बुधवार, 7 दिसंबर 2016

नोटबंदीः जीरो लाइन पर खड़े हैं तो आपके लिए पानी ही पानी है, जहां आपको डूब मरना है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को अचानक 500 और 1000 रुपए के नोटों को चलता कर दिया। इधर मोदी का ऐलान हुआ और उधर देश भर में लोगों की कतारें लगनी शुरू हो गईं। ये कतारें सिर्फ एटीएम, बैंक या फिर पेट्रोल पंपों पर नहीं हैं। असल में जो लाइनें इन स्थानों पर लगी हैं, उनसे अलग तीन अदृश्य लाइनें हमेशा से मौजूद रही हैं। 

नोटबंदी के फैसले के बाद बहुत से लोग पीएम मोदी के निर्णय की प्रशंसा कर रहे हैं तो बहुत से लोग विरोध में हैं। अब जो थोड़े से लोग बच गए हैं वे न उधर हैं न इधर हैं। पहली दो लाइनों के लोगों की खूब सुनी जा रही है, लेकिन इस तीसरी दुनिया की न किसी को खबर है और न ही कोई इसकी परवाह कर रहा है। 

प्रशंसा और विरोध के बीच जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो ये है कि ज्यादातर लोग तर्क के बजाय सिर्फ अपनी बात मनवाना चाहते हैं। जो थोड़े से लोग तर्क कर रहे हैं, उनके पास अपने समर्थन में कई तर्क हैं लेकिन विरोधी के तर्कों को वो सुनना ही नहीं चाहते हैं। टीवी की बहसें राजनीतिक दलों की नूरा कुश्ती बन चुकी हैं जहां पक्ष को निर्णय की प्रशंसा करना जरूरी है तो विपक्ष को आलोचना का सहारा। 

अगर हम इन सारी बातों को किनारे रख भी दें तो जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो है इस देश का खेमों में बंट जाना। ऐसा लगता है जैसे विरोध और प्रशंसा दो ध्रुवों में बंट गए हों। एक उत्तरी ध्रुव है और दूसरा दक्षिणी ध्रुव है। आप यदि देखें तो पाएंगे कि इन ध्रुवों के बीच में जिंदा रहने के लिए कोई जगह नहीं है। आप लकीर के एक तरफ हैं या लकीर के दूसरी तरफ। यदि आप सोच रहे हैं कि मैं लकीर पर खड़ा होकर दोनों पक्षों को परखना चाहता हूं तो आप चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाएंगे। एक पक्ष के आपको अपनी ओर लाने की कोशिश में ऐसे ऐसे तर्क देंगे कि आप चकरा जांएंगे तो दूसरा भी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। 

रही बात उन लोगों की जो दोनों से जान छुड़ाकर अब भी जीरो लाइन पर खड़े हैं उन्हें पता नहीं कि उनका शिकार कौन करेगा। ऐसा लगता है कि आप की यदि कोई निश्चित विचारधारा नहीं है तो आप का कोई वजूद ही नहीं है। यदि आपने एक निर्णय की प्रशंसा की और दूसरे की आलोचना तो यकीन मानिए आप के हाथ से दोनों ध्रुव फिसल गए हैं। अब आपके लिए कोई जमीन नहीं बस पानी ही पानी है। जहां पर आपको जाकर डूब मरना है। 

- अभिषेक


शनिवार, 24 सितंबर 2016

कितना संवेदनहीन है आज का इंसान

सर्दियों के उन दिनों में जब आॅफिस का काम बोझ लगने लगता है तो लोग अक्सर चाय की चुस्कियों के लिए बाहर की थड़ियों पर अडडा जमा लेते हैं। ऐसे ही एक दिन चाय की चुस्कियों के साथ तीन बच्चियां उस पत्रकार के सामने आ खड़ी हुई। पत्रकार ने कुछ बिस्किट लिए और उन्हें थमा दिए। ये कहानी एक दिन शुरू हुई और उसके बाद ये किस्सा रोजाना का हिस्सा बन गया। तय समय पर वो तीनों आ जातीं और रोजाना बिस्किट का पैकेट लेकर चली जातीं। 

एक दिन अखबार पढ़ते-पढ़ते एक खबर पर नजर गई। खबर का मजमून कुछ यूं था कि एक आदमी ने कुछ बच्चियों की मदद की। खबर को आम आदमी ने हाथों हाथ लिया और उस आदमी की खूब वाहवाही हुई। खबर को लोगों ने पढा और भुला दिया। सिवाय उस पत्रकार के। अगले दिन उसने उन बच्चियों से उनके घरवालों के बारे में पूछा। माता-पिता, रोजी-रोटी जैसे कर्इ सवाल किए। तीनों को अपने घरवालों के बारे में पता नहीं था। पत्रकार ने उनकी मदद करने की ठानी। वह उन्हें अपने घर ले गया। पत्रकार की बीवी ने उन्हें नहलाया, अच्छे कपड़े पहनाए और अच्छा खाना खिलाया। काली फ्राॅक पर नीले-पीले सितारों का जमघट उन बच्चियों को खूब पसंद आया। बाद में जहां से वो पत्रकार उन्हें लेकर गया था उसी जगह पर छोड़ भी गया। 

पेट भरा था तो वो दिन किसी तरह से निकल गया। धीरे-धीरे दूसरा दिन गुजरा, तीसरा दिन भी। उन बच्चियों को कुछ नहीं मिला। अच्छे कपड़े देखकर लोगों ने भीख देना भी बंद कर दिया। कहते इतने अच्छे कपड़े और भिखारी हो ही नहीं सकती। कोई कहता किसी गिरोह से जुड़ी हैं। जितने मुंह खुलते गए उन बच्चियों के लिए उतनी ही बातें फैलती गई। पहले तो कोई दया से कुछ दे जाता था अब लोगों को नए कपड़ों से नफरत होने लगी। कपड़े भी ऐसे कि घिसने का नाम ही नहीं लेते थे। इसी बीच पत्रकार घूमने दूसरे शहर चला गया। बिस्किट का वो पैकेट भी अब बंद हो गया। 

फिर एक दिन अखबार में एक कोने में एक छोटी सी खबर छपी। तीन बहनों ने भूख के कारण दम तोड़ा। छोटी खबर पर बड़ी संपादकीय भी छपी। एक दिन टीवी का आधा घंटा ‘आखिर इस मौत के लिए जिम्मेदार कौन?‘ शीर्षक से आबाद रहा। फिर शांति, शांति, शांति.....। 

कहानी के आखिरी मोड पर पत्रकार भी लौट आया। उसे उन बच्चियों की मौत के बारे में पता चला। पुराने अडडे पर गमगीन पत्रकार ने दुख जताने के लिए सिगरेट सुलगाई। चाय का गिलास थामा। ठोडी को दूसरे हाथ की कलाई से थामा और सोचा कितना संवेदनहीन है आज का इंसान। वो वापस आॅफिस लौट आया। आज किसी दूसरे काम में मन नहीं लग रहा था तो सोचा अपना ब्लाॅग ही लिख लूं। कई दिनों से लिखा नहीं था। अब पत्रकार अपना ब्लाॅग लिख रहा है, ‘अब पछताते होत क्या जब...।' ब्लाॅग लिखकर उन्होंने पोस्ट किया और देखा अरे वाह एक घंटे में 500 लोगों ने पढ़ा है। क्या बात है? आज का दिन बन गया। 

- अभिषेक

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

शिकायत मत कीजिए, टिश्यू पेपर से असहिष्णुता पोंछ लीजिए

मैं बहुत ज्यादा सहिष्णु आदमी हूं। ये पंक्ति पढ़कर आपको जरूर लगा होगा कि मैं अपने मुंह मियां मिठठू बन रहा हूं, लेकिन सच बात कहने का मुझे अधिकार जरूर है। एक कदम और आगे बढाऊं तो मुझे लगता है कि देश के ज्यादातर लोग बेहद सहिष्णु हैं। आपको लगता होगा कि ऐसे दौर में जब लोग एक दूसरे को गरियाने का मौका नहीं छोड़ रहे हैं। मैं उलटी गंगा पहाड़ पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा हूं। फिर भी आप जितना मुंह बनाएं ये सही है कि आम आदमी इतना सहिष्णु है कि अपने अधिकारों को लेकर भी सहिष्णु रवैया अपना लेता है और मुंह की खाता है। आप ऐसे नहीं मानेंगे जानता था तो सुनिए एक वाकया सुना देता हूं। 

पिछले दिनों एक ढाबे पर खाना खाते वक्त आसपास लोगों का जमघट लगा था। बस उसी को देखकर यकीन हो गया कि हम कितने सहिष्णु हैं। दरअसल, आसपास के लोग खाने के लिए प्लेट का इंतजार कर रहे थे। इतने में एक आदमी तेजी से लोगों के सामने प्लेट रखकर चला जाता है। अचानक हलचल होती है, एक दूसरे की टेबल पर देखा जाता है। अपनी टेबल से उचक-उचककर लोग दूसरे की टेबल पर टिश्यू पेपर ढूंढते नजर आते हैं। मैं हैरानी से उन्हें देखता हूं आखिर ये हो क्या रहा है? 

थोड़ी ही देर में मेरी टेबल पर भी थाली आ जाती है। थाली देखकर मैं कहता हूं, अरे ये थाली कितनी चिकनी है। लगता है जैसे ढंग से साफ नहीं किया गया है। तभी मेरे सामने बैठा व्यक्ति कहता है हां ये टिश्यू ले लो। मैं देखता हूं कि वह भी अपनी उस चिकनाई लिए हुए थाली को टिश्यू से पोंछ रहा है। मैंने पूछा आपने इसके लिए कहा नहीं। उसने कहा, नहीं हो जाता है। इतना घी डालता है तो कहां से उतरेगी इतनी चिकनाई। मैं भी अपनी थाली टिश्यू से पोंछते हुए सोचता हूं इससे ज्यादा सहिष्णुता कहां दिखाई देगी। 

मैं करीब आधे घंटे तक वहां पर बैठा रहा। जो भी आया उसने थाली आने के बाद टिश्यू मांगा। अब आप समझ ही गए होंगे कि वहां पर बैठे हर आदमी के लिए टिश्यू की क्या अहमियत रही होगी? वहां आने वाला हर आदमी खुद पर सहिष्णुता की चाशनी जाने कहां से उडेलकर आया होगा। हम परंपरागत रूप से इसी तरह के सहिष्णु हैं। 

इस सहिष्णुता की कहानी को देख-सुनकर अमिताभ बच्चन की एक फिल्म का डायलाॅग याद आ गया जब अमिताभ अपनी गरजती आवाज में कहते हैं, 'हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहां से शुरू हो जाती है।' टिश्यू पेपर का वाकया देखकर लगता है कि एक आदमी ने टिश्यू मांगा और पूरा जमाना सहिष्णु हो गया। तो जनाब अब रोजाना असहिष्णुता को लेकर तंग करना बंद कीजिए और थोड़े सहिष्णु हो जाइए। हां, इस बार शिकायत की जगह टिश्यू मांगिएगा। आपके सबसे ज्यादा सहिष्णु होने का यही प्रमाण होगा। शायद इससे आपकी सारी असहिष्णुता पोंछ दी जाए।

- अभिषेक

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

स्वतंत्रता दिवस पर PM-CM का भाषण नहीं ज्ञानी की खीर याद रही

मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। 


लीजिए 70 वां स्वतंत्रता दिवस भी बीत गया। हर बार की तरह। सच कहूं तो मुझे पिछले कई सालों से स्वतंत्रता दिवस को लेकर ज्यादा कुछ भी याद नहीं है। हमेशा लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण, शहीदों को श्रद्धांजलि, तिरंगे को सलामी जैसे दृश्य हमेशा नजर आते हैं। हर बार कई खबरें बनती हैं, लगती हैं। ये नजारे हर बार आम होते हैं। शायद यही कारण है कि हमें याद ही नहीं रहते। आम आदमी के लिए 15 अगस्त का दिन छुटटी का होता है। जैसे हमें अपने स्वतंत्रता दिवस से कोई मतलब ही नहीं है। करीब 70 सालों से जो होता आया है वो इस बार भी होगा, तो भला कौन भाव देगा लेकिन कुछ लोगों के लिए ये दिन होली-दिवाली, ईद-क्रिसमस से बढकर होता है। 

कई सालों से 15 अगस्त और 26 जनवरी की सुबह आॅफिस में ही बीतती रही है। स्वतंत्रता दिवस पर भी मैं इस बार आॅफिस में ही था। आॅफिस में ही स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम देखा। प्रधानमंत्री ने क्या कहा, आतंकवादियों ने गोलियां बरसाईं, महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र को कोसा जैसी खबरों में कब दोपहर का एक बज गया हमें पता ही नहीं चला। हम दो लोग आॅफिस से चाय पीने के लिए बाहर निकले। चाय की थड़ी पर कुछ देर तक यूं ही इधर-उधर की बातें की। जब वापस आॅफिस जा रहे थे तो एक ढाबे से अचानक आवाज आई भाईसाहब, खीर पी जाओ। जयपुर में पीटीआई की नई बन रही इमारत से सटकर एक व्यक्ति ढाबा चलाता है। ये उसी की आवाज थी। उसका नाम है ज्ञानी (सभी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं।) उन्होंने आग्रह किया तो चले गए। 

हमने पूछा काहे की खीर है। उसने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा बस ऐसे ही, स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है। अनायास ही मुंह से निकल गया ‘स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद है‘। आज तक कई तरह के प्रसाद सुने थे लेकिन स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद पहली बार सुना। वो भी एक ऐसे शख्स से जो किसी दूसरे राज्य से रोजी-रोटी की तलाश में जयपुर आया है। वो स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा है। फिर भी हमने कहा,  ‘अरे यार, हमें तो जाकर खाना भी खाना है।‘
उसने जोर देते हुए कहा- अरे, थोड़ी सी पी जाओ। 

हमने उसका निमंत्रण स्वीकार करते हुए मजाक-मजाक में पूछा, झंडा नहीं फहराया। उसके साथ मौजूद लोगों  ने जवाब दिया। क्यों नहीं फहराया वो देखिए। एक छोटा सा था झंडा इमारत पर जहां पीटीआई लिखा है वहां था और दूसरा मुख्यद्वार पर लगाया गया था। थोड़ी देर तक यूं ही बातें की और फिर हम लौट आए। 

मैं रास्ते भर ज्ञानी के बारे में सोचता रहा। घर पहुंचा तो भी मुझे सीएम-पीएम के भाषण याद नहीं थे, मुझे तो सिर्फ ज्ञानी याद है, उसकी खीर याद है। मेवों से भरी उस खीर में जो देशभक्ति की मिठास ज्ञानी ने घोल दी थी वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा। जब सवा सौ करोड़ देशवासियों में से ज्यादातर अपने घरों पर 15 अगस्त की छुटटी मना रहे थे एक शख्स देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत स्वतंत्रता दिवस का प्रसाद बांट रहा था। ज्ञानी को सलाम, वो ऐसा ज्ञान भारत के दूसरे अज्ञानियों को भी दे। 

- अभिषेक 

शनिवार, 13 अगस्त 2016

कश्मीरः एेसे हों नुमाइंदे जो सत्ता आने पर भी कश्मीर को याद रखें

जम्मू कश्मीर में पिछले कुछ महीनों से कुछ भी ठीक नहीं है। न आतंकवादी की मौत से उपजने वाला विरोध ठीक है, न सुरक्षाबलों की गोलियों से मरने वाले और न घायलों को देखकर कुछ ठीक कहा जा सकता है। घाटी में करीब एक महीने से कर्फ्यू लगा है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा उन लोगों को उठाना पड़ता है जो रोजाना कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं। कर्फ्यू का दंश ऐसे ही लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। जो लोग रोजाना कुछ रुपए का तेल, मिर्च और दूसरे मसाले खरीदकर रोजी-रोटी का किसी तरह से जुगाड़ करते हैं उनकी हालत का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। आप खुद को वहां रखकर देखेंगे तो समझ जाएंगे कि दिन किस तरह से चिंता में गुजरता होगा और रात में हर करवट अगले दिन कर्फ्यू खुलने की दुआ मांग रही होगी। (हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि आवश्यक खाद्य पदार्थ की आपूर्ति की गर्इ है।)

कश्मीर में ये हालात कई बार ऐसा रूप ले चुके हैं। लोगों के पथराव, विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षाबलों के प्रति नफरत और भारत को दूसरा देश समझने और समझाने की कोशिशों तब भी होती थी, अब भी होती है। हमने हमेशा कश्मीर की खूबसूरती देखी लेकिन वहां के लोगों का मन पढ़ने की कोई कोशिश नहीं की। कश्मीर का जब भी जिक्र आता है हम ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, बर्फ से ढकी वादियों और खूबसूरत नजारों को ही देखते हैं। या ज्यादा हुआ तो विरोध प्रदर्शनों, मरते आतंकवादियों और सीमापार से होती गोलीबारी की घटनाओं में ही हमें जम्मू कश्मीर याद रहता है। हालांकि जम्मू कश्मीर के आम आदमी को हम भुला देते हैं। 

आज कश्मीर के जो हालात हैं वो कश्मीर कई बार झेल चुका है। 1947 से पहले और बाद में ऐसे हालात कई बार बने, सुधरे हैं। ये विद्रोह आज नहीं भड़का है। 1947 से पहले जब कश्मीर पर डोगरा राजवंश का कब्जा था तब भी कई बार विरोध प्रदर्शनों के दौर होते रहते थे। मुस्लिम बहुत जनसंख्या और हिन्दू शासक के कारण आम आदमी को ये लगता था कि उनका भला नहीं हो सकता है। एक हद तक ये बात सही भी थी। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद सरकारी नौकरियों में हिन्दुआें और सिक्खों का बोलबाला था। 

1947 में जब राजे-रजवाड़े भारत और पाकिस्तान में मिल रहे थे उस वक्त जम्मू कश्मीर के राजा हरिसिंह ने कश्मीर को भारत आैर पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की काफी कोशिश की। इसका कारण ये माना जाता है कि उन्हें अंदेशा था कि शेख अब्दुल्ला, नेहरू के करीबी हैं इसलिए यदि भारत में वे अपने राज्य का विलय करते हैं तो वहां पर शेख अब्दुल्ला सर्वेसर्वा होंगे और उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी। वहीं पाकिस्तान के साथ मिलना उन्हें इसलिए मुनासिब नहीं लगा होगा क्योंकि पाकिस्तान कभी भी मुस्लिम बहुल जनता पर एक हिन्दू शासक को कतई स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि उनका स्वतंत्र राष्ट्र बनने की कोशिशों ने जम्मू कश्मीर की जनता के लिए कई तरह की मुसीबतें खड़ी कर दीं। 

आजादी से पहले ही सवा छह फुट से ज्यादा लंबे शेख अब्दुल्ला इकलौते ऐसे नेता थे जिनकी बात को कश्मीर की जनता ने अपनी आवाज माना। सरकारी नौकरियों में हो रहे भेदभाव के भुगतभोगी शेख अब्दुल्ला डोगरा राजवंश के खिलाफ थे। राजवंश के खिलाफ हो रहे कई आंदोलन की अगुवाई शेख अब्दुल्ला ने की। यहां तक की 1946 में जब उन्होंने डोगरा राजवंश से कश्मीर छोड़ने की मांग की तो उन्हें राजद्रोह के आरोप में तीन साल की सजा सुनाई गई और जेल में डाल दिया गया। तकरीबन उसी वक्त जब ये साफ होने लगा था कि देा देश बनने जा रहे हैं उस वक्त हरिसिंह ने अपनी मंशा को स्पष्ट रूप से सबके सामने रख दिया। हरिसिंह ने कहा कि वे बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेंगे और खुद अपना फैसला लेंगे। 

हरिसिंह के लिए उस वक्त जो उहापोह की स्थिति थी वो आज कश्मीर के लोगाें में नजर आती है आैर इसका सबसे बड़ा कारण है अविश्वास की खार्इ जो गहरी आैर गहरी होती जा रही है। आप आैर हम आसानी से ये समझ सकते हैं कि घायल होने वाला शख्स खुद के लिए कितने लोगाें की सहानुभूति हासिल करता होगा आैर नर्इ दिल्ली के लिए कितनी नफरत पैदा कर रहा होगा। कश्मीर घाटी में पिछले एक महीने का वक्त इस नफरत को बढ़ाने वाला ही साबित हुआ है। इसके लिए अकेले पाकिस्तान को दोषी ठहराना ठीक नहीं है। लोगाें के घटते विश्वास के लिए एक हद तक वहां के नेता भी जिम्मेदार हैं, जो विपक्ष में होने पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं आैर सत्ता में आने पर सबकुछ भूल जाते हैं। खास बात ये है कि जनता के नुमाइंदे जनता से मिलने से भी डर रहे हैं। कश्मीर को एेसे नेताआें की जरूरत नहीं है जो विपक्ष तक ही उनके साथ रहें, बल्कि कश्मीर को एेसे नुमाइंदाें की जरूरत है जो सत्ता में आने पर भी उन्हें भुला न दें। 

- अभिषेक

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

गोरक्षकों, किसी को पीटकर आप ज्यादा धार्मिक नहीं हाे जाएंगे


जयपुर की हिंगोनिया गौशाला में 500 से ज्यादा गायों ने दम तोड़ दिया है। इस खबर ने गायों को लेकर देश में एक नई बहस छेड़ दी है। गायों की तस्करी को लेकर हल्ला मचाने वाले लोग चुप हैं। ये चुप्पी इतनी घनी है कि कहीं कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नजर नहीं आया आैर न ही नजर आए वे गोभक्त जो अपनी दुकानदारी गाय की भरोसे चला रहे हैं। 

गायों की रक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों की पिटाई करने वाले गोरक्षक दल भी इस मामले में अभी तक कोई विरोध नहीं जता रहे हैं। पिछले दो सालों में गो रक्षक दलों की जैसे बाढ आ गई है। छोटे-छोटे गांवों और कस्बों में गोरक्षक दलों के लोग आपको मिल जाएंगे। गायों की रक्षा के लिए ऐसे लोग कितने सतर्क हैं, इसकी बानगी हिंगोनिया गोशाला में 500 से ज्यादा गायों की मौत के मामले से पता लगती है। जहां गायें भूख और दलदल में फंसकर चारे-पानी के अभाव में दम तोड़ देती हैं और कोई गोरक्षक उन्हें बचाने नहीं आता। 

इस मामले में मैंने एक गोरक्षक से जानना चाहा तो करीब आधे घंटे तक उन्होंने अपनी बात रखी। मैंने पूछा कि हमने सुना है कि गोरक्षक गायों की तस्करी रोकते हैं, गायों की रक्षा के लिए और ऐसे कौनसे काम हैं जिन्हें गौरक्षक करते हैं। इस सवाल के जवाब में उन्होंने सिर्फ एक काम और बताया। उन्होंने कहा कि उनका काम गायों की तस्करी को रोकना और घायल गायों को चिकित्सा मुहैया कराना है। मैंने हिंगोनिया गौशाला को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा था लेकिन उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी प्रतिक्रिया देने में देर नहीं की। इसका कारण मेरा मीडिया में होना और एक दिन पहले ही अन्य मीडिया संस्थान से उनके पास आए फोन काॅल के बाद शायद वे ये उम्मीद कर रहे थे कि मैं भी उनसे ऐसा ही कोई सवाल पूछने जा रहा हूं। 

मेरे द्वारा सवाल पूछने से पहले ही उन्होंने हिंगोनिया पर अपनी सफाई देनी शुरू कर दी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हिंगोनिया में गायों की मौत के मामले में गोरक्षक जिम्मेदार नहीं हैं, ये नगरनिगम की जिम्मेदारी है। नगरनिगम के भ्रष्ट अफसर गायों की सुध नहीं ले रहे हैं। उन्होंने गायों की तुलना मांओं और बहनों से की। उन्होंने बताया कि कैसे उन पर तीन बार गोलियां चलाई गई। कैसे उन पर ट्रक चढ़ाने का प्रयास हुआ। कैसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से गाय की हत्या करने वाले एक व्यक्ति को पकड़वाया और कैसे अब वह व्यक्ति सजा का इंतजार कर रहा है?

उनकी मीडिया के प्रति नाराजगी भी साफ नजर आई। उन्होंने कहा कि बुरा मत मानिएगा मीडिया लगातार कह रहा है कि हिंगोनिया में गाएं मर गई गोरक्षक दल क्या कर रहा है। ये जिम्मेदारी हमारी नहीं है। बात शुरू हुई तो नगरनिगम से थी लेकिन राज्य और केन्द्र सरकार से होती पिछली कांग्रेस और फिर प्रधानमंत्री के स्तर तक भी जा पहुंची। उन्होंने राज्य और केन्द्र सरकार की भी जमकर खबर ली और कहा कि गायों की रक्षा के लिए उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा सरकार आएगी तो कुछ अच्छा होगा, लेकिन हुआ उसका उलटा गायों के मांस का एक्सपोर्ट बढ़ गया। वहीं कांग्रेस के वक्त गाय के मांस का निर्यात कम था हालांकि उन्होंने कांग्रेस को एक विशेष धर्म की सरकार बताया और कहा कि वो आएंगे तो गाय के मांस के निर्यात में कमी आ जाएगी ऐसा सोचना ही गलत है। साथ ही पीएम की तारीफ में उन्होंने कई कसीदे पढ़े और उनसे सहानुभूति जताते हुए कहा कि एक अकेला आदमी सबकुछ कैसे कर सकता है? (ये बातचीत प्रधानमंत्री के गोरक्षा पर आए बयान से पहले की है। ) हालांकि इसके दो-तीन दिन बाद ही पीएम का गोरक्षा पर बयान आता है। इसके अगले दिन वो एक खबर के लिए मुझे फोन करते हैं और कहते हैं कि पीएम के विरोध में नारेबाजी होगी, पीएम मोदी हाय-हाय के नारे लगेंगे, किसी को भेज दीजिए। 

गायों के नाम पर हमारे देश में गोरक्षा के नारे हैं, तस्करी रोकने की बाते हैं, छोटे-मोटे प्रदर्शन हैं लेकिन नहीं है तो कोई गायों की सुध लेने वाला नहीं है। जिस राजस्थान की हिंगोनिया गौशाला में पिछले ढाई सालों में 27000 गायें दम तोड़ देती हैं, उनके लिए आवाज उठाने के लिए कोई आगे नहीं आता है। हालांकि प्रदेश से देश तक ये बात मीडिया के जरिए पहुंचती है तो जरूर थोड़ी हलचल होती है, लेकिन छुटभैया नेताओं के प्रदर्शन से कुछ बदलने वाला नहीं है।

मेरी गोरक्षकों से गुजारिश है कि गो तस्करों को पकड़कर पीटने की अपेक्षा अगर वे गायों के लिए कुछ करना ही चाहते हैं तो अपने घरों में गायों को पालें। यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो कम से कम गायों के लिए कुछ चारे पानी की ही व्यवस्था कर दें। किसी को मार पीटकर ही गायों की सेवा की जा सकती है ऐसा नहीं है। गायों के लिए चारे-पानी और इलाज की व्यवस्था कर देंगे तो भी किसी को पीटकर धार्मिक कहलाने की अपेक्षा कहीं ज्यादा धार्मिक नजर आएंगे। 

- अभिषेक

सोमवार, 1 अगस्त 2016

इरोम शर्मिलाः नर्इ पारी में अनशन खत्म होगा, AFSPA का विरोध नहीं


इतिहास खुद को नहीं लिखता, इतिहास को लोग लिखते हैं और वो भी अपने कामों से। 9 अगस्त का सूरज जब क्षितिज की तन्हाइयों को छोड़कर निकलेगा तो उमंग और उत्साह से भरा होगा। सिर्फ इसलिए कि वो नया इतिहास बनते देखेगा, 16 सालों के संघर्ष के बाद वो संघर्ष के तरीकों को बदलते देखेगा, अनशन को राजनीति में बदलते देखेगा, वो एक आम महिला से संघर्ष की जीती जागती मिसाल बनने वाली उसे महिला केा देखेगा जो 16 सालों की अग्नि परीक्षा में कभी निस्तेज नहीं पड़ी, कभी उस अग्नि से डरी नहीं। इतिहास 9 अगस्त को इरोम शर्मिला को अनशन समाप्त करते देखेगा। 

इरोम ने अपने अनशन को समाप्त करने के लिए 9 अगस्त का दिन चुना है। इरोम ने ये दिन क्यों चुना है ये बेहतर ढंग से तो वही बता सकती हैं, लेकिन 9 अगस्त का दिन आजादी की लड़ाई का वो दिन है जब भारत ने अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए पूर्ण रूप से कह दिया था। 9 अगस्त 1942 का दिन भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत का दिन था। इरोम का 9 अगस्त को अनशन समाप्त करने का निर्णय किसी भी और दिनों की तरह ही है या फिर उनकी मंशा मणिपुर में एेसे ही आंदोलन को जिंदा करने की है। भारत छोड़ो आंदोलन में गांधीजी ने नारा दिया था कि करो या मरो। क्या इरोम अपने संघर्ष को इस स्तर तक ले जाने का इरादा रखती हैं। 16 साल के संघर्ष में उन्होंने संघर्ष की जिन बुलंदियों को छुआ है वो अद्वितीय है लेकिन क्या राजनीति में रहते हुए वो ऐसा कर पाएगी? 

इरोम का विरोध सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून 1958 यानी अफस्पा के खिलाफ है। 1 नवम्बर 2000 को सैन्यबलों ने जब मणिपुर में 10 लोगों को मार गिराया तो इसके बाद इरोम ने अपना सत्याग्रह शुरू किया। आज तक इरोम पुलिस गिरफ्त में एक अंडर ट्रायल कैदी है। इंफाल के जवाहरलाल नेहरू इंस्टीटयूट आॅफ मेडिकल साइंस में एक कमरा उनके लिए है, जहां उन्हें जबर्दस्ती नाक से खाना दिया जाता है। उन पर आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा चल रहा है। इन सारी चीजों के बावजूद वे आज भी संघर्ष कर रही हैं। 9 अगस्त को अनशन छोड़ने के निर्णय को लेकर लगता है कि जैसे भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त पूरे भारत से आवाज उठी थी कि अंग्रेजों भारत छोड़ो वैसी ही आवाज वे मणिपुर में अफस्पा के विरोध में उठाना चाहती हैं। उनकी नर्इ पारी में अनशन जरूर खत्म होगा, लेकिन अफस्पा का विरोध नहीं। 

1980 से अफस्पा का दंश झेल रहे मणिपुर के हितों की बात करने वाली इरोम ने अनशन छोड़ते हुए कहा है कि उन्हें सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। यहां ध्यान देने की बात ये है कि पिछले करीब 36 सालों में किसी एक दल की सरकार नहीं रहीं। सरकारें बदलती रहीं लेकिन उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। इरोम के अनशन को आम आदमी ने सम्मान जरूर दिया लेकिन सरकारों ने कोई सकारात्मक पहल की हो ऐसा नजर नहीं आता। 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनशन को विरोध का सबसे असरदार हथियार माना जाता है, लेकिन इरोम के अनशन को तवज्जो न मिलना इस बात का संकेत है कि सरकारें उन मामलों को ऐसे ही छोड़ देती हैं जिन पर मीडिया में एक समय के बाद हल्ला मचना कम हो जाता है। इरोम का मामला हर साल आने वाली एक बरसी की तरह था जब हर साल कुछ इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में छोटी सी एक खबर दिखाई पड़ जाती थी कि आज इरोम के अनशन को इतने साल हो गए हैं। इससे ज्यादा उनके लिए इरोम का कोई वजूद नहीं है। 16 सालों तक अनशन करने वाली इरोम की खबरें अजब-गजब जैसे सेक्शनों में नहीं लगी ये भी गनीमत ही है। 

इरोम अपनी नई पारी शुरू करने जा रही हैं। वो कहती हैं कि राजनीति में कदम रखूंगी, शादी करूंगी। ये साबित करता है कि संघर्ष में भी मोहब्बत छिपी होती है। अफस्पा के खिलाफ संघर्ष ये दर्शाता है कि उन्हें मणिपुर और मणिपुर के लोगों से कितनी मोहब्बत है तो व्यक्तिगत जिंदगी में भी एक शख्स से मोहब्बत का असर है कि वे तमाम तकलीफों के बावजूद शादी करने जा रही हैं। इरोम के 16 साल लम्बे संघर्ष के लिए सलाम और भविष्य के संघर्ष के लिए शुभकामनाएं। वो राजनीति में कदम रखने जा रही हैं तो एक दुआ भी है कि वो संघर्ष में तपकर निकले नेताओं की तरह न निकले जो अपने संघर्ष को बोते गए और हर साल फसल की तरह राजनीतिक मुनाफा काटते गए। 

- अभिषेक

सोमवार, 25 जुलाई 2016

आज भी वो इंसाफ मांग रहे हैं आैर इंसानियत मुंह छिपा रही है

‘भगवान के घर देर है अंधेर नहीं‘, हमने अक्सर ये सुना है लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम के किसी भी सिरे को पकड़कर आप आगे बढ़ना शुरू कर दें आपको अंधेरा ही अंधेरा नजर आएगा। एक बड़े पेड़ के गिरने के बाद धरती इतनी जोर से भी नहीं हिलती की सारी इंसानियत गर्त में समा जाए, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों को मार देने की अंधी दौड़ इस कदर इंसानियत पर हावी हुई कि उस मंजर को सुनकर-पढ़कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।

देश के तत्कालीन गृह मंत्री को जूता मारकर (हालांकि जूता लगा नहीं था) चर्चा में आए पत्रकार जरनैल सिंह की किताब ‘कब कटेगी चौरासी-सिख कत्लेआम का सच‘ उन तीन दिनों के कत्लेआम को बयां करती हैं। 31 अक्टूबर 1984 से 2 अक्टूबर 1984 के उन तीन दिनों में कैसे दंगाई एक के बाद एक सिखों की लाशें बिछाते रहे? कैसे औरतें अपने पति, पिता और बच्चों को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखती आैर क्रंदन करती रहीं? कैसे दंगाई और पुलिस में कोई भेद ही नहीं रह गया था? कैसे घायल सिखों को आग के हवाले कर हत्याओं को भी क्रूरतम बना दिया गया? इन सारे सवालों के जवाब ये किताब देती है। जहां किताब को पढ़ते हुए आपको लगता है कि कैसे एक दंगा पूरी दुनिया केा आपसे बेगाना कर देता है, ऐसा लगता है कि दुनिया में अब आपका कोई नहीं है। जैसे पूरी दुनिया ने आपको मरने के लिए दंगाइयों के सामने छोड़ दिया है। हर दंगाई किसी का बेटा, भाई, पति होता है लेकिन दंगा करते वक्त एक हत्यारा ही रह हो जाता है।

पुलिस थी या दंगाई 
जरनैल सिंह अपनी किताब में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं। वे बताते हैं कि आईएएस अधिकारी कुसुमलता मित्तल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में एक पुलिस अधिकारी को 'जीवित शर्म' लिखा तो दूसरे को दिल्ली पुलिस के चेहरे पर 'बदनुमा दाग' करार दिया। ये वही पुलिस अधिकारी थे जिन्हें दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाया गया था लेकिन ये दंगाइयों के ही मददगार साबित हुए। इस किताब में पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह के हवाले से बताया गया है कि देश की राजधानी में इतना बड़ा दंगा पुलिस की मदद के संभव ही नहीं है। उनके अनुसार यदि पुलिस ने थोड़ा सा भी बल का इस्तेमाल किया होता तो दंगाई इतने बड़े कत्लेआम को अंजाम ही नहीं दे पाते। इस दंगे का सबसे घृणित पहलू ये है कि दंगाइयों से जब कोई घर या इलाका फतह नहीं हुआ तो उन्होंने पुलिस को बुलाया। लोगों को मारने, उनके घरों को लूटने में जब वे नाकामयाब होते तो पुलिस को गुहार लगाते और पुलिस कत्ल और लूट में हिस्सेदार बन जाती।

राजनेताओं पर सवाल 
सिखों के कत्लेआम के बाद करीब 30 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन जिन बड़े नेताओं पर आरोप लगे वे आज भी अपना दामन बचाए चैन की बंसी बजा रहे हैं। ये उन सैंकड़ों विधवाओं के दर्द को और बढ़ा देता है जिन्होंने उस खूनी मंजर के बाद अपनी जिंदगी को यूं बुझते देखा है। कांग्रेस के बड़े नेताआें के खिलाफ इतने सुबूतों आैर गवाहों के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ पाती है। ये देश की न्याय व्यवस्था के साथ क्रूरतम खिलवाड़ सा लगता है।

अफवाहों को गर्म रखा गया
सोशल मीडिया के इस दौर में जब हमें कश्मीर की हालत देखकर इसके खतरे समझ में आ रहे हैं। हम उस दौर में उड़ने वाली अफवाहों से पैदा होने वाली नफरत को समझ सकते हैं। कानपुर में सिखों से लोगों की हमदर्दी न हो जाए इसलिए ऐसी अफवाहें फैलाई गई कि सिख फौजियों ने पास के गांवों के लोगों को गोली मार दी है। अफवाहों के ऐसे बाजार उस दौर में पूरे देश में सजे थे जिनका एक ही मकसद था सिखों के प्रति हमदर्दी और विश्वास को वातावरण न बन सके। आज के दौर में जब अफवाहें इतनी तेजी से हमारे दिलों में जहर भर देती हैं तो उस दौर का अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल नहीं है।

जरनैल सिंह चिदंबरम पर जूता फेंकने को अभूतपूर्व अन्याय के खिलाफ अभूतपूर्व विरोध कहते हैं। हालांकि अपने इस कृत्य को वे गलत जरूर मानते हैं लेकिन मुद्दा सही उठाने की बात कहते हैं। उनकी किताब के शुरूआती कुछ पन्ने पलटने के बाद आप सिखों के साथ हुए उस अन्याय से रूबरू होते हैं, जिनमें दंगार्इ हाथ में वोटर लिस्ट लिए सिखों का कत्लेआम करने पर तुले थे। एक आम आदमी के लिए ये सोचना भी दिल दहला देने वाला है कि कैसे सिखों को सरियों आैर लाठियों से पीटा जाता आैर फिर उनके गले में टायर डालकर जिंदा जला दिया जाता। ये आम आदमी की प्रतिक्रिया हो ही नहीं सकती। ये सुनियोजित षड़यंत्र था जो आज भी हमारी न्याय प्रणाली को दूर से देखकर हंस रहा है।

इस मामले में बहुत कम लोगों को सजा हुर्इ है, वो भी एेसे लोगों को जिनके कंधे पर बंदूक रखकर चलार्इ गर्इ आैर फिर उनके रहनुमा बनने का दावा करने वालों ने किनारा कर लिया। तड़प-तड़प कर जान देता हर सिख जैसे आज भी अपने लिए न्याय की गुहार लगा रहा है, उनकी विधवाएं आैर बच्चे अपनों के लिए इंसाफ को पुकार रहे हैं आैर एेसा लगता है कि इंसानियत शर्म से मुंह छिपा रही है।


- अभिषेक

बुधवार, 20 जुलाई 2016

'तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है'


हम अक्सर ये सुनते हुए बड़े हुए हैं कि फिल्में समाज का आईना है। हालांकि मैं पूरी तरह से इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। एक फिल्मकार अपनी फिल्म में क्या दिखाना चाहता है। ये उस पर निर्भर करता है। फिर वो फिल्म में समाज से जुड़ी समस्या दिखाए, अंतरिक्ष की कहानी दिखाए या कुछ असाधारण या फिर कोर्इ बकवास। हां, मैं ये जरूर मानता हूं कि कभी-कभी कोई फिल्मकार हमारे अंतर्मन को फिल्म की शक्ल में जरूर सामने रखता है। ये भी एक अपवाद की तरह ही होता है लेकिन जब होता है तो उस चीज को भुला देना असंभव होता है।

आजकल एक फिल्म के कुछ दृश्यों को भुला नहीं पा रहा हूं, मैं जितना उन दृश्यों को देखता हूं स्वयं को एक अलग ही दुनिया में पाता हूं। बहुत संभव है कि ये हाॅलीवुड फिल्म किसी क्लासिक फिल्म की श्रेणी में न सम्मिलित हो लेकिन ये मेरे दिल के जरूर करीब है। ये फिल्म है ‘द लास्ट समुराई‘। फिल्म के कुछ दृश्य ऐसे हैं जिन्हें भूलना असंभव है। खासतौर पर जब आप जीवन और मृत्यु की बहस को किसी चर्चा में और लंबा खींचते रहे हैं। फिल्म के आखिरी कुछ दृश्य जो कर देते हैं वो दूसरी कुछ फिल्मों के बस की बात नहीं है।

फिल्म में दो मुख्य किरदार हैं। एक है कात्सोमोटो, जिसे बखूबी निभाया है केन वाटनबे ने और दूसरा किरदार नाथन एलग्रिन का है जिसे अभिनेता टाॅम क्रूज ने नर्इ ऊंचाइयां दी है। फिल्म के एक संवाद में टाॅम क्रूज से पूछा जाता है कि ये बताइए कि वो कैसे मरे थे? टाॅम क्रूज का जवाब होता है ‘ये सुनिए वो जिए कैसे थे?‘ हमेशा मरने वाले की मौत का कारण जानने में हमारी दिलचस्पी होती है, लेकिन मरने वाले ने अपनी जिंदगी कैसे जी? ये पूछना हम हमेशा भूल जाते हैं। शुरूआती दौर में जब मेरे पिता मुझे खबर लिखना सिखाते थे तो एक दिन मैंने एक बार ‘मृत्यु‘ को ‘मृत्यू‘ लिख दिया था। उस वक्त उन्होंने मुझे टोकते हुए कहा था कि मृत्यु बहुत छोटी बात है हर किसी को आनी है मात्रा छोटी आएगी। ‘द लास्ट समुराई‘ भी हमें यही सिखाती है। मृत्यु तो जिंदगी का एक हिस्सा है और हम हमेशा मृत्यु की बात करते हैं, जिंदगी को भूल जाते हैं।

फिल्म के एक दृश्य में समुराई अपनी तलवारों और दूसरे परंपरागत हथियारों से लैस होकर बंदूकधारी सैनिकों से टकरा जाते हैं। दिमाग वालों के लिए ये मूर्खता है और दिलवालों के लिए अपने आदर्शों के लिए बलिदान हो जाना। लड़ने वाले हर समुराई को पता होता है कि उन्हें मरना है, लेकिन जब आप सही हों तो अपनी बात के लिए लड़ना और मर जाना भी सम्मान है। एक-एक कर ढेर होते समुराई और उन पर गोली चलाते बंदूकधारी सैनिकों को देखकर ऐसा लगता है मानो गोलियां आपका हदय भेदकर निकल रही हों।

आखिर में जब सारे समुराई वीरगति को प्राप्त होते हैं या फिर घायल अवस्था में वीरगति का इंतजार करते हैं उस वक्त गोली चलाने वाले एक सैनिक का दिल पसीजता है और वो उन महान योद्धाओं को सम्मान देने के लिए घुटनों पर बैठकर अपने दुश्मनों के सामने नतमस्तक हो जाता है। धीरे-धीरे हर सैनिक को ये अहसास होता है कि जिन्हें वे ढेर कर चुके हैं असली योद्धा तो वे थे। हर सैनिक घुटने पर आता है और उन महान योद्धाओं के सम्मान में नतमस्तक हो जाता है। एक योद्धा के लिए उस मौत से बढ़कर और क्या हो सकता है जब दुश्मन उसे झुककर सम्मान दे। आदर्शों के लिए बलिदान हो जाने वालों के लिए हर किसी के मन में सम्मान होता है। कात्सोमोटो, नाथन से कहता है कि तुमने अपनी खोर्इ इज्जत पा ली है आैर मुझे इज्जत से मरना है। कात्सोमोटो को इज्जत की वो मौत नसीब होती है जिसका ख्वाब उसने हमेशा देखा था।

आखिर में जापान के राजा को अपनी गलती का अहसास होता है। परंपराआें आैर नवीनता के द्वंद्व के बीच उन्हें लगता है कि उन्हाेंने संगठित जापान का जो सपना देखा था वो अपनों की कीमत पर नहीं हो सकता। राजा कहते हैं कि हमारे पास चाहे कुछ भी हो लेकिन हमें ये भूलना नहीं चाहिए कि हम कौन हैं? हमें भी हमेशा ये याद रखना चाहिए।

- अभिषेक

शनिवार, 16 जुलाई 2016

मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा

आसमां का सीना चीर के निकलूंगा
दुनिया वालों तुम्हारा मुंह नोच के निकलूंगा
मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा, मैं निकलूंगा
दुश्मनों की महफिल से सीना ठोक के निकलूंगा

हजार शिकायतें दोस्तो की हैं
हजारों तलातुम दुश्मनों ने खड़े किए
मगर सुनलो अ दुनियावालों
सीना ए कुहसार पर कदमताल करके निकलूंगा

इस हाले जार में जीने दो,
मुझे खुद्दार बनके जीने दो
मेरे गैज को न दो आवाज
किसी रोज बेदाद बनके निकलूंगा

दीवानों की दुनिया है
आसमां भी हम अपना बना लेंगे
रोक के देख अ दुश्मन मुझे
तूफाने हवादिस में साजे जीस्त बनके निकलूंगा

किसी उक्वा के लिए जीने वाले
मेरे हमदम कोई और होंगे
सुनलो अ नुक्ताचीनों
जमीं पर मुकद्दस शमशीर बनके निकलूंगा।

पहली ही इश्रत में तुमने
सारे अहसानों को बहा डाला
गौर से सुनलो अहरमन हूं,
जख्म के बाद तबस्सुम बनके निकलूंगा।

- अभिषेक


तलातुमः तूफान, सीना ए कुहसारः पर्वत की छाती पर, हाले जारः दरिद्र दशा, गैजः क्रोध, बेदादः अत्याचार, तूफाने हवादिसः दुर्घटनाओं के तूफान में, साजे जीस्तः जीवन संगीत, उक्वाः परलोक, शमशीरः तलवार, इश्रतः सुख भोग,अहरमनः शैतान, तबस्सुमः मुस्कुराहट।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

बदरा बरसना भूल गई

गलियों गलियों फिर फिर बदरा
उसका मुखड़ा देख गई
ये देखे या वो देखे
वो सारी दुनिया देख गई

आग उगलती इस दुनिया में
जलता हुआ नजारा है
झीनी सी चदरिया का आंचल ले
वो सूरज संग खेल गई

बातों की हसरत क्या पूरी हो
वो इक मौसम उसको देखे है
यादों में जीती यादों में ढलती
वो अश्कों से उसको सींच गई

इक दीवानी इक दीवाने संग
हाथ पकड़ यूं चलती थी
मैं देखूं या तू देखे
देख ये बदरा बीत गई

दीवाने का नाम न जाने
ऐसी उलझन पहली देखी
दो पल की इस यारी में
बदरा सारी भीग गई

काली-काली घटा उमड़ती
देख दीवाना डोल गया
भर-भर पानी कोई उलीचे
और बदरा बरसना भूल गई


- अभिषेक

रविवार, 10 जुलाई 2016

मोहब्बत, मौसम, मौसम विभाग...भरोसे के लायक कोई नहीं

हमारे देश में मोहब्बत से बड़ा कोई ट्रेंडिंग टाॅपिक नहीं है। हर छत पर मोहब्बत खड़ी है और सड़क से कोई इश्क उसे निहार रहा है। बस इंतजार उसके मुकम्मल होने का है। मोहब्बत का मुकम्मल हो जाना यहां कोई खेल नहीं है। लाखों पापड़ बेलिए और मोहब्बत की आस, आस ही रह जाए किसे पता? ऐसा ही कुछ हाल मौसम विभाग का भी लगता है। छत पर खड़े होकर बादलों का इंतजार करते रहिए या फिर मानसून आया कि नहीं पता करने के लिए अखबारों के पन्ने पलटते रहिए या न्यूज चैनल्स के लिए रिमोट को दबाते रहिए। फिर भी मौसम का मिजाज कब बदलेगा, कब मानसून आएगा, एेसे सवालों का जवाब मिलना मुश्किल है।

इस मामले में मोहब्बत और मौसम विभाग की राशि एक है, सिंह राशि। बात जब सिंह की हो तो कौन क्या कह दे? मोहब्बत हो जाए तो कौन है जो मोहब्बत करने वालों को रोक लें। मौसम विभाग वो जो मानसून की कभी भी भविष्यवाणी कर दें। हालिया दिनों में मौसम विभाग ने जयपुर के मानसून को लेकर तीन भविष्यवाणियां की है। तीनों की तीनों भविष्यवाणियां झूठी निकली। अब लोगों को इंतजार चौथी भविष्यवाणी का है। हालांकि लोगों के लिए ये चौथी भविष्यवाणी पत्थर की लकीन हो ऐसा नहीं है। कुछ लोगाें के लिए मौसम की भविष्यवाणी का अर्थ वही नहीं होता जो मौसम विभाग कहता है। उनके लिए मौसम की भविष्यवाणी का अर्थ उसके बिल्कुल विपरीत होता है। जैसे जयपुर में आज भारी बारिश की चेतावनी का अर्थ कुछ लोगों के लिए तेज गर्मी से होने वाली परेशानी है।

अब थोड़ी सी बात मोहब्बत की। मौसम और मौसम विभाग की ही तरह मोहब्बत पर भरोसा करना भी ठीक नहीं है। ब्रेकअप, पैचअप के इस दौर में मोहब्बत का असली मजा फीका सा लगता है। एक शाम प्यार परवान चढ़े, दूसरी शाम डेट घटे और तीसरी शाम होते-होते अमेरिकन सिस्टम टीटीएमएम पर चलें यानी तू तेरे और मैं मेरे। इसलिए मोहब्बत की सोहबत में आजकन न हीर आती है और न ही रांझा दीवाना हुआ फिरता दिखाई देता है। मोहब्बत में जब तक आदमी की इज्जत का जनाजा न निकले तब तक क्या मोहब्बत की।

खैर मोहब्बत तो यूं भी एक बगावत है जिसे रोकना न तो मोहब्बत करने वाले के बस की बात है और न ही इसका विरोध करने वालों के बस में। हां, ये मसला मौसम विभाग के साथ भी कुछ ऐसा ही है। बादलों की कहानी धरतीवासियों को बताने का जरिया मौसम विभाग अगर कुछ गलत कह दे तो उसे ऊपरी चक्कर समझकर भूल जाइए। ऊपरी चक्कर न आपको समझ आएगा और न ही ये चक्कर मौसम विभाग के पल्ले पड रहा है। मानसून के बारे में मौसम विभाग की गलतियों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। अब जब आपके पास पल्ला झाड़ने के लिए कुछ हो तो फिर शिकायत की भी गुजाइश कहां है। ये हाल मौसम विभाग का है। बस इसीलिए मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर ज्यादा गौर न करें और सबकुछ ऊपर वाले पर छोड़ दें। मोहब्बत में सारे जहां से पिटे आशिक की तरह।

- अभिषेक

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

जाआे पहले वो किताबों की आलमारी हटाओ

कदम जब जमने लगे
दूसरे जब आवाज समझने लगे
वो गिनती सुनाने लगे
मुस्कुराहट,
गुस्सा,
प्यार,
जिद,
हर रोज उस पर उतरने लगे
उस रोज खबरदार हो जाना
तुम उस रोज घर को सजाना
ध्यान रखना और
वो आलमारी हटा देना।

बच्चों के लिए खतरनाक है वो आलमारी
जहां रखी है किताबें ढेर सारी
पृष्ठों को एक दूसरे से उलझने दो
अंदर ही अंदर
एक अध्याय को खत्म
दूसरे को शुरू होने दो
तर्क को ताले में कैद करो
दिमाग को खर्च मत होने दो
क्योंकि अच्छी बातें
किसी और के लिए रहने दो।

जाआे उन्हें अय्यारी सिखाओ
मक्कारी सिखाओ
और पोटलियां बनाओ
ज्ञान की,
तर्क की,
हास्य की,
खुशी की,
और बहुत दूर ले जाओ
क्योंकि
इस जहां के लिए जरूरी है जो
अपने बच्चों को वही सिखाओ
जाओ पहले वो किताबों की आलमारी हटाओ।

- अभिषेक

शनिवार, 2 जुलाई 2016

आप में भी है एक 'इन्द्र', बस जरूरत है नजरिया बदलने की

सृष्टि को खोजना मनुष्य के बस में नहीं है। हालांकि ये कोशिश बदस्तूर जारी है। आदमी जैसे-जैसे एक के बाद एक खोज मुकम्मल करता है, नई-नई खोज उसके दिलो दिमाग पर दस्तक देने लगती है। कभी ईश्वर को खोजना, उसे पा लेना इंसान के लिए मुश्किल था। अब लगता है कि क्या धीरे-धीरे इंसान उसे खोजने की ओर बढ़ रहा है? खोज लेना और खोज को मुकम्मल कर देना दो अलग-अलग बात है। दोनों में जमीन और आसमान जितना फर्क है। बहुत संभव है कि ये फर्क कभी न मिटे, लेकिन एक यात्रा के दौरान मुझे ये फर्क जरूर मिटता लगा है।

हिन्दू धर्म में खासतौर पर आर्य संस्कृति में इन्द्र को एक प्रमुख देवता के रूप में स्थान दिया गया है। खासतौर पर देवलोक के प्रिंसिपल के तौर पर इन्द्र की उपस्थिति टीवी सीरियल्स में बदस्तूर नजर आती है। हम जब जमीन से आसमान की ओर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि इन बादलों के परे कोई जगह जरूर होगी जहां स्वर्ग होगा, जहां देव होंगे, जहां इन्द्र होंगे। हालांकि जब से आदमी ने बादलों का घेरा तोड़कर अपने वायुयानों को वहां पर दौड़ाना शुरू किया है तो ऐसा लगता ही नहीं है कि यहां पर कहीं इन्द्र होंगे।

इन्द्र और देवलोक की कल्पनाएं दुष्कर को देव मानने की परिपाटी को बयां करती हैं। हम जिस चीज को छू नहीं सकते, उसके बारे में पता लगाना जब हमें असंभव लगता है तो उसे हम अलौकिक मान लेते हैं और देव के रूप में स्थान देते हैं। बादलों के पार स्वर्ग के सिंहासन पर आरूढ इन्द्र भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ाते हैं। हालांकि जब आप स्वयं किसी वायुयान में बैठकर बादलों के पार स्वयं को पाते हैं तो आपको लगता है कि इन्द्र और देवलोक की जो कल्पनाएं टीवी सीरियल्स आपके मन में बैठाते हैं वो एक तरह से ठीक भी है। इन कल्पनाओं में आपको स्वयं के इन्द्र होने का अहसास होने लगता है।

देवलोक में इन्द्र और उसके साथ में बैठे सभासदों के कल्पनाओं के घोड़े की अगर आप वायुयान में बैठे लोगों के साथ तुलना करें तो आप पाएंगे कि आप खुद ही इन्द्र हैं। एक कदम और आगे बढ़ाएं तो फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में आपको अप्सराएं भी नजर आ जाएंगी। नाम अलग हो सकते हैं लेकिन रंभा, उर्वशी, मेनका की कल्पनाओं का बाजार साकार हो सकता है। कुल मिलाकर ये सब वैसा ही है जैसा की हमारी कल्पनाओं में बरसों से जिंदा है।

आखिर में
स्वयं के इन्द्र होने के विचार को कल्पना समझकर यूं ही उड़ा देना ठीक नहीं है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि देवता होना कोई अलौकिक घटना नहीं है। इस दुनिया में हर आदमी देवता है। बस जरूरत है नजरिया बदलने की। खासतौर पर तब जब हम छोटी-छोटी बातों से निराश हो जाते हैं। ये ऐसा ही है जैसे इन्द्र समय-समय पर राक्षसों से हारकर स्वर्ग के सिंहासन से दूर हो जाते हैं और फिर अपनी सारी शक्तियों को संगठित कर स्वर्ग का सिंहासन फिर से प्राप्त करते हैं।

हमें भी स्वयं पर विश्वास करना सीखना होगा। जब सबकुछ हमारे खिलाफ हो, जब बाजी हम हार जाएं तो ये मत समझिए कि ये आखिरी बाजी है। खुद को इन्द्र समझिए और जीतने के लिए प्रयास करते रहिए।

- अभिषेक

बुधवार, 29 जून 2016

हम भी उनके हमराह हो चले हैं

आज हम भी उनके हमराह हो चले हैं
वो अपनी रजा छुपा और हम गम दबा चले हैं

उनकी भी खता क्या, कुसूर मेरा भी नहीं
दीवानों की किस्मत जो राजे दिल दफन कर चले हैं

दो शाखाओं की दूरी ने हमें मिलने न दिया
अब ये सूखे पत्ते जमीं पर मिलने चले हैं

उनके जाने से हो चला है वीरान सब कुछ
कुछ तो शर्म करो दोस्तो वो और होंगे जो मनचले हैं

खुदा की इबादत की जो हमने सच्चाई बयां की
इश्क को समझाया क्या कि काफिर हो चले हैं

- अभिषेक

मंगलवार, 28 जून 2016

नींद कैसे आएगी ?

काम पर से घर लौट रहा हूं
और
बहुत चिंतित हूं
ना जाने किसने
रास्ते के सारे गडढे भर दिए हैं
अब न झटके लगेंगे
न थकान होगी
और
न कमर अटकेगी
मैं बहुत चिंतित हूं
आखिर
आज रात नींद कैसे आएगी?

- अभिषेक

रविवार, 26 जून 2016

सूखे पत्ते क्यों जलाते हैं लोग

सूखे पत्ते क्यों जलाते हैं लोग
अपनी बात से मुकर जाते हैं लोग

हिम्मत के मायने यहां बहुत छोटे हैं
क्यों पीठ पीछे बात बनाते हैं लोग

इन किताबों को सिरहाने रख सो जाइए
आजकल चापलूसी में बीए कराते हैं लोग

खुली फिजां में घुटता है दम उनका
बंद कमरों में जिंदगी जिए जाते हैं लोग

चरागों से रोशन होती है दुनिया
और अंधेरे के लिए चराग बुझाते हैं लोग

यहां दुश्मनों के लिए बन गई हैं दीवारें
दोस्ती भी ऐसी कि मंदिर-मस्जिद गिराते हैं लोग


- अभिषेक

मंगलवार, 21 जून 2016

मेहरबानी कीजिए और बुद्धू बक्से के ऐसे शोज को चलता कीजिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के अभियान में जुटे थे। उस वक्त उनका एक बयान काफी सुर्खियों में रहा था। मोदी ने उस वक्त कहा था कि भारत को पहले लोग सपेरों के देश के रूप में जानते थे। उस बयान को दो साल का वक्त गुजर चुका है। हम दो सालों में मंगल तक पहुंच चुके हैं, लेकिन हमारे बुद्धू बक्से की सुई सांप-सपेरों के देश में ही अटकी नजर आती है। इस दौर में जो बुद्धू बक्से में दिखाया जा रहा है उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि इस सुई के अटके दौरे को ठीक करना फिलहाल किसी मेकेनिक के लिए संभव नहीं है। तभी तो नाग-नागिन की बात करने वाले डेली सोप्स बुद्धू बक्से में जीवित है और हम उसे लगातार झेल रहे हैं।


डेली सोप्स की भारतीय दुनिया में जब से सास-बहू और लम्बे सीरियल्स का दौर आया है, लगता है कहानी खत्म हो गई है। एक सीरियल जिस कहानी के साथ शुरू होता है वह कहानी अगले कुछ दिनों में खत्म हो जाती है। फिर कहानी के घिसटने का सिलसिला ऐसा शुरू होता है कि थमने का नाम ही नहीं लेता है। एक आदमी कई बार मरता है, कई बार जिंदा हो जाता है। दर्शक आगे क्या के कारण सब कुछ जानते हुए भी सीरियल्स देखता रहता है। इन सीरियल्स की सबसे अनोखी बात ये है कि इसमें काम करने वाले बच्चे पर्दे के अंदर भले ही बच्चे रहते हैं, लेकिन बाहर वे जवान हो जाते हैं। हालांकि एक लड़की, बहू से मां और फिर मां से सास बन जाती है, लेकिन उसमें कोई बदलाव नहीं आता है।


नकली से लगते हैं गांव
एंटरटेनमेंट चैनल्स के कई सीरियल्स गांव और गरीब की कहानी दिखाते हैं, सोशल मुद्दे उठाते हैं, लेकिन सजे धजे गांववालों और हर वक्त मेकअप किए गांव के लोगों को देखना अजीब सा लगता है। घर इतने रंगीन नजर आते हैं कि मन करता है कि काश ऐसा घर हमारा भी हो। कई तरह के सामाजिक सरोकारों से जुड़ुे मुद्दों की दुहाई देने वाले सीरियल्स में सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे कब गौण हो गए पता हीं नहीं चलता है।

भूतिया सीरियल्स की है बाढ़
कल्पना कीजिए कि आपके घर में कोई व्यक्ति मक्खी बन जाए। दर्शकों को बेवकूफ बनाने के लिए सीरियल्स हमेशा कुछ ऐसा करते हैं कि देखने वाला अपना माथा पीट ले। ऐसा लगता है कि दुनिया की सारी समस्याएं, सारा दुख इन सीरियल्स के लोगों के सिर ही है। ऐसे में भूत प्रेत की कहानी कोढ़ में खाज ही लगती है। देखने वाले कैसे इसे झेल लेते हैं भगवान ही मालिक हैं।


इतनी खूबसूरत नागिन देखी है कहीं
एक टीवी चैनल पर इन दिनों नागिन और उसके बदले से जुड़ा एक सीरियल दिखाया जा रहा है। नागिन का प्यार दिखाने के लिए सीरियल में दो खूबसूरत युवतियों को चुना गया। चैनल ने सीरियल में प्यार का तड़का भी जमकर लगाया और इसे टीआरपी भी जबर्दस्त मिली। बावजूद इसके इक्कीसवीं सदी में नाग-नागिन और भूत प्रेत जैसी बातों पर यकीन करना मुश्किल होता है। साथ ही जिस तरह से इन सीरियल्स को खींचा जाता है ये परेशानी ही पैदा करते हैं।

धूप के साए में छांव भी मिली
टीवी पर एंटरटेनमेंट और सीरियल के नाम पर सब कुछ गड़बड़ है, ऐसा नहीं है। धूप के साए में छांव भी कहीं कहीं नजर आ ही जाती है। एक टीवी चैनल पर कुछ पाकिस्तानी सीरियल को जगह दी गई है। उम्दा कहानी और शानदार एक्टिंग देखनी हो तो ये सीरियल आपकी मुराद पूरी कर सकते हैं। साथ ही इनकी खास बात ये है कि ये कहानी को बहुत लंबा नहीं खींचते और घटनाक्रम इतनी तेजी से घटता है कि आपकी उत्सुकता बनी रहती है।


आखिर में सीरियल देखने वालों से माफी मांगने का दिल करता है क्योंकि वे जिस तरह से इन्हें झेल रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि आप सही हैं और मेरे जैसे ऐसे सीरियल्स के धुर विरोधी गलत। आपका भ्रम बना रहे और मेरा विरोध चलता रहे। मैं ये भी नहीं चाहता, लेकिन इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपको ऐसे सीरियल्स को लेकर विचार जरूर करना चाहिए।

रविवार, 19 जून 2016

नाक

उठी हुई,
सपाट,
चपटी,
तोते जैसी
लहरदार,
फैली हुई
और भी न जाने कैसी-कैसी
होती है नाक।
लेकिन दबे-कुचलों के लिए
हमेशा एक जैसी
होती है नाक।

ये सवाल है नाक का,
तो सुन लीजिए
कुछ और प्रकार है नाक का,
हिटलर,
मुसोलिनी,
ओसामा बिन
अधूरी है नाक
हर चेहरे पर
बदरंग दिल से सजती है नाक।

आप जहां भी जाएंगे
बहुत सी नाक पाएंगे
जैसे कई दिनों से बंद हो तिजोरियों में
आज ही तराशी
और आज ही लगाई हो
जैसे बहुत मेहनत से चेहरे पर सजाई हो।

यहां हर आदमी नाक में नजर आता है
कर्मचारियों से मिलते वक्त,
वो हिटलर की नाक लगाता है
खूब रौब जमाता है
जब कभी गांव जाता है
संवाददाता की नाक हटाकर
संपादक की नाक में आता है
मगर किसी अधिकारी के सामने
वो बेनाक हुआ जाता है।

पूंजी कमाई तो क्या कमाई
जब तक तिजोरियों में नई नाक न जमाई
सारी तिजोरियां भरी हैं
जिनमें नाक ही नाक भरी हैं
किसी पर गुस्सा है
किसी पर गुमान है
हर बात दूसरों के लिए है
खुद का ईमान खराब है
फिर भी नाक का अभिमान है
हर आदमी के गहरे मन में
एक ही चीज भरी है
हर जगह
सड़ी हुई नाक सजी है।

- अभिषेक

शनिवार, 18 जून 2016

गुलबर्ग सोसायटी मामले में सजा का एेलान...पूरा हुआ राम का वनवास



भगवान राम जब 14 साल का वनवास भोगकर अयोध्या आए थे तो लोगाें की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। गुलबर्ग सोयायटी दंगा मामले में फैसला 14 साल बाद आया है। 14 साल बाद आया ये फैसला इंसाफ का वनवास खत्म होने का ऐलान है और अपनों को खो चुके लोगों के लिए मरहम की एक पट्टी भी।


गुलबर्ग सोसायटी दंगा केस मामले में शुक्रवार दोपहर को फैसला आ गया है। जब इस मामले में इंसाफ की राहत बरसी है मैं शाम के धुंधलके में एक और आंधी उठते महसूस कर रहा हूं। बालकनी से सामने का मैदान साफ नजर आ रहा है। मैदान में बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं और हर बात पर झगड़ रहे हैं। बच्चों का धर्म अलग- अलग है, लेकिन ये झगड़ा कोर्इ दंगा नहीं है। यह खेल है। जब ये घर जाएंगे तो इनके कांधों पर दोस्तों का हाथ होगा। हालांकि मेरी चिंता वर्तमान नहीं बल्कि भविष्य को लेकर है जब ये बड़े होंगे, समझदार होंगे। क्या तब भी वे ऐसे ही होंगे? मेरे जैसे लोगों की दुआओं का असर हो और ऊपर वाला करम करे तो शायद ये ऐसे ही हों, यारबाज और एक दूसरे से बेहद प्रेम करने वाले।


अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी दंगा केस मामले में 24 लोगों को सजा सुनाई गई है। इनमें से 11 लोगों को उम्रकैद, 12 को सात साल की जेल और एक दोषी को 10 साल की सजा सुनाई गई है। 69 लोगों की हत्या के मामले में विशेष अदालत ने 64 आरोपियों में से 24 को दोषी माना था। ये मामला 28 फरवरी 2002 का है, जब दंगाइयों ने कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी सहित 69 लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें से मरने वाले ज्यादातर लोगों ने जाफरी के घर पर इस उम्मीद से शरण ली थी कि जाफरी राज्य के जाने-माने नाम है और वे इस संकट की घड़ी में किसी भी तरह संकट से निपट सकते हैं।


इस मामले में बहुत से पीड़ितों के लिए ये फैसला ऐसे दौर में आया है जब वो दंगे की बात नहीं करते, उसे भुलाने की कोशिश करते हैं ताकि रो-रोकर सूख चुकी आंखाें में अब खून न उतर आए। हालांकि दंगे में अपना सबकुछ लुटा चुके लोगों के लिए सबकुछ भुला देना भी आसान नहीं है। वो व्यक्ति जिसके सामने उसके सबसे अजीज लोगों को मार दिया गया हो भला वह कैसे इसे भूल सकता है? इस दंगे का सबसे भयावह पक्ष ये है कि दंगाई चार घंटों तक लोगों को मारते रहे आैर गुलबर्ग सोसायटी के सामने पुलिस खड़ी देखती रही। जब आंखें ठहर गई, जुबां ने विरोध करना छोड़ दिया, सांसों ने धोखा दे दिया तब जाकर कहीं किसी ने सुध ली।


अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी ऐसे इलाके में नहीं है, जहां जिंदगी बचाने की जद्दोजहद चार घंटे ले ले और तब तक 69 जिंदगियां मौत का आगोश थाम ले। अस्पताल से लेकर देश के सैनिकों तक सबकुछ बहुत पास ही था। एहसान जाफरी ने उस वक्त जिससे मदद मिल सकती थी उस हर शख्स को फोन किया लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया। इस मामले में कोर्ट ने 11 लोगों को धारा 302 के तहत दोषी माना है। हालांकि आपराधिक षड़यंत्र की धारा 120बी को कोर्ट ने हटा दिया। ये लम्बे समय बाद आया फैसला है, एेसा लगता है जैसे राम ने वनवास के बाद अपना सबकुछ न सही, कुछ पा जरूर लिया है।


गुलबर्ग सोसायटी दंगा मामले ने देश के दो धर्मों के बीच खाई को और बढ़ाने का ही काम किया है। अविश्वास की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। मेरे घर के सामने खेल रहे बच्चों को देखकर ऐसा जरूर लगता है कि वे इस खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस खाई को और गहरा करने वाले भी इसी देश में मौजूद हैं। भले ही गुलबर्ग सोसायटी दंगा मामले में कोर्ट ने दोषियों को सजा सुना दी हो लेकिन ये भी उतना ही सच है कि बंदर-भालुओं को गले लगाकर और उनकी सेना बनाकर रावण को शिकस्त देने वाले भगवान राम के इस देश में हम हर इंसान को गले लगाने से भी परहेज करते हैं। ये स्थिति बदलनी चाहिए।



और आखिर में...
कोई भी दंगा एक साथ शुरू नहीं होता। उसकी शुरूआत लोगों के दिलों में होती है। दंगाई बनकर लोगों की जिंदगियां फूंकने से बेहतर है अपने दिलों में पैदा होती नफरत को फूंक दीजिए। मैं उन बच्चों को देखकर सोच रहा हूं कि काश उन्हें जमाने की हवा न लगे आैर वो बच्चे ही रहें।

- अभिषेक

शुक्रवार, 17 जून 2016

विदेशियों की देन हैं हिन्दू आैर इंडिया जैसे नाम


कुछ सालों पहले तक गली मोहल्लों की दीवारों पर एक नारा अक्सर दिखाई देता था, मैं हर बार उसे पढ़ता। दीवारों पर लिखे उन शब्दों को देखकर अक्सर ये सवाल जरूर जेहन में उभरते थे कि हिन्दू, हिन्दुस्तान, हिन्दी जैसे शब्द कहां से आए। किसने ये शब्द खोजने की कोशिश की और कैसे ये नाम हर आम ओ खास की जुबान पर चढ़ते ही चले गए। अब आपको वो नारा भी बता देता हूं। वो नारा था- ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान जागे मेरा देश महान।‘

हिन्दू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई? 
एक जमाने में बहुत से लोगों के लिए हिन्दू शब्द किसी धर्म का नहीं बल्कि एक स्थान पर रहने वाले समूह के लिए प्रचलित शब्द था। हालांकि आज के दौर में हिन्दू शब्द को एक धर्म से जोड़कर देखा जाता है। हिन्दू शब्द की पैदाइश को बहुत से लोग मुसलमानों और इस्लाम की देन मानते हैं, लेकिन ये बात सही नहीं है। हिन्दू शब्द की उत्पत्ति इस्लाम के जन्म से भी कई सौ वर्षों पहले ही अस्तित्व में आ चुकी थी। हिन्दू शब्द इस्लाम की नहीं बल्कि ईरानियों की देन है।   

ईरान से आया 'हिन्दु'
ये माना जाता है कि ईरान के लोगों ने सबसे पहले ‘हिन्दु‘ शब्द का उच्चारण किया। इसके पीछे तर्क ये दिया जाता है कि ईरानवासी ‘स‘ शब्द का उच्चारण ‘ह‘ किया करते थे। इस प्रकार से ‘सिन्धु‘ से ‘हिन्दु‘ की उत्पत्ति मानी जाती है, जो कि समय के साथ हिन्दू हो गया और इसे एक धर्म के साथ जोड़ दिया गया। आगे चलकर इसी हिन्दु शब्द से हिन्दुस्तान भी बना।

यूनान से आया 'इंडिया'
ईरानवासियों के उच्चारण के कारण जहां इस देश को हिन्दुस्तान कहा गया। वहीं यूनानियों ने इस देश को एक और नाम दिया। हिन्दुस्तान को मिले एक नाम ‘इंडिया‘ को यूनानियों की देन माना जाता है। इस नाम के पीछे भी उच्चारण की गलती का ही हाथ है। माना जाता है कि यूनानी लोग ‘ह‘ के स्थान पर ‘अ‘ उच्चारित करते थे। यूनानियों ने ‘हिन्दु‘ को ‘इन्दु‘ कहा और आगे चलकर ये नाम ‘इंडिया‘ बन गया। कुछ समय तक भारत को कई लोगों ने ‘इंड‘ भी कहा। दुनिया के कई ख्यातनाम कवियों ने भारत को इसी नाम से संबोधित किया है। आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम ‘इंडिया‘ प्रचलित हुआ।

ह्वेनसांग का भी है नाम पर दावा
भारत के प्राचीन ग्रंथों में हिन्दुस्तान, हिन्दु, हिन्दू जैसे शब्दों का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता है। हालांकि आर्यावर्त या आर्यदेश जैसे संबोधन यहां पर आम थे। हालांकि ये नाम लोकप्रिय नहीं हो सके और समय के साथ भुला दिए गए। इन सबके बीच चीनी यात्री ह्वेनसांग ने हिन्दू शब्द की जो उत्पत्ति बताई है, उस पर भी बहस हो सकती है। ह्वेनसांग का कहना है कि हिन्दू शब्द चीनी शब्द 'इन्तु' से बना है। इसका अर्थ चन्द्रमा होता है। ह्वेनसांग ने ये भी लिखा है कि जैसे हजारों-लाखों सितारों के बीच में चन्द्रमा की प्रतिष्ठित होता है वैसी ही प्रतिष्ठा भारत की है।

दुनिया भर में कुछ ही ऐसे देश होंगे जिनके इतने नाम होंगे। हिन्दू, हिन्दुस्तान, भारत, इंडिया, आर्यावर्त, आर्यदेश जैसे नाम भारत की विविधता और हर अच्छे-बुरे को हृदय में स्थान देने की पवित्र भावना को दर्शाता है। ये नाम सिर्फ इतना चाहते हैं कि दुनिया में इन्हें कभी कोई बदनामी ना झेलना पड़ी।


- अभिषेक


बुधवार, 15 जून 2016

राजनीति तुम्हें 'डियर' कैसे कह दूं



डियर राजनीति,

हम सब यहां पर प्रसन्न हैं और भगवान से तुम्हारी प्रसन्नता की कामना करते हैं। ये कामना इसलिए कि तुम्हें हमेशा अप्रसन्न ही देखते हैं। परमपिता की असीम अनुकम्पा से ये पत्र तुम्हें लिखने का जो मुझे मौका मिला है, उसे मैं अपना अहोभाग्य समझता हूं। ईश्वर से कामना है कि एक बार के लिए ये बहुत ज्यादा है, अब ऐसा कोई पत्र लिखने का मुझे मौका न दें।

तो सुनो डियर राजनीति, तुम इतनी कितनी भोली हो समझ ही नहीं आता? मैं तुम्हें डियर राजनीति तो कह सकता हूं ना। तुम बहुत जल्दी बुरा मान जाती हो, लेकिन मुझे अपना हितैषी समझो और कुछ समझ लो। डियर का एक मतलब हिरण भी निकाला जा सकता है ना, लेकिन हिरण तुम्हें कोई कैसे कह सकता है। मैं माफी मांगता हूं। तुम तो ऐसी हो नहीं सकती हो ना। कैसे हिरण का काम कूदना, उछलना और फिर कभी कभी शिकार बन जाना होता है? इतने सालों से मैं तुम्हें जानता हूं। उछलना कूदना तुम्हें शोभा नहीं देता। ‘डियर राजनीति‘ ये आपकी शालीन छवि पर एक भददा सा दाग जैसा नजर आता है। उछलकूद करते हुए विवादों को जन्म देना तुम्हारा काम नहीं है। बस तुम्हारा काम है विवाद होते देखना। आखिर कैसे तुम डियर हो सकती हो। ना-ना 'डियर राजनीति' नहीं जमता।


‘हां, शिकार करने में आप अच्छी हैं इसके लिए साधुवाद।‘ मैं तो आपको ये भी नहीं कह सकता। सारे इल्जाम आपके पास आते भी हैं तो बच कर निकल जाते हैं तो मैं आपको ये भी नहीं कह सकता हूं और न ही इसके लिए आपको साधुवाद दे सकता हूं।

अब दूसरे अर्थ पर नजरें इनायत करूं तो यहां पर भी आपको निराशा ही हाथ लगेेगी। आपको कोई प्रिय कह दे, कैसे कह दे? आपकी हर बात विवादों से जन्म लेती हैं। आपकी हर बात पर लोगों को कोफ़्त होती है। तो डियर राजनीति जी आप किसी के लिए प्रिय कैसे हो सकती हैं। यूं तो डियर माॅम, डियर फादर जैसे कई संबोधन हैं। पर राजनीति के लिए डियर कौन कहता है।

शुरू में सोचा था कि डियर पर आपको कुछ ऐसा लिखूं कि आपको भी लगे कि डियर ठीक है, इसमें कुुछ गलत नहीं है। पर अब लगता है कि ये डियर दूसरों के लिए ही रहने दें। आप बिना डियर के ही अच्छी हैं।

इस डियर पत्र का जवाब जरूर दीजिएगा।


आपका

....................


(नोटः- इस पोस्ट को किसी भी राजनेता से जोड़कर देखना आपकी भूल है, लेकिन भूल किसी से भी हो सकती है।)



- अभिषेक

मंगलवार, 14 जून 2016

परमाणु बम गिरा क्या?

कहानी


ताऊजी...

ताऊजी...

ताऊजी...


ये रामदयाल के छोटे भाई कृपाशंकर का छोटा बेटा मोहन था। जो लगातार अपने ताऊ को नमक का पानी पिलाने के लिए चिल्लाए जा रहा था। डाॅक्टर ने दो-चार दिन पहले ही रामदयाल को नमक का पानी पिलाने के लिए कहा था।


मोहन ने रामदयाल का सिर थोड़ा सा ऊँचा उठाया और फिर नमक मिले पानी के गिलास को रामदयाल के होठों से लगा दिया। थोड़ी ही देर बाद रामदयाल की चेतना लौट आई।


रामदयाल ने इधर-उधर देखा। उसकी आंखें फैल गर्इ। पिछले दो दिनों से वह एक सवाल लगातार दोहराए जा रहा था। उसने एक बार फिर वही सवाल दोहराया।


‘परमाणु बम गिरा क्या?‘


ये सवाल सुनते ही उसकी छोटी बेटी झुंझला उठी। उसी झुंझलाहट में उसने कहा, 'आपको क्या हो गया है, क्यों दो दिनों से एक ही रट लगा रखी है? कोई परमाणु बम नहीं गिरेगा आप पागल हो गए हो।'


‘अच्छा...‘ रामदयाल ने अपना सीना फुलाया। जैसे किसी बात का बोझ उतार रहा हो।


'रोटी बना ली क्या?' रामदयाल ने पूछा।


'हां, बना ली।' बेटी ने रूखा सा जवाब दिया।


'... तो खाओगे।' रामदयाल ने बेहद धीमे से पूछा।


'अब बनी है तो खाएंगे ही।' बेटी ने जवाब दिया।


'परमाणु बम भी बना है तो गिरेगा ही।' रामदयाल ने कहा और मुंह फेर लिया।


एक बार फिर रामदयाल की चेतना उसका साथ छोड़ रही है।


- अभिषेक

सोमवार, 13 जून 2016

चे ग्वेराः हम तुम्हें कभी भुला नहीं पाएंगे

जन्मतिथि 14 जून पर विशेष




गरीबी और आर्थिक विषमता हर युग में क्रांति का आधार रही है, फिर चाहे वह रक्तरंजित हो या मौन तख्तापलट। युग बदलने के साथ क्रांति के तौर-तरीकों में जरूर बदलाव आता है, लेकिन इसकी मूल भावना ‘शोषण और शोषक का विरोध‘ कभी नहीं बदलती है। सत्ता की तानाशाही और नवउपनिवेशवाद, ये दो प्रमुख कारण थे जिसके खिलाफ क्यूबा में क्रांति का सूत्रपात हुआ। सत्ता परिवर्तन करने वाली इस क्रांति ने दुनिया को वो शख्सियत दी जिसने नवउपनिवेशवाद और पूंजीवाद के शोषण से पूरी दुनिया को स्वतंत्र करने का बीड़ा उठाया। ये वीर गुरिल्ला था-अर्नेस्टो चे ग्वेरा।

14 जून 1928 को अर्जेंटीना के रोजारिया में जन्मे चे ने क्यूबा की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और पूरी दुनिया में उनका चेहरा क्रांति का प्रतीक बन गया। एक गुरिल्ला योद्धा के साथ चे एक डाॅक्टर, लेखक, सामरिक सिद्धांतकार और कूटनीतिज्ञ भी थे। अपनी चिकित्सकीय शिक्षा के दौरान चे ने कई लैटिन अमेरिकी देशों की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने लोगों को भूख और गरीबी से दम तोड़ते देखा। ठंड में कपड़ों के अभाव में ठिठुरते और दवाइयों के अभाव में रोगों से लड़ते देखा। ऐसी परिस्थितियों ने चे को हिलाकर रख दिया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इस गरीबी और आर्थिक विषमता के मुख्य कारण एकाधिपत्य पूंजीवाद, नवउपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद थे और इनसे छुटाकारे का एकमात्र जरिया था-विश्वक्रांति। इसी दौरान ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति याकोबो आरबेंज गुजमान के सुधारों ने चे को प्रभावित किया और वे इनमें भाग लेने लगे। इसके बावजूद अमेरिकी मदद से उन्हें हटा दिया गया। इस वक्त तक चे के विचारों ने पुख्ता शक्ल अख्तियार कर ली थी। इसके कुछ वक्त बाद चे ने फिदेल कास्त्रो से मुलाकात की और क्यूबा की 26 जुलाई क्रांति में शामिल हो गए।

जान क्विंसी आदम ने उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में क्यूबा के बारे में कहा था कि यह द्वीप स्पेनिश शाखा से टूटा हुआ सेब है, जिसे देर सवेर अंकल साम की झोली में ही पड़ना है। अमेरिका ने झोली फैलाई जरूर लेकिन फीदेल कास्त्रो और चे ने उसे इसमें गिरने से रोक लिया। क्यूबा की क्रांति के दौरान चे क्रांतिकारियों की कमान में दूसरे स्थान पर पहुंच गए। दो साल चली इस क्रांति ने बतिस्ता की सत्ता को ध्वस्त कर ही दम लिया। इस दौरान चे गुरिल्ला योद्धा और नेता के रूप में उभरे। चे ने फीदेल कास्त्रो की सरकार में मंत्री पद ग्रहण किया और क्यूबा के समाजवाद के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया।

लक्ष्य विश्ववक्रांति का हो तो एक क्रांति या देश की स्वतंत्रता बहुत छोटी लगने लगती है। क्यूबा की क्रांति के बाद चे ने अपने लक्ष्यों को एक बार फिर साकार करने की कोशिश की। इस बार बोलिविया के किसानों और आम लोगों की दयनीय स्थिति ने चे को प्रभावित किया और वे उन्हें न्याय दिलाने के लिए निकल पड़े। फीदेल कास्त्रो को लिखे अपने पत्र में चे ने सभी पदों के साथ क्यूबा की नागरिकता तक छोड़ने की घोषणा की। ये अद्भुत निर्णय चे जैसा क्रांतिकारी ही ले सकता था। चिकित्सा जैसा सम्मानित और आर्थिक रूप से बेहतरीन पेशा ठुकराने वाले चे ने अन्याय और आर्थिक विषमता के खिलाफ युद्ध चुना। बोलिविया में किसानों की हालत बेहद दयनीय थी। उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जगाने के उद्देश्य से ही चे बोलिविया पहुंचे थे।

कहते हैं डरा हुआ व्यक्ति कभी-कभी बेहद खतरनाक हो उठता है। पूंजीवाद और नवउपनिवेशवाद के धुर विरोधी चे से अमेरिका भयभीत था। उस पर नजर रखी जा रही थी। अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआइए ने चे के कार्याें और उसके अभियानों की एक मोटी फाइल तैयार कर रखी थी। दुनिया में चे की बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन से वह अमेरिका को अपना सबसे बड़ा शत्रु नजर आ रहा था। बोलिविया की सरकार भी इस महान योद्धा के कारण आम लोगों की नजरों में गिरती जा रही थी। चे के खिलाफ सरकार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। फिर 8 अक्टूबर 1967 का दिन भी आया। दुश्मनों ने चे और उसके साथियों को घेर लिया। चे घायल होने पर भी तब तक लड़ते रहे, जब तक की उनकी बंदूक एम-1 की नली दुश्मन की गोली से नष्ट नहीं हो गई। उसके पास जो पिस्तौल थी, उसकी मैगजीन भी गायब थी। यही वे परिस्थितियां थीं, जिनके कारण चे को जीवित पकड़ा जा सका। चे को ला हिग्वेरा गांव ले जाया गया।

राष्ट्रपति और तमाम बड़े अधिकारियों ने विचार-विमर्श के बाद कर्नल आंद्रे सेलिच को ला हिग्वेरा भेजा। उन्होंने करीब 45 मिनट चे के साथ बिताए। इस दौरान चे से जो भी बातचीत हुई वह सेलिच के दस्तावेजों में दर्ज है। सेलिच ने चे से पूछा-तुम क्यूबा के हो या अर्जेंटीना के ?

‘मैं क्यूबा का हूं, मैं अर्जेंटीना का हूं, मैं बोलिविया का हूं, मैं पेरू का हूं, मैं इक्वेडोर का हूं जाने कहां-कहां का हूं, समझ रहे हो ना।‘ चे का यह उत्तर हमें बहुत कुछ समझाता है। हम अपने गांव, जिले और राज्य के लिए मर मिटने की बात करते हैं। देश के लिए मर मिटना और भी सम्मान की बात है, लेकिन पूरी दुनिया के गरीब और असहाय लोगों के लिए बलिदान होने से महान और क्या हो सकता है? इस बातचीत के बाद अमेरिकी सीआइए एजेंट की मौजूदगी में बोलिविया के सैनिकों ने 9 अक्टूबर 1969 को चे की 39 वर्ष की उम्र में गोली मारकर हत्या कर दी।

अमेरिका ने जिस चे ग्वेरा को मिटा दिया उसी की कंपनियां चे की फोटो टीशर्ट, टोपी और अनेक उत्पादों पर छापकर मोटा मुनाफा कूट रही हैं। चे के शरीर को भले ही अमेरिका ने मिट्टी में मिला दिया हो,  लेकिन उनके विचार और मानवता के लिए कुछ करने की अद्भुत प्रेरणा लोगों के दिलो-दिमाग में आज भी पल्लवित हो रही है।

- अभिषेक

रविवार, 12 जून 2016

मतलब

मकान के टूटने का मतलब
आशियां के उजड़ने का मतलब
बुलबुल से पूछकर देखिए
हवा से झगड़ने का मतलब

कुछ आंसुओं का मतलब
दिल का टूटना नहीं होता
घड़ियों ने कब बताया है
वक्त के बदलने का मतलब

नाज है किस बात का
हाल देखा है बहार का
अब तुमको समझाऊं क्या,
उम्र के ढलने का मतलब

पंख टूटने का मतलब
आसमां का छूटना नहीं होता
खुद का मिट जाना है
उम्मीदों के मिटने का मतलब

किससे पूछूं इश्क का मतलब
मैं जानूं या फिर जाने वो
उसके जाने से समझ में आया
खुदा को ढूंढने का मतलब।

- अभिषेक

शाम


दस सालों पहले देखा धुंधलका आज भी छाता होगा?
क्या बच्चे आज भी धूल से सने घर आते होंगे?
क्या गुस्से में पीला सूरज मुस्कुराते हुए लाल होता होगा?
मैं नहीं जानता।

शायद कहीं ऐसा भी होता होगा
लेकिन मेरे शहर में ऐसा नहीं होता
शाम को दफ्तर खबरों में डूबता है
धुंधलके, सूरज और बच्चों से बेखबर होकर
रात का अंधेरा जब रोशनी को खत्म कर देता है
तब मैं दबे पांव घर पहुंचता हूं
दबे पांव, चोरों की तरह
बच्चे जाग जाएंगे तो पूछेंगे
कल शाम का वादा तोड़ दिया
कल शाम का वादा फिर करेंगे
मैं क्या कहूं
मैं नही जानता।

हर रोज दफ्तर से बाहर झांकता हूं
जानने के लिए अब शाम कैसी होती है
क्या अब भी शाम को पक्षी चहचहाते हैं
क्या शाम को अब भी लौटकर घर आते हैं
मेरे जैसे दफ्तरखोरों के लिए ये प्रश्न ऐसे ही होते होंगे
अनिश्चय में झूलते, पुराने जमाने के खयालों पर आधारित
फिर भी उम्मीद है कि एक शाम मुझे नसीब होगी
डूबती रोशनी, चहचहाते पक्षी, लौटते बच्चे और मुस्कुराते सूरज की।
मैं जानता हूं, मैं जानता हूं, मैं जानता हूं।

- अभिषेक

बेहतर क्या है?


बेहतर क्या है?
सुनहरे बालों वाली लड़की को घूरना
फिजिक्स की किताब में सर खपाना
बेहतर क्या है?
पिता के लिए बेटे का सिर खपाना
बेटे के लिए दिल लगाना
पड़ौसियों के लिए पहला बेहयाई
और दूसरे को नाटक बताना।
हर किसी के लिए बेहतर अलग अलग है
मां के लिए बेहतर है
अपने बेटे के लिए दुआ मांगना
उसे प्यार से खाना खिलाना
बाप की डांट,
पडौसियों की फटकार से बचाना
हर वक्त चिंता में घुले जाना
सबसे बेहतर क्या है?
मां से बेहतर इस सवाल का जवाब क्या है?

तुम सवाल बहुत करते हो?

यार तुम सवाल बहुत करते हो?
अपनी हर बात पर अकड़ते हो
उसने आंख फाड़कर देखा,
मुस्कुराया और बोला
तुम अंगूर की बेल की तरह लिपटते हो
जिधर मोड़ना चाहूं उधर ही निकल पड़ते हो
बहुत ही शालीनता से बात करते हो
और फिर भी पूछते हो
यार तुम सवाल बहुत करते हो?

- अभिषेक

नदियां


नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं
नुकीले पत्थरों का बोसा लेते हुए
उसे सहलाते,
उसकी कमतरी के अहसास को अपने में मिलाते हुए
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

भीषण गर्जना के साथ वह चूम लेती है
अपने हर बच्चे का मुख
उसे प्यार से भरने के लिए
और ले जाती है उसे
बुढ़ापे से बचपन की ओर
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

रंगहीन पानी में वह भरती है अपना रंग
ममत्व की पराकाष्ठा
और सख्त रौद्र रूप
फिर भी,
वह छोड़ती है
अपने पीछे अपने हर बच्चे को दुलारकर
हमेशा के लिए क्योंकि
नदियां अपना रास्ता खुद बनाती हैं।

मैदानों में कलकल करती,
पहाड़ों में संगीत सुनाती
और ले जाती है
साथ बहुत दूर तक
उन छोटे शिलाखंडों को, प्रस्तरों को
जिन्हें सीखना है अभी जीवन जीना
सभी के साथ समान व्यवहार करना
और हर मौसम में एक सा बने रहना
फिर भी नदी है
पानी कम है तो भी बहना है
पानी ज्यादा है तो भी बहना है
नदियां हैं, जिन्हें अपना रास्ता खुद बनाना है
बहते जाना है,
बहते जाना है।

- अभिषेक

देवदार


झुककर रोज
मैं अपने पांव देखता हूं
न पांव मिलते हैं,
न कहीं टोह मिलती है
हर रोज
मैं पहले से बड़ा हो जाता हूं
जैसे अभिमान के सामने लोग छोटे हो जाते हैं
कभी बर्फ से अपना तन ढकता हूं
कभी लताओं से श्रृंगार करता हूं
लेकिन फिर एक और दिन आता है
जब मैं स्वयं को टेढी सतह पर समतल पाता हूं
उस रोज मैं देखता हूं
लोग मुझसे प्रेम करने लगे हैं
उस रोज मैं देखता हूं
लोग मुझे दरख्त कहने लगे हैं।

- अभिषेक

इश्क का मिजाज अच्छा मगर...

इश्क का मिजाज अच्छा मगर
सबसे इश्क अच्छा नहीं
मुस्कुराते हुए चेहरे पर
ये गुबार अच्छा नहीं।

फूंक डालो ये गुस्सा
जिगर को फूंकने वालों
नाराजगी अच्छी है मगर
खुद पर सितम अच्छा नहीं।

तपिश आपकी बुझी नहीं
और मैं भी प्यासा हूं
पानी जरूरी है मगर
चुल्लू भर अच्छा नहीं।

फिर तेरी याद आई
और जगा दिया मुझको
तुम इतनी अच्छी हो मगर
कोई तुमसे अच्छा नहीं ।




- अभिषेक

बुधवार, 8 जून 2016

मैं गुमशुदाः कभी पूरी न होने वाली तलाश



पैट्रिक मोदियानो, पैट्रिक मोर्दियानो या फिर पाट्रिक मोडिआनो। साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले ये साहित्यकार अब तक इन तीन नामों से मुझ से मुखातिब हो चुके हैं। दुविधा है कि उन्हें किस नाम के साथ संबोधित करूं। मैं जानता हूं कि नाम बदलने से इनकी शख्सियत नहीं बदल जाएगी और न ही बदल जाएगा इनका उम्दा लेखन। बावजूद इसके संबोधन के लिए नाम की अहमियत आसानी से समझी जा सकती है। हिन्दी पाठकों के लिए हाल ही में उनकी एक किताब का अनुवाद आया है जिसमें उनका नाम पाट्रिक मोडिआनो लिखा है। मैं भी यही नाम चुन लेता हूं।


1978 में पाट्रिक मोडिआनो का छठा उपन्यास मिसिंग पर्सन आया। हिन्दी में इसका अनुवाद राजपाल एंड संन्ज ने मैं गुमशुदा के नाम से छापा है। किताब की खासियत ये है कि आपने इसके कुछ पन्ने पलट लिए तो फिर इस किताब को छोड़ देना आपके लिए असंभव होगा। पहले ही अध्याय में ये साफ हो जाता है कि आने वाले पन्ने एक व्यक्ति की तलाश हैं, लेकिन ये तलाश कब पूरी होगी और कैसे पूरी होगी ये कोई नहीं जानता। मोडिआनो के साहित्य की ये विशेषता है कि जैसे वे एक सवाल पाठक के सामने रखते हैं और उसी से कहते हैं कि वह इसका हल किताब में ढूंढना शुरू करे।


मैं गुमशुदा कहानी है एक डिटेक्टिव गी रोलां की। गी की जिंदगी के पिछले कुछ सालों को छोड़कर वह सब कुछ भूल चुका है। उसे याद नहीं है कि वो कौन है? कहां से आया है? ऐसी ही सवालों को खोजने की वो कोशिश करता है और फिर नई परतें खुलती हैं, लेकिन ये परतें गी की जिंदगी के रहस्यों को और उलझा देती हैं। किताब पढ़ते वक्त आपको कई बार लगता है कि आखिरी पृष्ठों को खोलकर देख लें कि आखिर गी की जिंदगी में हुआ क्या था। हालांकि धैर्यवान पाठक लगातार पृष्ठ दर पृष्ठ उलटते हैं और ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर गी रोलां का असली नाम क्या था? वह कहां से आया था? वो कौनसा हादसा था जिससे वो अपना अतीत भूल गया?

अतीत से हमेशा यादें ही जुड़ी होती हैं, लेकिन ये उपन्यास अतीत को अपनी यादों से बयां नहीं करता है। ये उपन्यास अतीत के प्रति आपके अंदर एक जिज्ञासा जगाता है उस आदमी के लिए जो अपना अतीत भूल चुका है। वह जानना चाहता है कि आखिर वह है कौन? ये सवाल हर कदम पर पूछा जाता है। पेरिस से शुरू होने वाली ये कहानी एक जलयात्रा पर खत्म होती है, लेकिन ये जलयात्रा भी सवालों का जवाब नहीं दे पाती है।


मोडिआनो ने उपन्यास को इस खूबी से रचा है कि ये आपको चौंकाता है, हर अध्याय में रहस्य को बनाए रखता है और तो और आखिरी पृष्ठ की आखिरी पंक्तियों तक आप खुद को बंधा हुआ महसूस करते हैं। आखिर में जब आप उपन्यास को पूरा पढ़ लेते हैं तो भी आपको अहसास होता है कि बहुत से प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं।

आखिरी के कुछ पृष्ठों में आपको नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास फेयरवेल टू आर्म्स  का सा भी अहसास होता है। हालांकि दोनों की कहानियों में जमीन आसमान का अंतर है। जहां फेयरवेल टू आर्म्स का अंत दुखद है वहीं मोडिआनो की ये किताब दो असमान ध्रुवों की ओर आपको खींचती है। जहां एक ओर खालीपन है तो कुछ सवालों के अनुत्तरित रह जाने का मलाल भी। जब कोई आपके जेहन पर हावी हो जाता है तो आप उसके लिए प्रार्थना करने लगते हैं। गी रोलां की बेबसी पर आप भावुक नहीं होते, न उसके प्रेम को महसूस करते हैं। बावजूद इसके एक सहानुभूति आपके भीतर जरूर घर लेती है।


दुनिया के नोबेल पुरस्कार विजेता क्या लिख रहे हैं, कैसे लिख रहे हैं, के लिए ये किताब पढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। बस एक उम्दा किताब पढ़ना ही काफी है।


आखिर में उपन्यास की कुछ पंक्तियां जो गी की भावनाओं को बखूबी बयां करती हैंः-

‘अभी तक सब कुछ इतना गड्ड मड्ड है, ऐसा टुकड़े-टुकड़े में.......मेरी तलाश के दौरान, कुछ धज्जियां, कुछ कतरनें अचानक मेरे जेहन में आती रहती है.... लेकिन आखिरकार...शायद यही तो है जीवन।‘

- अभिषेक





मंगलवार, 7 जून 2016

हवाएं जब गर्म हों तो सुकून देंगे गालिब आैर आम


गर्म हवाओं के थपेड़े बढ़ते ही जा रहे हैं। लगता है जैसे मुहब्बत में हारा आशिक अपना गुस्सा लोगों पर निकालने का मनसूबा पूरा करने चला आया हो। एसी-कूलर में रहने वालों के लिए गर्मी में निकलना किसी सजा से कम नहीं है। फिर ऐसी सजा बहुत से लोगों को हर मोड़ पर मिल रही है। घर से निकले और लगा जैसे गर्म भट्टी में झोंक दिए जा रहे हों।


फिर भी जिंदगी जीनी है तो कोशिशें तो जारी रखनी ही होंगी। गर्मी का ये मौसम यूं तो आग लगाए है, लेकिन कुछ लोगों की दीवानगी इस मौसम को आम का मौसम भी कहती है। बात आम की चली है तो पहला नाम दुनिया के उस मुख्तलिफ शायर का है जिसने आम के लिए अपनी दीवानगी हिन्दुस्तान के शहंशाह के सामने भी कुछ यूं रखी कि शहंशाह आम को भी उनके घर आम की टोकरी पहुंचानी ही पड़ी।


अपनी नज्मों, गजलों और एक से बढ़कर एक शेरों के जरिए हिन्दुस्तान के अवाम को अपना दीवाना बनाने वाले ये शायर थे मिर्जा गालिब। गालिब का अंदाजे बयां जितना शेर कहने में जुदा था उतने ही वे मुख्तलिफ थे अपनी बात कहने में। जब एक शायर दूसरे शायर से बात करे तो शेर कहने का असर भी होता है और दाद भी खूब मिलती है। हिन्दुस्तान के आखिरी मुगल शहंशाह बहादुर शाह जफर को शायरों का शहंशाह कहा जाए तो इसमें कुछ गलत नहीं है। जनाब का अदब कुछ ऐसा था कि उनके जमाने में शायरों के लिए दिल्ली का दिल बहुत बड़ा था। कद्रदानों की कमी होती भी कैसे जब कद्रदानों में शहंशाह खुद दखल रखते हों।


तो लीजिए जनाब उस किस्से पर आते हैं जिसका जिक्र हमने कुछ पहले किया है। मिर्जा गालिब आम के इतने शौकीन थे कि लोगों से आम की फरमाइश करने से भी नहीं चूकते थे। एक बार जब वे दिल्ली के एक बागीचे हयात बख्श में शहंशाह बहादुरशाह जफर के साथ टहल रहे थे। अचानक गालिब एक जगह ठहर गए। बादशाह को बड़ा अजीब लगा। उन्होंने देखा कि गालिब एक आम के पेड़ के नीचे खड़े हैं और आमों को लगातार देखे जा रहे हैं।


बादशाह ने आश्चर्य से गालिब को देखा और पूछा कि इन आमों को आप ऐसे क्यों देख रहे हैं। गालिब को तो जैसे इसी सवाल का इंतजार था। उन्होंने कहा कि शहंशाह सुना है आम-आम पर लिखा होता है नाम खाने वाले का। मैं ढूंढ रहा हूं कि क्या किसी आम पर गालिब का भी नाम लिखा है। ये कहकर गालिब तो चुप हो गए लेकिन शहंशाह मुस्कुराए बिना न रह सके। अगले दिन शहंशाह ने उन्हीं आमों की टोकरी गालिब के घर पहुंचा दी।


एक बेहद खास आदमी का ये आम प्रेम कुछ अजीब सा लगता है, लेकिन उनकी आम के प्रति दीवानगी का ये पहला और आखिरी किस्सा नहीं था। उन्होंने 1857 की क्रांति के दौर में एक शिकायत भरा पत्र अपने एक अजीज को लिखा था, जिसमें उन्होंने लिखा कि इस क्रांति की बुरी बात ये है कि आम भी खाने को नसीब नहीं है। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई शायर होगा जिसने किसी फल का इस्तकबाल अपनी नज्म से बुलंद किया हो। ये करने वाले संभवतः गालिब इकलौते शायर हैं।


गालिब ने आम को जितनी तवज्जुह दी है वो हर किसी के बस की बात नहीं है। उन्होंने आम की तारीफ में एक गजल ही लिख डाली। आम की तारीफ का इससे बड़ी मिसाल कहीं आैर नहीं मिलती है अौर न ही मिलते हैं गालिब जैसे शायर। तो इन गर्म हवाआें में गालिब की नज्मों-गजलों, शेरों को गुनगुनाइए आैर आम का जमकर लुत्फ उठाइए।

अभिषेक