें की सहानुभूति हासिल करता होगा आैर नर्इ दिल्ली के लिए कितनी नफरत पैदा कर रहा होगा। कश्मीर घाटी में पिछले एक महीने का वक्त इस नफरत को बढ़ाने वाला ही साबित हुआ है। इसके लिए अकेले पाकिस्तान को दोषी ठहराना ठीक नहीं है। लोगाें के घटते विश्वास के लिए एक हद तक वहां के नेता भी जिम्मेदार हैं, जो विपक्ष में होने पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं आैर सत्ता में आने पर सबकुछ भूल जाते हैं। खास बात ये है कि जनता के नुमाइंदे जनता से मिलने से भी डर रहे हैं। कश्मीर को एेसे नेताआें की जरूरत नहीं है जो विपक्ष तक ही उनके साथ रहें, बल्कि कश्मीर को एेसे नुमाइंदाें की जरूरत है जो सत्ता में आने पर भी उन्हें भुला न दें। 

- अभिषेक

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

गोरक्षकों, किसी को पीटकर आप ज्यादा धार्मिक नहीं हाे जाएंगे


जयपुर की हिंगोनिया गौशाला में 500 से ज्यादा गायों ने दम तोड़ दिया है। इस खबर ने गायों को लेकर देश में एक नई बहस छेड़ दी है। गायों की तस्करी को लेकर हल्ला मचाने वाले लोग चुप हैं। ये चुप्पी इतनी घनी है कि कहीं कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नजर नहीं आया आैर न ही नजर आए वे गोभक्त जो अपनी दुकानदारी गाय की भरोसे चला रहे हैं। 

गायों की रक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों की पिटाई करने वाले गोरक्षक दल भी इस मामले में अभी तक कोई विरोध नहीं जता रहे हैं। पिछले दो सालों में गो रक्षक दलों की जैसे बाढ आ गई है। छोटे-छोटे गांवों और कस्बों में गोरक्षक दलों के लोग आपको मिल जाएंगे। गायों की रक्षा के लिए ऐसे लोग कितने सतर्क हैं, इसकी बानगी हिंगोनिया गोशाला में 500 से ज्यादा गायों की मौत के मामले से पता लगती है। जहां गायें भूख और दलदल में फंसकर चारे-पानी के अभाव में दम तोड़ देती हैं और कोई गोरक्षक उन्हें बचाने नहीं आता। 

इस मामले में मैंने एक गोरक्षक से जानना चाहा तो करीब आधे घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी। मैंने पूछा कि हमने सुना है कि गोरक्षक गायों की तस्करी रोकते हैं, गायों की रक्षा के लिए और ऐसे कौनसे काम हैं जिन्हें गौरक्षक करते हैं। इस सवाल के जवाब में उन्होंने सिर्फ एक काम और बताया। उन्होंने कहा कि उनका काम गायों की तस्करी को रोकना और घायल गायों को चिकित्सा मुहैया कराना है। मैंने हिंगोनिया गौशाला को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा था लेकिन उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी प्रतिक्रिया देने में देर नहीं की। इसका कारण मेरा मीडिया में होना और एक दिन पहले ही अन्य मीडिया संस्थान से उनके पास आए फोन काॅल के बाद शायद वे ये उम्मीद कर रहे थे कि मैं भी उनसे ऐसा ही कोई सवाल पूछने जा रहा हूं। 

मेरे द्वारा सवाल पूछने से पहले ही उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी सफाई देनी शुरू कर दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हिंगोनिया में गायों की मौत के मामले में गोरक्षक जिम्मेदार नहीं हैं, ये नगरनिगम की जिम्मेदारी है। नगरनिगम के भ्रष्ट अफसर गायों की सुध नहीं ले रहे हैं। उन्होंने गायों की तुलना मांओं और बहनों से की। उन्होंने बताया कि कैसे उन पर तीन बार गोलियां चलाई गई। कैसे उन पर ट्रक चढ़ाने का प्रयास हुआ। कैसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से गाय की हत्या करने वाले एक व्यक्ति को पकड़वाया और कैसे अब वह व्यक्ति सजा का इंतजार कर रहा है?

उनकी मीडिया के प्रति नाराजगी भी साफ नजर आई। उन्होंने कहा कि बुरा मत मानिएगा मीडिया लगातार कह रहा है कि हिंगोनिया में गाएं मर गई गोरक्षक दल क्या कर रहा है। ये जिम्मेदारी हमारी नहीं है। बात शुरू हुई तो नगरनिगम से थी लेकिन राज्य और केन्द्र सरकार से होती पिछली कांग्रेस और फिर प्रधानमंत्री के स्तर तक भी जा पहुंची। उन्होंने राज्य और केन्द्र सरकार की भी जमकर खबर ली और कहा कि गायों की रक्षा के लिए उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा सरकार आएगी तो कुछ अच्छा होगा, लेकिन हुआ उसका उलटा गायों के मांस का एक्सपोर्ट बढ़ गया। वहीं कांग्रेस के वक्त गाय के मांस का निर्यात कम था हालांकि उन्होंने कांग्रेस को एक विशेष धर्म की सरकार बताया और कहा कि वो आएंगे तो गाय के मांस के निर्यात में कमी आ जाएगी ऐसा सोचना ही गलत है। साथ ही पीएम की तारीफ में उन्होंने कई कसीदे पढ़े और उनसे सहानुभूति जताते हुए कहा कि एक अकेला आदमी सबकुछ कैसे कर सकता है? (ये बातचीत प्रधानमंत्री के गोरक्षा पर आए बयान से पहले की है। ) हालांकि इसके दो-तीन दिन बाद ही पीएम का गोरक्षा पर बयान आता है। इसके अगले दिन वो एक खबर के लिए मुझे फोन करते हैं और कहते हैं कि पीएम के विरोध में नारेबाजी होगी, पीएम मोदी हाय-हाय के नारे लगेंगे, किसी को भेज दीजिए। 

गायों के नाम पर हमारे देश में गोरक्षा के नारे हैं, तस्करी रोकने की बाते हैं, छोटे-मोटे प्रदर्शन हैं लेकिन नहीं है तो कोई गायों की सुध लेने वाला नहीं है। जिस राजस्थान की हिंगोनिया गौशाला में पिछले ढाई सालों में 27000 गायें दम तोड़ देती हैं, उनके लिए आवाज उठाने के लिए कोई आगे नहीं आता है। हालांकि प्रदेश से देश तक ये बात मीडिया के जरिए पहुंचती है तो जरूर थोड़ी हलचल होती है, लेकिन छुटभैया नेताओं के प्रदर्शन से कुछ बदलने वाला नहीं है।

मेरी गोरक्षकों से गुजारिश है कि गो तस्करों को पकड़कर पीटने की अपेक्षा अगर वे गायों के लिए कुछ करना ही चाहते हैं तो अपने घरों में गायों को पालें। यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो कम से कम गायों के लिए कुछ चारे पानी की ही व्यवस्था कर दें। किसी को मार पीटकर ही गायों की सेवा की जा सकती है ऐसा नहीं है। गायों के लिए चारे-पानी और इलाज की व्यवस्था कर देंगे तो भी किसी को पीटकर धार्मिक कहलाने की अपेक्षा कहीं ज्यादा धार्मिक नजर आएंगे। 

- अभिषेक

सोमवार, 1 अगस्त 2016

इरोम शर्मिलाः नर्इ पारी में अनशन खत्म होगा, AFSPA का विरोध नहीं


इतिहास खुद को नहीं लिखता, इतिहास को लोग लिखते हैं और वो भी अपने कामों से। 9 अगस्त का सूरज जब क्षितिज की तन्हाइयों को छोड़कर निकलेगा तो उमंग और उत्साह से भरा होगा। सिर्फ इसलिए कि वो नया इतिहास बनते देखेगा, 16 सालों के संघर्ष के बाद वो संघर्ष के तरीकों को बदलते देखेगा, अनशन को राजनीति में बदलते देखेगा, वो एक आम महिला से संघर्ष की जीती जागती मिसाल बनने वाली उसे महिला केा देखेगा जो 16 सालों की अग्नि परीक्षा में कभी निस्तेज नहीं पड़ी, कभी उस अग्नि से डरी नहीं। इतिहास 9 अगस्त को इरोम शर्मिला को अनशन समाप्त करते देखेगा। 

इरोम ने अपने अनशन को समाप्त करने के लिए 9 अगस्त का दिन चुना है। इरोम ने ये दिन क्यों चुना है ये बेहतर ढंग से तो वही बता सकती हैं, लेकिन 9 अगस्त का दिन आजादी की लड़ाई का वो दिन है जब भारत ने अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए पूर्ण रूप से कह दिया था। 9 अगस्त 1942 का दिन भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत का दिन था। इरोम का 9 अगस्त को अनशन समाप्त करने का निर्णय किसी भी और दिनों की तरह ही है या फिर उनकी मंशा मणिपुर में एेसे ही आंदोलन को जिंदा करने की है। भारत छोड़ो आंदोलन में गांधीजी ने नारा दिया था कि करो या मरो। क्या इरोम अपने संघर्ष को इस स्तर तक ले जाने का इरादा रखती हैं। 16 साल के संघर्ष में उन्होंने संघर्ष की जिन बुलंदियों को छुआ है वो अद्वितीय है लेकिन क्या राजनीति में रहते हुए वो ऐसा कर पाएगी? 

इरोम का विरोध सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून 1958 यानी अफस्पा के खिलाफ है। 1 नवम्बर 2000 को सैन्यबलों ने जब मणिपुर में 10 लोगों को मार गिराया तो इसके बाद इरोम ने अपना सत्याग्रह शुरू किया। आज तक इरोम पुलिस गिरफ्त में एक अंडर ट्रायल कैदी है। इंफाल के जवाहरलाल नेहरू इंस्टीटयूट आॅफ मेडिकल साइंस में एक कमरा उनके लिए है, जहां उन्हें जबर्दस्ती नाक से खाना दिया जाता है। उन पर आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा चल रहा है। इन सारी चीजों के बावजूद वे आज भी संघर्ष कर रही हैं। 9 अगस्त को अनशन छोड़ने के निर्णय को लेकर लगता है कि जैसे भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त पूरे भारत से आवाज उठी थी कि अंग्रेजों भारत छोड़ो वैसी ही आवाज वे मणिपुर में अफस्पा के विरोध में उठाना चाहती हैं। उनकी नर्इ पारी में अनशन जरूर खत्म होगा, लेकिन अफस्पा का विरोध नहीं। 

1980 से अफस्पा का दंश झेल रहे मणिपुर के हितों की बात करने वाली इरोम ने अनशन छोड़ते हुए कहा है कि उन्हें सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। यहां ध्यान देने की बात ये है कि पिछले करीब 36 सालों में किसी एक दल की सरकार नहीं रहीं। सरकारें बदलती रहीं लेकिन उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। इरोम के अनशन को आम आदमी ने सम्मान जरूर दिया लेकिन सरकारों ने कोई सकारात्मक पहल की हो ऐसा नजर नहीं आता। 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनशन को विरोध का सबसे असरदार हथियार माना जाता है, लेकिन इरोम के अनशन को तवज्जो न मिलना इस बात का संकेत है कि सरकारें उन मामलों को ऐसे ही छोड़ देती हैं जिन पर मीडिया में एक समय के बाद हल्ला मचना कम हो जाता है। इरोम का मामला हर साल आने वाली एक बरसी की तरह था जब हर साल कुछ इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में छोटी सी एक खबर दिखाई पड़ जाती थी कि आज इरोम के अनशन को इतने साल हो गए हैं। इससे ज्यादा उनके लिए इरोम का कोई वजूद नहीं है। 16 सालों तक अनशन करने वाली इरोम की खबरें अजब-गजब जैसे सेक्शनों में नहीं लगी ये भी गनीमत ही है। 

इरोम अपनी नई पारी शुरू करने जा रही हैं। वो कहती हैं कि राजनीति में कदम रखूंगी, शादी करूंगी। ये साबित करता है कि संघर्ष में भी मोहब्बत छिपी होती है। अफस्पा के खिलाफ संघर्ष ये दर्शाता है कि उन्हें मणिपुर और मणिपुर के लोगों से कितनी मोहब्बत है तो व्यक्तिगत जिंदगी में भी एक शख्स से मोहब्बत का असर है कि वे तमाम तकलीफों के बावजूद शादी करने जा रही हैं। इरोम के 16 साल लम्बे संघर्ष के लिए सलाम और भविष्य के संघर्ष के लिए शुभकामनाएं। वो राजनीति में कदम रखने जा रही हैं तो एक दुआ भी है कि वो संघर्ष में तपकर निकले नेताओं की तरह न निकले जो अपने संघर्ष को बोते गए और हर साल फसल की तरह राजनीतिक मुनाफा काटते गए। 

- अभिषेक

सोमवार, 25 जुलाई 2016

आज भी वो इंसाफ मांग रहे हैं आैर इंसानियत मुंह छिपा रही है

‘भगवान के घर देर है अंधेर नहीं‘, हमने अक्सर ये सुना है लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम के किसी भी सिरे को पकड़कर आप आगे बढ़ना शुरू कर दें आपको अंधेरा ही अंधेरा नजर आएगा। एक बड़े पेड़ के गिरने के बाद धरती इतनी जोर से भी नहीं हिलती की सारी इंसानियत गर्त में समा जाए, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों को मार देने की अंधी दौड़ इस कदर इंसानियत पर हावी हुई कि उस मंजर को सुनकर-पढ़कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।

देश के तत्कालीन गृह मंत्री को जूता मारकर (हालांकि जूता लगा नहीं था) चर्चा में आए पत्रकार जरनैल सिंह की किताब ‘कब कटेगी चौरासी-सिख कत्लेआम का सच‘ उन तीन दिनों के कत्लेआम को बयां करती हैं। 31 अक्टूबर 1984 से 2 अक्टूबर 1984 के उन तीन दिनों में कैसे दंगाई एक के बाद एक सिखों की लाशें बिछाते रहे? कैसे औरतें अपने पति, पिता और बच्चों को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखती आैर क्रंदन करती रहीं? कैसे दंगाई और पुलिस में कोई भेद ही नहीं रह गया था? कैसे घायल सिखों को आग के हवाले कर हत्याओं को भी क्रूरतम बना दिया गया? इन सारे सवालों के जवाब ये किताब देती है। जहां किताब को पढ़ते हुए आपको लगता है कि कैसे एक दंगा पूरी दुनिया केा आपसे बेगाना कर देता है, ऐसा लगता है कि दुनिया में अब आपका कोई नहीं है। जैसे पूरी दुनिया ने आपको मरने के लिए दंगाइयों के सामने छोड़ दिया है। हर दंगाई किसी का बेटा, भाई, पति होता है लेकिन दंगा करते वक्त एक हत्यारा ही रह हो जाता है।

पुलिस थी या दंगाई 
जरनैल सिंह अपनी किताब में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं। वे बताते हैं कि आईएएस अधिकारी कुसुमलता मित्तल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एक पुलिस अधिकारी को 'जीवित शर्म' लिखा तो दूसरे को दिल्ली पुलिस के चेहरे पर 'बदनुमा दाग' करार दिया। ये वही पुलिस अधिकारी थे जिन्हें दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाया गया था लेकिन ये दंगाइयों के ही मददगार साबित हुए। इस किताब में पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह के हवाले से बताया गया है कि देश की राजधानी में इतना बड़ा दंगा पुलिस की मदद के संभव ही नहीं है। उनके अनुसार यदि पुलिस ने थोड़ा सा भी बल का इस्तेमाल किया होता तो दंगाई इतने बड़े कत्लेआम को अंजाम ही नहीं दे पाते। इस दंगे का सबसे घृणित पहलू ये है कि दंगाइयों से जब कोई घर या इलाका फतह नहीं हुआ तो उन्होंने पुलिस को बुलाया। लोगों को मारने, उनके घरों को लूटने में जब वे नाकामयाब होते तो पुलिस को गुहार लगाते और पुलिस कत्ल और लूट में हिस्सेदार बन जाती।

राजनेताओं पर सवाल 
सिखों के कत्लेआम के बाद करीब 30 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन जिन बड़े नेताओं पर आरोप लगे वे आज भी अपना दामन बचाए चैन की बंसी बजा रहे हैं। ये उन सैंकड़ों विधवाओं के दर्द को और बढ़ा देता है जिन्होंने उस खूनी मंजर के बाद अपनी जिंदगी को यूं बुझते देखा है। कांग्रेस के बड़े नेताआें के खिलाफ इतने सुबूतों आैर गवाहों के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ पाती है। ये देश की न्याय व्यवस्था के साथ क्रूरतम खिलवाड़ सा लगता है।

अफवाहों को गर्म रखा गया
सोशल मीडिया के इस दौर में जब हमें कश्मीर की हालत देखकर इसके खतरे समझ में आ रहे हैं। हम उस दौर में उड़ने वाली अफवाहों से पैदा होने वाली नफरत को समझ सकते हैं। कानपुर में सिखों से लोगों की हमदर्दी न हो जाए इसलिए ऐसी अफवाहें फैलाई गई कि सिख फौजियों ने पास के गांवों के लोगों को गोली मार दी है। अफवाहों के ऐसे बाजार उस दौर में पूरे देश में सजे थे जिनका एक ही मकसद था सिखों के प्रति हमदर्दी और विश्वास को वातावरण न बन सके। आज के दौर में जब अफवाहें इतनी तेजी से हमारे दिलों में जहर भर देती हैं तो उस दौर का अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल नहीं है।

जरनैल सिंह चिदंबरम पर जूता फेंकने को अभूतपूर्व अन्याय के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध कहते हैं। हालांकि अपने इस कृत्य को वे गलत जरूर मानते हैं लेकिन मुद्दा सही उठाने की बात कहते हैं। उनकी किताब के शुरूआती कुछ पन्ने पलटने के बाद आप सिखों के साथ हुए उस अन्याय से रूबरू होते हैं, जिनमें दंगार्इ हाथ में वोटर लिस्ट लिए सिखों का कत्लेआम करने पर तुले थे। एक आम आदमी के लिए ये सोचना भी दिल दहला देने वाला है कि कैसे सिखों को सरियों आैर लाठियों से पीटा जाता आैर फिर उनके गले में टायर डालकर जिंदा जला दिया जाता। ये आम आदमी की प्रतिक्रिया हो ही नहीं सकती। ये सुनियोजित षड़यंत्र था जो आज भी हमारी न्याय प्रणाली को दूर से देखकर हंस रहा है।

इस मामले में बहुत कम लोगों को सजा हुर्इ है, वो भी एेसे लोगों को जिनके कंधे पर बंदूक रखकर चलार्इ गर्इ आैर फिर उनके रहनुमा बनने का दावा करने वालों ने किनारा कर लिया। तड़प-तड़प कर जान देता हर सिख जैसे आज भी अपने लिए न्याय की गुहार लगा रहा है, उनकी विधवाएं आैर बच्चे अपनों के लिए इंसाफ को पुकार रहे हैं आैर एेसा लगता है कि इंसानियत शर्म से मुंह छिपा रही है।


- अभिषेक

बुधवार, 20 जुलाई 2016

'तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है'


हम अक्सर ये सुनते हुए बड़े हुए हैं कि फिल्में समाज का आईना है। हालांकि मैं पूरी तरह से इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। एक फिल्मकार अपनी फिल्म में क्या दिखाना चाहता है। ये उस पर निर्भर करता है। फिर वो फिल्म में समाज से जुड़ी समस्या दिखाए, अंतरिक्ष की कहानी दिखाए या कुछ असाधारण या फिर कोर्इ बकवास। हां, मैं ये जरूर मानता हूं कि कभी-कभी कोई फिल्मकार हमारे अंतर्मन को फिल्म की शक्ल में जरूर सामने रखता है। ये भी एक अपवाद की तरह ही होता है लेकिन जब होता है तो उस चीज को भुला देना असंभव होता है।

आजकल एक फिल्म के कुछ दृश्यों को भुला नहीं पा रहा हूं, मैं जितना उन दृश्यों को देखता हूं स्वयं को एक अलग ही दुनिया में पाता हूं। बहुत संभव है कि ये हाॅलीवुड फिल्म किसी क्लासिक फिल्म की श्रेणी में न सम्मिलित हो लेकिन ये मेरे दिल के जरूर करीब है। ये फिल्म है ‘द लास्ट समुराई‘। फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हें भूलना असंभव है। खासतौर पर जब आप जीवन और मृत्यु की बहस को किसी चर्चा में और लंबा खींचते रहे हैं। फिल्म के आखिरी कुछ दृश्य जो कर देते हैं वो दूसरी कुछ फिल्मों के बस की बात नहीं है।

फिल्म में दो मुख्य किरदार हैं। एक है कात्सोमोटो, जिसे बखूबी निभाया है केन वाटनबे ने और दूसरा किरदार नाथन एलग्रिन का है जिसे अभिनेता टाॅम क्रूज ने नर्इ ऊंचाइयां दी है। फिल्म के एक संवाद में टाॅम क्रूज से पूछा जाता है कि ये बताइए कि वो कैसे मरे थे? टाॅम क्रूज का जवाब होता है ‘ये सुनिए वो जिए कैसे थे?‘ हमेशा मरने वाले की मौत का कारण जानने में हमारी दिलचस्पी होती है, लेकिन मरने वाले ने अपनी जिंदगी कैसे जी? ये पूछना हम हमेशा भूल जाते हैं। शुरूआती दौर में जब मेरे पिता मुझे खबर लिखना सिखाते थे तो एक दिन मैंने एक बार ‘मृत्यु‘ को ‘मृत्यू‘ लिख दिया था। उस वक्त उन्होंने मुझे टोकते हुए कहा था कि मृत्यु बहुत छोटी बात है हर किसी को आनी है मात्रा छोटी आएगी। ‘द लास्ट समुराई‘ भी हमें यही सिखाती है। मृत्यु तो जिंदगी का एक हिस्सा है और हम हमेशा मृत्यु की बात करते हैं, जिंदगी को भूल जाते हैं।

फिल्म के एक दृश्य में समुराई अपनी तलवारों और दूसरे परंपरागत हथियारों से लैस होकर बंदूकधारी सैनिकों से टकरा जाते हैं। दिमाग वालों के लिए ये मूर्खता है और दिलवालों के लिए अपने आदर्शों के लिए बलिदान हो जाना। लड़ने वाले हर समुराई को पता होता है कि उन्हें मरना है, लेकिन जब आप सही हों तो अपनी बात के लिए लड़ना और मर जाना भी सम्मान है। एक-एक कर ढेर होते समुराई और उन पर गोली चलाते बंदूकधारी सैनिकों को देखकर ऐसा लगता है मानो गोलियां आपका हदय भेदकर निकल रही हों।

आखिर में जब सारे समुराई वीरगति को प्राप्त होते हैं या फिर घायल अवस्था में वीरगति का इंतजार करते हैं उस वक्त गोली चलाने वाले एक सैनिक का दिल पसीजता है और वो उन महान योद्धाओं को सम्मान देने के लिए घुटनों पर बैठकर अपने दुश्मनों के सामने नतमस्तक हो जाता है। धीरे-धीरे हर सैनिक को ये अहसास होता है कि जिन्हें वे ढेर कर चुके हैं असली योद्धा तो वे थे। हर सैनिक घुटने पर आता है और उन महान योद्धाओं के सम्मान में नतमस्तक हो जाता है। एक योद्धा के लिए उस मौत से बढ़कर और क्या हो सकता है जब दुश्मन उसे झुककर सम्मान दे। आदर्शों के लिए बलिदान हो जाने वालों के लिए हर किसी के मन में सम्मान होता है। कात्सोमोटो, नाथन से कहता है कि तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है। कात्सोमोटो को इज्जत की वो मौत नसीब होती है जिसका ख्वाब उसने हमेशा देखा था।

आखिर में जापान के राजा को अपनी गलती का अहसास होता है। परंपराआें आैर नवीनता के द्वंद्व के बीच उन्हें लगता है कि उन्हाेंने संगठित जापान का जो सपना देखा था वो अपनों की कीमत पर नहीं हो सकता। राजा कहते हैं कि हमारे पास चाहे कुछ भी हो लेकिन हमें ये भूलना नहीं चाहिए कि हम कौन हैं? हमें भी हमेशा ये याद रखना चाहिए।

- अभिषेक

शनिवार, 16 जुलाई 2016

मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा

आसमां का सीना चीर के निकलूंगा
दुनिया वालों तुम्हारा मुंह नोच के निकलूंगा
मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा
दुश्मनों की महफिल से सीना ठोक के निकलूंगा

हजार शिकायतें दोस्तो की हैं
हजारों तलातुम दुश्मनों ने खड़े किए
मगर सुनलो अ दुनियावालों
सीना ए कुहसार पर कदमताल करके निकलूंगा

इस हाले जार में जीने दो,
मुझे खुद्दार बनके जीने दो
मेरे गैज को न दो आवाज
किसी रोज बेदाद बनके निकलूंगा

दीवानों की दुनिया है
आसमां भी हम अपना बना लेंगे
रोक के देख अ दुश्मन मुझे
तूफाने हवादिस में साजे जीस्त बनके निकलूंगा

किसी उक्वा के लिए जीने वाले
मेरे हमदम कोई और होंगे
सुनलो अ नुक्ताचीनों
जमीं पर मुकद्दस शमशीर बनके निकलूंगा।

पहली ही इश्रत में तुमने
सारे अहसानों को बहा डाला
गौर से सुनलो अहरमन हूं,
जख्म के बाद तबस्सुम बनके निकलूंगा।

- अभिषेक


तलातुमः तूफान, सीना ए कुहसारः पर्वत की छाती पर, हाले जारः दरिद्र दशा, गैजः क्रोध, बेदादः अत्याचार, तूफाने हवादिसः दुर्घटनाओं के तूफान में, साजे जीस्तः जीवन संगीत, उक्वाः परलोक, शमशीरः तलवार, इश्रतः सुख भोग,अहरमनः शैतान, तबस्सुमः मुस्कुराहट।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

बदरा बरसना भूल गई

गलियों गलियों फिर फिर बदरा
उसका मुखड़ा देख गई
ये देखे या वो देखे
वो सारी दुनिया देख गई

आग उगलती इस दुनिया में
जलता हुआ नजारा है
झीनी सी चदरिया का आंचल ले
वो सूरज संग खेल गई

बातों की हसरत क्या पूरी हो
वो इक मौसम उसको देखे है
यादों में जीती यादों में ढलती
वो अश्कों से उसको सींच गई

इक दीवानी इक दीवाने संग
हाथ पकड़ यूं चलती थी
मैं देखूं या तू देखे
देख ये बदरा बीत गई

दीवाने का नाम न जाने
ऐसी उलझन पहली देखी
दो पल की इस यारी में
बदरा सारी भीग गई

काली-काली घटा उमड़ती
देख दीवाना डोल गया
भर-भर पानी कोई उलीचे
और बदरा बरसना भूल गई


- अभिषेक

रविवार, 10 जुलाई 2016

मोहब्बत, मौसम, मौसम विभाग...भरोसे के लायक कोई नहीं

हमारे देश में मोहब्बत से बड़ा कोई ट्रेंडिंग टाॅपिक नहीं है। हर छत पर मोहब्बत खड़ी है और सड़क से कोई इश्क उसे निहार रहा है। बस इंतजार उसके मुकम्मल होने का है। मोहब्बत का मुकम्मल हो जाना यहां कोई खेल नहीं है। लाखों पापड़ बेलिए और मोहब्बत की आस, आस ही रह जाए किसे पता? ऐसा ही कुछ हाल मौसम विभाग का भी लगता है। छत पर खड़े होकर बादलों का इंतजार करते रहिए या फिर मानसून आया कि नहीं पता करने के लिए अखबारों के पन्ने पलटते रहिए या न्यूज चैनल्स के लिए रिमोट को दबाते रहिए। फिर भी मौसम का मिजाज कब बदलेगा, कब मानसून आएगा, एेसे सवालों का जवाब मिलना मुश्किल है।

इस मामले में मोहब्बत और मौसम विभाग की राशि एक है, सिंह राशि। बात जब सिंह की हो तो कौन क्या कह दे? मोहब्बत हो जाए तो कौन है जो मोहब्बत करने वालों को रोक लें। मौसम विभाग वो जो मानसून की कभी भी भविष्यवाणी कर दें। हालिया दिनों में मौसम विभाग ने जयपुर के मानसून को लेकर तीन भविष्यवाणियां की है। तीनों की तीनों भविष्यवाणियां झूठी निकली। अब लोगों को इंतजार चौथी भविष्यवाणी का है। हालांकि लोगों के लिए ये चौथी भविष्यवाणी पत्थर की लकीन हो ऐसा नहीं है। कुछ लोगाें के लिए मौसम की भविष्यवाणी का अर्थ वही नहीं होता जो मौसम विभाग कहता है। उनके लिए मौसम की भविष्यवाणी का अर्थ उसके बिल्कुल विपरीत होता है। जैसे जयपुर में आज भारी बारिश की चेतावनी का अर्थ कुछ लोगों के लिए तेज गर्मी से होने वाली परेशानी है।

अब थोड़ी सी बात मोहब्बत की। मौसम और मौसम विभाग की ही तरह मोहब्बत पर भरोसा करना भी ठीक नहीं है। ब्रेकअप, पैचअप के इस दौर में मोहब्बत का असली मजा फीका सा लगता है। एक शाम प्यार परवान चढ़े, दूसरी शाम डेट घटे और तीसरी शाम होते-होते अमेरिकन सिस्टम टीटीएमएम पर चलें यानी तू तेरे और मैं मेरे। इसलिए मोहब्बत की सोहबत में आजकन न हीर आती है और न ही रांझा दीवाना हुआ फिरता दिखाई देता है। मोहब्बत में जब तक आदमी की इज्जत का जनाजा न निकले तब तक क्या मोहब्बत की।

खैर मोहब्बत तो यूं भी एक बगावत है जिसे रोकना न तो मोहब्बत करने वाले के बस की बात है और न ही इसका विरोध करने वालों के बस में। हां, ये मसला मौसम विभाग के साथ भी कुछ ऐसा ही है। बादलों की कहानी धरतीवासियों को बताने का जरिया मौसम विभाग अगर कुछ गलत कह दे तो उसे ऊपरी चक्कर समझकर भूल जाइए। ऊपरी चक्कर न आपको समझ आएगा और न ही ये चक्कर मौसम विभाग के पल्ले पड रहा है। मानसून के बारे में मौसम विभाग की गलतियों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। अब जब आपके पास पल्ला झाड़ने के लिए कुछ हो तो फिर शिकायत की भी गुजाइश कहां है। ये हाल मौसम विभाग का है। बस इसीलिए मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर ज्यादा गौर न करें और सबकुछ ऊपर वाले पर छोड़ दें। मोहब्बत में सारे जहां से पिटे आशिक की तरह।

- अभिषेक

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

जाआे पहले वो किताबों की आलमारी हटाओ

कदम जब जमने लगे
दूसरे जब आवाज समझने लगे
वो गिनती सुनाने लगे
मुस्कुराहट,
गुस्सा,
प्यार,
जिद,
हर रोज उस पर उतरने लगे
उस रोज खबरदार हो जाना
तुम उस रोज घर को सजाना
ध्यान रखना और
वो आलमारी हटा देना।

बच्चों के लिए खतरनाक है वो आलमारी
जहां रखी है किताबें ढेर सारी
पृष्ठों को एक दूसरे से उलझने दो
अंदर ही अंदर
एक अध्याय को खत्म
दूसरे को शुरू होने दो
तर्क को ताले में कैद करो
दिमाग को खर्च मत होने दो
क्योंकि अच्छी बातें
किसी और के लिए रहने दो।

जाआे उन्हें अय्यारी सिखाओ
मक्कारी सिखाओ
और पोटलियां बनाओ
ज्ञान की,
तर्क की,
हास्य की,
खुशी की,
और बहुत दूर ले जाओ
क्योंकि
इस जहां के लिए जरूरी है जो
अपने बच्चों को वही सिखाओ
जाओ पहले वो किताबों की आलमारी हटाओ।

- अभिषेक

शनिवार, 2 जुलाई 2016

आप में भी है एक 'इन्द्र', बस जरूरत है नजरिया बदलने की

सृष्टि को खोजना मनुष्य के बस में नहीं है। हालांकि ये कोशिश बदस्तूर जारी है। आदमी जैसे-जैसे एक के बाद एक खोज मुकम्मल करता है, नई-नई खोज उसके दिलो दिमाग पर दस्तक देने लगती है। कभी ईश्वर को खोजना, उसे पा लेना इंसान के लिए मुश्किल था। अब लगता है कि क्या धीरे-धीरे इंसान उसे खोजने की ओर बढ़ रहा है? खोज लेना और खोज को मुकम्मल कर देना दो अलग-अलग बात है। दोनों में जमीन और आसमान जितना फर्क है। बहुत संभव है कि ये फर्क कभी न मिटे, लेकिन एक यात्रा के दौरान मुझे ये फर्क जरूर मिटता लगा है।

हिन्दू धर्म में खासतौर पर आर्य संस्कृति में इन्द्र को एक प्रमुख देवता के रूप में स्थान दिया गया है। खासतौर पर देवलोक के प्रिंसिपल के तौर पर इन्द्र की उपस्थिति टीवी सीरियल्स में बदस्तूर नजर आती है। हम जब जमीन से आसमान की ओर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि इन बादलों के परे कोई जगह जरूर होगी जहां स्वर्ग होगा, जहां देव होंगे, जहां इन्द्र होंगे। हालांकि जब से आदमी ने बादलों का घेरा तोड़कर अपने वायुयानों को वहां पर दौड़ाना शुरू किया है तो ऐसा लगता ही नहीं है कि यहां पर कहीं इन्द्र होंगे।

इन्द्र और देवलोक की कल्पनाएं दुष्कर को देव मानने की परिपाटी को बयां करती हैं। हम जिस चीज को छू नहीं सकते, उसके बारे में पता लगाना जब हमें असंभव लगता है तो उसे हम अलौकिक मान लेते हैं और देव के रूप में स्थान देते हैं। बादलों के पार स्वर्ग के सिंहासन पर आरूढ इन्द्र भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ाते हैं। हालांकि जब आप स्वयं किसी वायुयान में बैठकर बादलों के पार स्वयं को पाते हैं तो आपको लगता है कि इन्द्र और देवलोक की जो कल्पनाएं टीवी सीरियल्स आपके मन में बैठाते हैं वो एक तरह से ठीक भी है। इन कल्पनाओं में आपको स्वयं के इन्द्र होने का अहसास होने लगता है।

देवलोक में इन्द्र और उसके साथ में बैठे सभासदों के कल्पनाओं के घोड़े की अगर आप वायुयान में बैठे लोगों के साथ तुलना करें तो आप पाएंगे कि आप खुद ही इन्द्र हैं। एक कदम और आगे बढ़ाएं तो फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में आपको अप्सराएं भी नजर आ जाएंगी। नाम अलग हो सकते हैं लेकिन रंभा, उर्वशी, मेनका की कल्पनाओं का बाजार साकार हो सकता है। कुल मिलाकर ये सब वैसा ही है जैसा की हमारी कल्पनाओं में बरसों से जिंदा है।

आखिर में
स्वयं के इन्द्र होने के विचार को कल्पना समझकर यूं ही उड़ा देना ठीक नहीं है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि देवता होना कोई अलौकिक घटना नहीं है। इस दुनिया में हर आदमी देवता है। बस जरूरत है नजरिया बदलने की। खासतौर पर तब जब हम छोटी-छोटी बातों से निराश हो जाते हैं। ये ऐसा ही है जैसे इन्द्र समय-समय पर राक्षसों से हारकर स्वर्ग के सिंहासन से दूर हो जाते हैं और फिर अपनी सारी शक्तियों को संगठित कर स्वर्ग का सिंहासन फिर से प्राप्त करते हैं।

हमें भी स्वयं पर विश्वास करना सीखना होगा। जब सबकुछ हमारे खिलाफ हो, जब बाजी हम हार जाएं तो ये मत समझिए कि ये आखिरी बाजी है। खुद को इन्द्र समझिए और जीतने के लिए प्रयास करते रहिए।

- अभिषेक

बुधवार, 29 जून 2016

हम भी उनके हमराह हो चले हैं

आज हम भी उनके हमराह हो चले हैं
वो अपनी रजा छुपा और हम गम दबा चले हैं

उनकी भी खता क्या, कुसूर मेरा भी नहीं
दीवानों की किस्मत जो राजे दिल दफन कर चले हैं

दो शाखाओं की दूरी ने हमें मिलने न दिया
अब ये सूखे पत्ते जमीं पर मिलने चले हैं

उनके जाने से हो चला है वीरान सब कुछ
कुछ तो शर्म करो दोस्तो वो और होंगे जो मनचले हैं

खुदा की इबादत की जो हमने सच्चाई बयां की
इश्क को समझाया क्या कि काफिर हो चले हैं

- अभिषेक

मंगलवार, 28 जून 2016

नींद कैसे आएगी ?

काम पर से घर लौट रहा हूं
और
बहुत चिंतित हूं
ना जाने किसने
रास्ते के सारे गडढे भर दिए हैं
अब न झटके लगेंगे
न थकान होगी
और
न कमर अटकेगी
मैं बहुत चिंतित हूं
आखिर
आज रात नींद कैसे आएगी?

- अभिषेक